ढाई साल की उम्र से है थैलेसीमिया, फि‍र भी पूरे जज्‍बे के साथ कर रही फार्मासिस्‍ट की पढ़ाई

गर्भावस्‍था के दौरान जांच करा लें कि शिशु को थैलेसीमिया तो नहीं

 

लखनऊ। लखनऊ की रहने वाली सोनी यादव को ढाई वर्ष की उम्र में पता चला था कि उसे थैलेसीमिया की बीमारी है, फि‍र शुरू हुआ उपचार का दौर, लेकिन सराहना करनी होगी सोनी के साथ-साथ उसके माता-पिता की, जिन्‍होंने हौसलों के पंख लगाकर सोनी की पढ़ाई में इस बीमारी को बाधा नहीं बनने दिया, इसी का नतीजा है कि सोनी आज शिक्षा की सीढ़ियां सफलतापूर्वक चढ़ते हुए आज फार्मासिस्‍ट बनने के लिए पढ़ाई कर रही हैं।

 

यह अनुभव स्‍वयं सोनी यादव ने शनिवार को किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के कलाम सेंटर में सीएफएआर विभाग के तत्‍वावधान में आयोजित वार्षिक थैलेसीमिया अपडेट 2018 में मौजूद लोगों के बीच साझा किया। कार्यक्रम का आयोजन सीएफएआर विभाग के साथ ही साइटोगेनेटिक्स यूनिट, बाल चिकित्सा विभाग, पैथोलॉजी विभाग, ओबस्टेट्रिक्स और स्त्री रोग विभाग, थैलेसेमिक्स इंडिया सोसाइटी, लखनऊ के सहयोग से किया गया।

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता एवं उद्घाटन इरा मेडिकल कॉलेज के कुलपति प्रोफेसर अब्बास अली मेहदी एवं प्रोफेसर अमिता जैन ने किया। इस अवसर पर मानव आनुवंशिकी संस्थान, अहमदाबाद, गुजरात के निदेशक डॉ0 जयेश शेथ, पीजीआई, चंडीगढ़ के पीडियाट्रिक्स विभाग के प्रोफेसर इनुशापन ग्राही, केजीएमयू के हेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एके त्रिपाठी सहित अन्य विशेषज्ञों ने थैलेसीमिया रोग के बचाव व उपचार पर अपनी जानकारी साझा की।

 

इस अवसर पर इस बीमारी से पीड़ित मरीज और उसके ने विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। इस दौरान लखनऊ निवासी एक पीड़ित सोनी यादव ने इस बीमारी के बारे में अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्हें ढाई साल की उम्र में इस बीमारी के होने का पता चला। हालांकि उनके परिवार ने कभी इस बीमारी को उनकी पढा़ई-लिखाई में आड़े नहीं आने दिया और फिलहाल वह फार्मासिस्ट की पढ़ाई कर रहीं हैं।

 

जाने क्या है थैलेसीमिया और इससे बचने के उपाय

 

आपको बता दें कि थैलेसीमिया खून की एक गंभीर बीमारी हैं इस बीमारी से ग्रस्त बच्चे को 3 महीने से 1 साल की उम्र के बीच खून की कमी होने लगती है। थैलेसीमिया के कारण होने वाली खून की कमी को रक्त चढ़ती मात्रा को कम करने के लिए डेस्फराल या केल्फर या डेफेरीसिराक्स नामक दवाई शुरू करनी पड़ती है। थैलेसीमिया मेजर एक प्रकार की अनुवांशिक बीमारी है।

 

बीटा-थैलेसीमिया बीमारी मे हीमोग्लोबिन बनाने वाली बीटा-ग्लोबिनजीन की खराबी होती है जिससे हीमोग्लोबिन सही मात्रा में नहीं बन पाता है। यह बीमारी तभी होती है जब बच्चे के जीन की दोनों प्रतियों (माता और पिता से मिली एक-एक प्रति) में खराबी हो। यह तब ही संभव है जब माता-पिता में एक की बीटा-ग्लोबिनजीन खराब हो। ऐसा व्यक्ति जिसमें जीन की एक प्रति खराब हो उसे कैरियर कहते हैं।

 

प्रसव पूर्व गर्भपरीक्षण

गर्भवती स्त्री के गर्भ में बच्चे की जांच 10-12 हफ्ते पर सीवीएस या 14-16 हफ्ते में गर्भ के पानी की जांच से कर सकते हैं। यह पता लगाया जाता है कि वह बच्चा थैलेसीमिया मेजर से ग्रसित है या नहीं। यदि निदान में पता चलता है कि बच्चा ग्रसित है तो गर्भपात का उपाय माता-पिता को बताया जा सकता है। इससे परिवार में थैलेसीमिया मेजर से ग्रस्त बच्चे के जन्म की पीड़ा से बचाव हो सकता है।