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कभी उन्माद तो कभी अवसाद देने वाले बाइपोलर डिसऑर्डर से निपटना मुश्किल नहीं

-साइकियाट्री से एमडी जीसीसीएचआर के परामर्शदाता डॉ गौरांग गुप्ता से विशेष बातचीत

डॉ गौरांग गुप्ता

सेहत टाइम्स

लखनऊ। बाइपोलर डिसऑर्डर यानी द्विध्रुवी विकार वह अवस्था है जिसमें एक ही व्यक्ति में अलग-अलग फेज होते हैं, ये दो फेज हैं मैनिया यानी उन्माद और डिप्रैसिव यानी अवसाद। इसे सरल भाषा में समझें तो पहले फेज में व्यक्ति हाईपरएक्टिव हो जाता है, जबकि दूसरे फेज में घोर निराशा में घिरकर शांत रहने लगता है। इसका इलाज होम्योपैथिक दवाओं से किया जाना संभव है।

यह बात मनोरोग में एमडी डिग्रीधारक होम्योपैथिक चिकित्सक, गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के परामर्शदाता डॉ गौरांग गुप्ता ने वर्ल्ड बाइपोलर डे के मौके पर सेहत टाइम्स के साथ विशेष वार्ता में कही। उन्होंने कहा कि पहले फेज मैनिया में व्यक्ति एक्टिविटीज में भी हाईपर हो जाता है और थॉट्स में भी हाईपर रहता है। छोटी-छोटी बात में चिंता होने लगेगी, चिंता होगी तो बहुत ज्यादा बोलेंगे, बेचैन रहेंगे इधर-उधर टहलेंगे। उनको लगता कि कहीं मैं बीमार न हो जाउॅ, मुझे कुछ हो न जायेइस के विपरीत जब वही व्यक्ति डिप्रेसिव मोड में होता है तो बहुत ही बुझा-बुझा रहता है, अकेले रहने का मन करता है, किसी से बात करने का मन नहीं करता है, जीवन में कुछ अच्छा नहीं लगता है, कुछ करने की रुचि नहीं रह जायेगी यहां तक कि सुसाइडल थॉट्स (आत्महत्या के विचार) भी आने लगते हैं। उन्होंने बताया कि ये दोनों तरह के दौर कुछ-कुछ अंतराल में आते रहते हैं।

यह पूछने पर कि इसके कारण क्या हैं, डॉ गौरांग ने कहा कि यह एक मनोरोग है और किसी भी उम्र के व्यक्ति को यानी बच्चों से लेकर वयस्कों, वृद्धजनों तक को विभिन्न प्रकार की परिस्थितियों के चलते हो जाता है। ये परिस्थितियां अचानक पैदा हुई भी हो सकती हैं और लम्बे समय से चली आ रही भी हो सकती हैं। उदाहरण के लिए अचानक किसी घटना, जैसे किसी प्रियजन की मृत्यु, बड़ा नुकसान, प्रेम संबंधों में धोखा, वैवाहिक जीवन में धोखा आदि के चलते व्यक्ति आहत हो सकता है। इसी प्रकार जब कोई व्यक्ति लम्बे समय से प्रताडि़त किया जा रहा हो, अंदर ही अंदर घुट-घुट कर रहता हो। उसकी आकांक्षाओं पर कुठााराघात हुआ हो और उसे समझौता करना पड़ा हो। बच्चों के कारणों की बात करें तो पढ़ाई को लेकर, घर में माता-पिता के बीच लड़ाई-झगड़ा होने के चलते, अपनी बात किसी को न बता पाने की मजबूरी, बाहर किसी व्यक्ति के लगातार परेशान करना जैसे अनेक कारण हो सकते हैं।

उन्होंने कहा कि इसके उपचार की बात करें तो होम्योपैथिक दवाओं से इसे ठीक किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि चूंकि होम्योपैथी सिद्धांत में शरीर और मन से जुड़े लक्षणों की भूमिका दवा का चुनाव करने में महत्वपूर्ण है, इसके लिए गहराई तक जाकर मरीज की हिस्ट्री पूछी जाती है जिसमें अधिकतर बातें मन से जुड़ी होती हैं, बाइपोलर भी सीधे-सीधे मन की अवस्था से उत्पन्न रोग है। उन्होंने कहा कि इसके अतिरिक्त इसमें काउंसलिंग की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण है, विशेषकर जब व्यक्ति सुसाइडल थॉट्स के बीच रह रहा होता है।

बाइपोलर रोग से बचने के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि हम सभी के जीवन में किसी न किसी वजह से तनाव जैसी परिस्थितियां पैदा होती हैं, लेकिन कुछ लोग उसे आसानी से निपटा लेते हैं, जबकि कुछ टूट जाते हैं। जो टूट जाते हैं, उन्हीं को ठीक करने के लिए इलाज की जरूरत होती है। उन्होंने कहा कि बच्चे हों या बड़े, अगर कोई दिक्कत है तो उसे छिपायें नहीं, बात करें, संवादहीनता की स्थिति नहीं होनी चाहिये, बच्चे चूंकि पूरी तरह परिपक्व नहीं होते हैं तो ऐसे में माता-पिता, घरवालों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे बच्चेे के मन की बात जरूर जानें।