-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ सेहत टाइम्स की विशेष शृंखला
-रक्त और उसके अवयव भाग – 5

सेहत टाइम्स
रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवारत रह चुके राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा स्वस्थ बने रहने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा शृंखला चलायी जा रही है। ये जानकारियां जहां प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक है, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए विद्यार्थियों की गिनती आज देश-विदेश के नामी चिकित्सकों में होती है।
अब तक आपने पढ़ा…
अभी तक …..भाग 1 में ‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,…. भाग 2 में ‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,….. भाग 3 में ‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..तथा …..भाग 4 में ‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…‘ शीर्षक से रिपोर्ट्स प्रकाशित की जा चुकी हैं।
ब्लड प्रेशर, डायबिटीज में एनीमिया
अब पांचवे एपीसोड में एक और महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए प्रो त्रिपाठी ने बताया कि किस प्रकार शरीर में ब्लड यूरिया की मात्रा बढ़ने से न सिर्फ गुर्दा खराब होता है बल्कि यह एनीमिया का भी कारण बन जाता है। उन्होंने बताया कि शुगर और हाई ब्लड प्रेशर के रोगी को कमजोरी, भूख कम लगना, चलने-फिरने में पैरों में भारीपन लगना, सांस फूलना जैसे लक्षण होते हैं। शुरुआत में लोग इसे अनियंत्रित डायबिटीज, अनियंत्रित ब्लड प्रेशर के कारण मानते हैं, लेकिन जब जांच होती है तो पता चलता है कि दोनों का स्तर सामान्य है।
इसके बाद मरीज जब चिकित्सक के पास पहुंचता है तो शुरुआत में इसकी वजह एनीमिया लगती है, टेस्ट कराने पर पता चलता है कि हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत कम है लेकिन ताज्जुब तब होता है जब रक्त में आयरन (फेरीटिन) की मात्रा, आरबीसी आदि दूसरे पैरामीटर्स भी सामान्य निकलते हैं। अब तक सब कुछ नार्मल निकलने पर एनीमिया का कारण जानने के लिए और जांचें कराने पर पता चलता है कि ब्लड यूरिया का स्तर काफी बढ़ा हुआ है, ब्लड यूरिया का सामान्य स्तर 20 से 40 mg% होता है। ऐसे में तत्काल गुर्दा रोग विशेषज्ञ से सम्पर्क करना चाहिये साथ ही एनीमिया के इलाज के लिए इंजेक्शन भी लगाया जा सकता है।
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प्रो त्रिपाठी ने इस बारे में विस्तार से बताया कि हमारे शरीर में रक्त कोशिकायें, (लाल रक्त कोशिकायें, श्वेत रक्त कोशिकायें, प्लेटलेट्स) बोनमैरो (अस्थि मज्जा) द्वारा बनती है। आर०बी०सी० को सुचारु रूप से बनाने के लिए जहां एक ओर बोनमैरो का स्वस्थ होना आवश्यक है वहीं विभिन्न प्रकार के पदाथों या तत्वों की आवश्यकता भी होती है जैसे आयरन, विटामिन बी-12, फोलिक एसिड, प्रोटीन इत्यादि। इसके अतिरिक्त बोनमैरो को नियमित रूप से कार्य करने की क्षमता को बनाये रखने या बढ़ाने के लिए हारमोन्स की आवश्यकता होती है। जिनमें मुख्य हैं थायराइड हारमोन और गुर्दों से स्रावित होने वाला हारमोन एरिथ्रोपॉइटिन। हिमोग्लोबिन कम होने पर गुर्दों द्वारा यह हारमोन अधिक निकलने लगता है जिससे बोनमैरो की आर०बी०सी० बनाने की क्षमता बढ़ जाती है। हिमोग्लोबिन सामान्य होने पर एरिथ्रोपॉइटिन निकलना स्वतः कम हो जाता है। अतः हिमोग्लोबिन