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दिया नहीं, बल्कि लिया

जीवन जीने की कला सिखाती कहानी – 24 

डॉ भूपेंद्र सिंह

प्रेरणादायक प्रसंग/कहानियों का इतिहास बहुत पुराना है, अच्‍छे विचारों को जेहन में गहरे से उतारने की कला के रूप में इन कहानियों की बड़ी भूमिका है। बचपन में दादा-दादी व अन्‍य बुजुर्ग बच्‍चों को कहानी-कहानी में ही जीवन जीने का ऐसा सलीका बता देते थे, जो बड़े होने पर भी आपको प्रेरणा देता रहता है। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के वृद्धावस्‍था मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ भूपेन्‍द्र सिंह के माध्‍यम से ‘सेहत टाइम्‍स’ अपने पाठकों तक मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में सहायक ऐसे प्रसंग/कहानियां पहुंचाने का प्रयास कर रहा है…

प्रस्‍तुत है 24वीं कहानी – देना ही लेना

एक राजा के राज्य में फकीर रहता था। राजा का रोजाना का नियम था। सुबह 9:00 बजे से शाम 5:00 बजे तक अपने खजाने से गरीबों व भिखारियों को दान किया करता था, पैसा बांटा करता था। ऐसा करने से उस राजा को बहुत खुशी मिलती थी। एक फकीर रोज आता था और लाइन में लग जाता था जो भी उससे पहले खड़े होते थे उसके बाद जो और लोग आते थे वह उनको अपनी बारी आने पर भी उन लोगों को मौका दे देता था। धीरे-धीरे शाम के 5:00 बज जाते थे और फकीर का नंबर नहीं आता था। धीरे-धीरे कई दिन बीत चुके थे। ऐसा ही रोजाना होता था।

यह क्रिया राजा का एक दरबारी देखता रहता था और नोट करता रहता था। उसने यह सारी बात राजा को बताई राजा ने भी गौर किया उसके बाद राजा ने उस फकीर को बुलाया और उस फकीर महाशय से पूछा हे महाशय! तुम रोज हमसे दान लेने के लिए आते हो लेकिन रोजाना खाली हाथ लौट जाते हो। तुम लोगों को अपने आगे करते रहते हो और अपना नंबर दूसरों को देते रहते हो। फकीर ने कहा! राजा जी आप राजा हो आपके पास संपत्ति, अमानत, रुपया, पैसा सब कुछ है। आप यह दान करते हो और मेरे पास बारी है, टर्न है। मैं वह दान करता हूं। राजा जी जब आप किसी को दान दिया करते थे तब आपके चेहरे पर एक अलग ही खुशी दिखाई देती थी। मैं उस खुशी को देखकर सोचने लगा कि राजा दान देकर खुश होते हैं, तो मुझे भी कुछ देना चाहिए। मैं तो फकीर हूं मेरे पास तो कुछ देने के लिए नहीं है। तब मैंने सोचा मेरे पास बारी देने के लिए है, टर्न देने के लिए है। मैं तो फकीर हूं मुझे तो यह हीरे, जवाहरात, रत्न, खजाने, रुपया, पैसे लेने की जरूरत ही नहीं है। मेरे लिए यह चीज महत्व नहीं रखती है, तब मैंने देना शुरू किया जिससे मैं आपसे ज्यादा खुशी का अनुभव करने लगा हूं। देवताओं को सदा आशीर्वाद देने के पोज में दिखाते हैं, जिससे उनका चेहरा सदा हर्षित रहता है। लक्ष्मी को धन देने के पोज में दिखाते हैं अर्थात जिसके पास जो होता है, वह देता है। तो हमें सोचना है कि हमारे पास क्या है जो हम लोगों को दे सकें। क्योंकि देना ही लेना है। अगर हम स्थूल या सूक्ष्म में कुछ भी देते हैं तो उसके बदले में हमें कई गुना मिलता है। किसी को सम्मान देंगे, तब हमें कई गुना सम्मान मिलेगा। हम दिन भर लोगों को क्या देते हैं थोड़ा सा इस पर नजर डालते हैं।

 

ध्‍यान दें हम लोगों को क्‍या-क्‍या देते हैं

 

