टेढ़े पैर वाले बच्चे की पहचान गर्भ में ही करने वाले प्रो अजय सिंह को एमसीआई का प्रतिष्ठित पुरस्कार

क्‍लब फूट वाले बच्‍चों को समय रहते सामान्‍य बनाने वाले प्रो अजय को एमसीआई का प्रतिष्ठित पुरस्‍कार

2017 का प्रतिष्ठित हरिओम आश्रम एलम्बिक रिसर्च अवॉर्ड फंड देने का ऐलान

लखनऊ। खतरा आने से पूर्व अगर खतरे का अहसास हो जाये तो उससे निपटने में ज्‍यादा आसानी और सफलता का प्रतिशत काफी बढ़ जाता है। कुछ ऐसी ही सोच लेकर चले किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय के पीडियाटि्रक ऑर्थोपैडिक विभाग के प्रो अजय सिंह ऐसी स्‍टडी में सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं जिससे जन्‍म से टेढ़े पैर वाले शिशुओं की पहचान माता के गर्भ में ही हो जाती है, इसका परिणाम यह होता है कि जन्‍म के बाद यथाशीघ्र बच्‍चे के पैरों का उपचार कर उसे हमेशा के लिए सामान्‍य बनाने में सफलता मिल जाती है। इस तरह की दिव्‍यांगता को क्‍लब फूट का नाम दिया गया है। इस महत्‍वपूर्ण स्‍टडी को मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने संज्ञान में लिया और नतीजा यह हुआ कि इस स्‍टडी के लिए प्रो अजय को व़र्ष 2017 का प्रतिष्ठित हरिओम आश्रम एलम्बिक रिसर्च अवॉर्ड फंड देने का निर्णय लिया है।

 

इस एवॉर्ड की घोषणा मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया की अध्‍यक्ष डॉ जयश्री मेहता ने करते हुए बताया है कि प्रो अजय सिंह को यह एवॉर्ड “To recognized the applied research at field level ( clinical research)” कैटेगरी में प्रदान किया जा रहा है।

 

इस बारे में डॉ अजय सिंह से बात कर उनकी स्‍टडी के बारे में पूछने पर बताया कि सरकार के राष्‍ट्रीय बाल स्‍वास्‍थ्‍य योजना के तहत बच्‍चों की दिव्‍यांगता दूर करने का कार्यक्रम चल रहा है। इसी के तहत 6 वर्ष तक की आयु वाले बच्‍चों को दिव्‍यांगता से बचाने की योजना के तहत हम लोगों ने यह जानने की कोशिश की कि जब यह जन्‍मजात बीमारी है तो इसे अगर गर्भस्‍थ शिशु में ही पता लगाया जाये तो समाधान की तरफ बढ़ा जा सकता है। उन्‍होंने बताया कि इस तरह से हम लोगों ने जानने की कोशिश की कि आखिर गर्भवती माता और उसके गर्भाशय में पल रहे शिशु के जींस किन-किन तरह से बदलते है, जिससे यह ज्ञात हुआ कि अमुक परिस्थिति में बदले हुए जींस वाले केस में संभावना होती है कि बच्‍चा क्‍लब फूट की स्थिति वाला पैदा हो सकता है, इसके बाद हम लोगों ने ऐसे बच्‍चों की पहचान करके उनका उपचार कर दिया जिससे उनके पैर हमेशा के लिए ठीक हो गये।

 

उन्‍होंने बताया कि‍ आमतौर पर होता यह है कि बच्‍चा खड़े होने और उसके चलने की अवस्‍था में आने पर घरवालों को पता चलता है कि बच्‍चा टेढ़े पैर की बीमारी यानी क्‍लब फूट से ग्रस्‍त है, उसमें भी बहुत से अभिवावक यह सोचते हैं कि धीरे-धीरे अपने आप ठीक हो जायेगा लेकिन ऐसा होता नहीं है, बल्कि बच्‍चे के पैर और मजबूती के साथ टेढ़े होते जाते हैं। जैसे-जैसे समय बढ़ता जाता है वैसे-वैसे उपचार की सफलता का प्रतिशत घटने के साथ ही उपचार का स्‍वरूप बढ़ता जाता है, क्‍योंकि समय व्‍यतीत होने पर बच्‍चे की हड्डियां मजबूत होती जाती हैं, जबकि इसके विपरीत शैशवावस्‍था में हड्डी मुलायम होने के कारण उसे मोल्‍ड करना आसान होता है, और बहुत से केस में मालिश आदि (नॉन सर्जरी) से ही ठीक हो जाते हैं, और अगर सर्जरी करनी भी पड़े तो उसके परिणाम बहुत अच्‍छे आते हैं और बच्‍चा चलने लायक उम्र होने तक सामान्‍य रूप से ही चलने लगता है।