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पाइका जैसे मानसिक विकार वाले अनेक रोगों का सटीक इलाज है होम्योपैथी में

-सेफ्टी पिन, कील, ब्लेड, कपड़ा, कागज़ जैसी न खाने योग्य चीजों को खाने की पड़ जाती है आदत

डॉ गिरीश गुप्ता

सेहत टाइम्स

लखनऊ। न खाने योग्य चीजें जैसे मिट्टी, दीवार का पेंट, चॉक, कपड़ा, कागज़, नाखून चबाने के अलावा शरीर को नुकसान पहुंचाने वाली वस्तुओं बाल, कील, सेफ्टी पिन, ब्लेड आदि अगर कोई व्यक्ति खाने की तरह खाता है तो यह एक बड़ी और जान की जोखिम वाली समस्या है। मेडिकल टर्मिनोलॉजी में इस रोग को पाइका (Pica) कहते हैं। मनःस्थिति से जुड़े इस रोग का इलाज होम्योपैथी में सम्भव है।

आपको बता दें कि पिछले दिनों सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा था जिसमें सर्जरी के दौरान एक लड़की के पेट से बड़ी मात्रा में सेफ्टी पिन निकाले जा रहे हैं, बताया जाता है कि इस लड़की को सेफ्टी पिन खाने की ऐसी लत लगी कि अक्सर ही वह सेफ्टी पिन खा लेती थी। जब उसके पेट में दर्द हुआ और वह डॉक्टर के पास पहुंची तो डॉक्टर्स को असलियत का पता चला। इसी के बाद डॉक्टरों ने सर्जरी करने का फैसला लिया। वीडियो में सर्जरी कर रहे डॉक्टर भी इतनी बड़ी संख्या में सेफ्टी पिन खाने पर आश्चर्य जता रहे हैं।

डॉ गौरांग गुप्ता

इस विषय में सेहत टाइम्स ने लखनऊ के गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च के चीफ कंसल्टेंट ख्यातिलब्ध वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता से बात की तो उन्होंने जो बताया वह पाइका जैसी समस्या से ग्रस्त मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। डॉ गिरीश ने बताया कि जैसा कि मैं हमेशा से कहता आया हूँ कि होम्योपैथी में इलाज रोग का नहीं रोगी का होता है। यानी रोगी की शारीरिक दिक्कत के साथ ही उसकी मनःस्थिति की पूरी हिस्ट्री ली जाती है। इसके साथ ही व्यक्ति की प्रकृति जैसे उसकी पसंद-नापसंद के बारे में जानकारी ली जाती है। व्यक्ति को किन चीजों से डर लगता है, विशेष प्रकार के सपने तो नहीं आते हैं, उसका स्वभाव के साथ ही उसके साथ घटी ऐसी घटनाओं, जिनका उसके ऊपर गहरा असर हुआ हो, की विस्तार से जानकारी लेने के बाद ही उस मरीज विशेष के लिए उपयुक्त दवा का चुनाव किया जाता है। इसीलिए होम्योपैथी में एक रोग के उपचार के लिए दर्जनों दवाएं हैं, जिन्हें अलग-अलग रोगियों को उनकी प्रकृति के हिसाब से दिए जाने का सिद्धांत इसके जनक डॉ सैमुअल हैनिमैन ने बनाया है।

रिसर्च सेंटर के कंसल्टेंट डॉ गौरांग गुप्ता, जिन्होंने होम्योपैथिक में एमडी सायकियाट्री से किया है, ने बताया कि न सिर्फ मिट्टी, दीवार का पेंट, चॉक, कपड़ा, कागज़, नाखून, बाल, कील, सेफ्टी पिन, ब्लेड आदि खाने की आदत छुड़वाने की दवाएं हैं, बल्कि ऐसे डर की भी दवाएं हैं जिनमें बच्चे कील, सुई, जलती हुई माचिस जैसी वस्तुओं को देखकर ही घबरा जाते हैं। उन्होंने बताया कि मनःस्थिति जुड़ी समस्याओं का होम्योपैथी में बहुत अच्छा इलाज उपलब्ध है, बशर्ते लक्षण और हिस्ट्री के आधार पर उस मरीज विशेष के लिए अनुकूल दवा का चुनाव किया जाये।

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