लेवल को बनाये रखने में मुख्य भूमिका एरिथ्रोपॉइटिन की होती है। गुर्दे खराब होने की अवस्था में एरिथ्रोपॉइटिन का लेवल काफी कम हो जाता है। इसलिए बोनमैरो नॉर्मल होने तथा आयरन आदि आवश्यक तत्वों की कमी न होने के बावजूद भी गुर्दे के खराब होने पर एरिथ्रोपॉइटिन कम होने की वजह से बोनमैरो द्वारा आर०बी०सी० कम बनता है और एनीमिया हो जाता है। इसलिए ऐसे मरीजों को यदि एरिथ्रोपॉइटिन का इन्जेक्शन लगाया जाय तो एनीमिया में फायदा होता है। यही नहीं, एनीमिया बोनमैरो की कमजोरी की वजह से भी होता है, जब शरीर में उपस्थित कुदरती एरिथ्रोपॉइटिन बोनमैरो पर असर नहीं कर पाता।
प्रो त्रिपाठी ने बताया कि उदाहरण के तौर पर रिह्यूमेटॉयड (Rheumatoid) आर्थराइटिस और कुछ प्रकार के कैंसर जैसे-मायलोमा। उपर्युक्त रोगों में शरीर में अनियंत्रित रूप से कुछ नुकसानदेह केमिकल पैदा हो जाते हैं (इन्टर ल्यूकीन-1 और 6. टी०एन०एफ० अल्फा), जो बोनमैरो पर एरिथ्रोपॉइटिन के असर को कम कर देते हैं। अतः बोनमैरो पर वांछित असर लाने के लिए एरिथ्रोपॉइटिन को हाईडोज़ में बाहर से इन्जेक्शन द्वारा देना होता है। उदाहरण स्वरूप, गुर्दे ख़राब होने की वजह से हुई एनीमिया के इलाज के लिए एरिथ्रोपॉइटिन की खुराक प्रायः 4000 से 6000 यूनिट प्रति सप्ताह है, जबकि रिह्यूमेटॉयड आर्थराइटिस और कैंसर में इसकी खुराक काफी ज़्यादा यानी 40,000 से 60,000 यूनिट प्रति सप्ताह है। यह दवा खाल के नीचे (सब क्यूटेनियस) लगाई जाती है। इन्जेक्शन लगाने के पहले किसी एलर्जी टेस्ट करने की आवश्यकता नहीं होती। सामान्यतः एरिथ्रोपॉइटिन से कोई नुकसान नहीं होता, फिर भी ऐसे मरीज़ों में जिन्हें इन्जेक्शन लग रहा हो ब्लडप्रेशर पर निगरानी रखनी पड़ती है क्योंकि कभी-कभी ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है।
प्रो त्रिपाठी बताते हैं कि एरिथ्रोपॉइटिन हमारे शरीर में गुर्दों द्वारा स्रावित होता है और आर०बी०सी० बनने के लिए जरूरी होता है। गुर्दे कमज़ोर होने की वजह से यह हारमोन कम बनता है, इसलिए इसे (एरिथ्रोपॉइटिन) इन्जेक्शन द्वारा भी दिया जाता है। इस इन्जेक्शन के लेने से हिमोग्लोबिन को 10 ग्रा0% के लगभग बनाये रखने में मदद मिलती है। यह बहुत ही सुरक्षित दवा है। हालांकि इन्जेक्शन लेने के दौरान यह ध्यान रहे की आपके शरीर में आयरन की प्रचुर मात्रा है। कभी-कभी इस हारमोन के इन्जेक्शन से ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है, इसलिए ब्लडप्रेशर की दवा खाते हुये भी नियमित रूप से ब्लडप्रेशर पर निगरानी रखनी होगी। वैसे एरिथ्रोपॉइटिन को लम्बे समय तक लेना पड़ता है पर आवश्यकतानुसार इसके डोज़ को घटाना बढ़ाना पड सकता है।
प्रो त्रिपाठी ने बताया कि एरिथ्रोपॉइटिन इन्जेक्शन को कभी-कभी एथलीट लोग अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए लगाते हैं, यह ठीक नहीं है क्योंकि अधिक हिमोग्लोबिन बढ़ जाने से खून गाढ़ा हो जाता है, उससे रगों में थक्के बनने की संभावना होती है (थ्रॉमबोसिस), जो घातक भी हो सकता है। दूसरे एरिथ्रोपॉइटिन से ब्लडप्रेशर भी बढ़ सकता है। नवीन शोधों से यह पता चला है कि कुछ प्रकार के कैंसर मरीजों में हिमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए एरिथ्रोपॉइटिन यदि दिया जाता है तो कैंसर बढ़ सकता है। इसलिए बिना विशेषज्ञ की सलाह के इसका प्रयोग नहीं करना चाहिए।

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