◆ हम आज कलियुग के अंत समय में हैं अब हम रोजाना अपने अपने दान को चेक करेंगे। आज हमने क्रोध कितनों को दिया है, कितनों को पत्थर दिए हैं, कितनो को ईर्ष्या दी है, कितनों को घृणा दी है, कितनों को बुरी दृष्टि के द्वारा देखा है, कितनों के अवगुणों को देखा है, देखना अर्थात हमारे संकल्प चलना और संकल्प चलना अर्थात दूसरों को देना। लिस्ट तो बहुत लंबी है यह तो सभी जानते हैं कि हम क्या-क्या देते हैं तो उनको लिखना ही शक्ति/एनर्जी को कमजोर करना है क्या हमारे पास यही सब कुछ देने के लिए है, क्या इसके अलावा और कुछ भी देने के लिए है, थोड़ा हटके सोचते हैं।

 

 ★ आज से हमें यह देना है

 

◆ हमारे पास पैसा है तो पैसे का दान कीजिएगा। समय है तो समय का दान कीजिएगा। हमारे पास ज्ञान है तब ज्ञान का दान कीजिएगा अर्थात जो भी हमारे पास है उसका दान कीजिएगा, जिससे वह दान किया हुआ कई गुना हमको वापस होकर मिलता है। इसी देने को ही लेना कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें कि जब हम छोटे बच्चे को बेटा कहते हैं, तब वह हमें रिस्पेक्ट देता है। माना कि हमारे पास कुछ भी नहीं है, तब हम चलते-फिरते जो सामने दिखता है, या जो भी हमें दिन भर में मिलता है, या संबंध संपर्क में आता है उन सभी के लिए कल्याण की भावना रख सकते हैं। उसके लिए कुछ शब्द हम लिख रहे हैं। इससे हम अपने मन के द्वारा दान दे सकते हैं। इसमें खर्च कुछ नहीं है, सिर्फ संकल्प से दान देना है।- सभी का कल्याण हो। सभी सुखी हों और सब का भला हो। सभी का जीवन सफल हो। सभी के जीवन में सुख, शांति, खुशी और पवित्रता आ जाए। सभी निरोगी बन जाएं। सभी स्वस्थ हो जाएं। सभी इस वायरस के दुख से मुक्त हो जाएं। सभी के अंदर देवताओं जैसे गुण आ जाएं। सभी सर्वगुण संपन्न बन जाएं। सभी निर्विकारी बन जाएं। सभी 16 कला संपूर्ण बन जाएं। सभी संपूर्ण पवित्र बन जाएं। सभी फरिश्ता बन जाए। सभी दूसरे के मददगार बन जाए। सभी सुखी हो जाएं। सभी सदा खुश रहें ……… आदि-आदि हम कोई भी दान दे सकते हैं। यह तो कुछ ही हमने दान लिखे हैं जो भी आपको अच्छे लगे आप वह दे सकते हैं। इसमें न समय का खर्च है, न पैसे का, न मेहनत का कोई भी खर्च नहीं है। सिर्फ मन से संकल्प के द्वारा देना है। इसके बदले में अभी कितनी खुशी मिलेगी और बाद में कितना अमाउंट जमा होगा वह तो समय ही बताएगा।

 

शिक्षा   

इस कहानी से हमें यही शिक्षा मिलती है कि किसी के जीवन में बहुत पैसा है, कोई गरीब है। किसी के रिश्ते में बहुत अनबन है, किसी का कुछ हद तक रिश्ता ठीक है। कोई बहुत बीमार है, कोई स्वस्थ/ठीक भी है। इन सबके पीछे राज क्या है? क्योंकि जब हम इस दुनिया में आते हैं तो मुट्ठी बंद करके आते हैं और जब हम इस दुनिया से जाते हैं तब हाथ फैलाकर जाते हैं। आते समय भी कुछ दिखाई नहीं देता है और जाते समय भी कुछ दिखाई नहीं देता है कि हम क्या लेकर आए थे और अब क्या लेकर जा रहे हैं। फिर यह अमीरी, गरीबी, दुख, कष्ट, बीमारी आदि हमें कैसे प्राप्त होती है। जरूर पिछले जन्म में कुछ हमने दिया होगा उसी के बदले में यह मिल रहा है। अब हमें अगले जन्म के लिए सोचना है कि हमें अगले जन्म में क्या लेना है उसके हिसाब से हमें क्या देना है। ओम शांति…

 

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