-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ ‘सेहत टाइम्स’ की विशेष वार्ता शृंखला
-रक्त और उसके अवयव भाग – 8

सेहत टाइम्स
लखनऊ। रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवारत रह चुके राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा स्वस्थ बने रहने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए जॉर्जियंस आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।
अब तक आपने पढ़ा…
भाग 1 में …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें‘
भाग 2 में …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें
भाग 3 में …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें
भाग 4 में…‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें
भाग 5 में …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें
भाग 6 में …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये
भाग 7 में … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण
अब प्रस्तुत है शृंखला की अगली कड़ी भाग 8
इस एपीसोड में, वृद्धावस्था में एनीमिया कितना खतरनाक हो सकता है, इसके बारे में जानकारी दी गई है
प्रो त्रिपाठी ने बताया कि कहा जाता है कि वृद्धावस्था अपने आप में एक रोग है क्योंकि अवस्था बढ़ने के साथ-साथ शरीर के प्रायः सभी अंग क्षीण होने लगते हैं चाहे वह गुर्दा हो या रक्त बनाने वाली अस्थिमज्जा। इसलिए इस अवस्था में खून की कमी का होना आश्चर्यजनक बात नहीं है। इतना ही नहीं, खून की कमी या एनीमिया को वृद्ध शरीर उतनी ताकत से नहीं झेल पाता जितना कि युवा शरीर। जैसा कि सर्वविदित है, वृद्धावस्था में यकृत (लिवर), गुर्दा, हृदय इत्यादि सभी अंग कमजोर रहते हैं और इनमें रक्त संचार भी पहले की तरह प्रबल नहीं होता, इसलिए एनीमिया हो जाने से इन अंगों को ऑक्सीजन की पर्याप्त मात्रा नहीं मिल पाती। ये अंग और कमज़ोर होने लगते हैं तथा बीमारी का रूप धारण कर लेते हैं। मस्तिष्क में एनीमिया की वजह से गम्भीर लक्षण हो सकते हैं। पहले से कमज़ोर गुर्दा और ज़्यादा कमज़ोर हो जाता है। इसलिए वृद्धावस्था में एनीमिया की रोकथाम करने और उसको पहचानकर उपचार करने की विशेष आवश्यकता है। यह तभी सम्भव है जब वृद्धावस्था में एनीमिया होने की सही जानकारी हो तथा कारण पता हो।
वृद्धावस्था में एनीमिया के मुख्य कारण हैं
1. भूख न लगना।
2. मानसिक कारणों जैसे तनाव इत्यादि के कारण खाने की इच्छा न होना।
3. समय पर तथा सन्तुलित भोजन उपलब्ध न होना।
4. पाचन तन्त्र कमज़ोर होना।
5. पेट खराब होना।
.6. रक्त स्राव।
7. कैंसर।
शरीर में रक्त बनने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी कई कारणों से हो सकती हैं। इसलिए वृद्धावस्था में एनीमिया होने पर इन कारणों के बारे में सोचना चाहिए और इनका निराकरण करना चाहिए। पेट साफ न होने पर बवासीर की समस्या उत्पन्न हो सकती है और मल के साथ रक्तस्राव होता है, जो कि एनीमिया का कारण बनता है। पर इसमें गौर करने वाली बात यह है कि प्रायः बवासीर से रक्त निकलने के बावजूद भी रक्तस्राव की बात मरीज जान नहीं पाता। क्योंकि इसमें कोई दर्द यह परेशानी नहीं होती है। आंखें कमजोर होने से या कमरे में रोशनी कम होने से मल में उपस्थित रक्त देख नहीं पाता है।
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वृद्धावस्था में एनीमिया को नजरअंदाज नहीं करना चाहि क्योंकि कभी-कभी यह भयंकर बीमारी जैसे कैन्सर का लक्षण हो सकता है। यह बात नीचे दिये उदाहरण से स्पष्ट होती हैं।
एक मरीज, जिसकी उम्र 61 वर्ष थी। उन्हें पिछले 6 महीने से बेहद कमजोरी रहती थी। भूख कम लगती थी तथा कमजोरी की वजह से चलने-फिरने में लड़खड़ाहट होती थी। परीक्षण करने पर पता चला कि एनीमिया है और हिमोग्लोबिन की मात्रा काफी कम यानी 5 ग्रा०% है। आगे की जाँच करायी गयीं पर एनीमिया के कारण जानने के दिशा में कोई ठोस परिणाम नहीं निकला। उदाहरण के तौर पर गुर्दे तथा लिवर सम्बंधित जाँचे शरीर में आयरन की मात्रा सम्बंधित जांचे इत्यादि सभी जांचे सामान्य थीं। यहाँ तक की अस्थिमज्जा की जाँच कराने पर भी कुछ परिणाम नहीं निकला। एनीमिया के कारणों का पता न लगने की वजह से कोई विशेष इलाज शुरू नहीं हो पाया अगले 4-5 महीने तक मरीज को 2-3 बार खून चढ़वाना पड़ा। लगभग आठ महीने बाद मरीज के पेट में हल्का दर्द शुरू हुआ। जाँच करने पर पता चला लिवर काफी बढ़ गया है और उसमें कई गांठ पैदा हो गयी हैं। जिससे इस बात का पुख्ता संकेत मिल गया कि मरीज को कैन्सर है और लिवर में फैल चुका है। उसी समय मरीज को भोजन निगलने में भी परेशानी शुरू हो गई थी। अतः इन्डोस्कोपी करायी गयी और पता चला भोजन नली (इसोफेगस) में कैन्सर है। इस उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि कभी-कभी एनीमिया शरीर के अन्दर पल रही भयंकर बीमारी का संकेत हो सकता है।
प्रो त्रिपाठी कहते हैं कि अब लोगों के मन में यह जिज्ञासा हो सकती है कि शुरुआत में ही इन्डोस्कोपी क्यों नहीं करायी गयी। तो मैं बता दूं कि जैसा कि मैंने पहले भी बताया है कि मरीज को शुरुआत में ऐसा कोई लक्षण नहीं था (खाना निगलने में परेशानी) जिससे भोजन नली में कैंसर के बारे में शंका की जा सके। अब प्रश्न उठता है कि छुपे हुए कैंसर से एनीमिया कैसे उत्पन्न हुआ, तो इस विषय में ऐसा प्रतीत होता है कि कैंसर कोशिकाओं द्वारा उत्पन्न कुछ विशेष प्रकार के रसाधन जैसे साइटोकाइनिस (Cytokines) अस्थिमज्जा पर अपना प्रभाव डालते हैं और आरबीसी की उत्पति कम करते हैं, जिससे व्यक्ति एनीमिया का शिकार बन जाता है। कुछ मिलाकर मोटे तौर पर इस नतीजे पर पहुंचा जा सकता है कि लगभग छह माह के अंतराल में एक बार एनीमिया की जांच करा लेनी चाहिये, जिससे आगे की दिक्कतों से बचा जा सके।

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