-जटिल क्रेनियोफेशियल सर्जरी का प्रशिक्षण देने के लिए आयोजित हो रही वर्कशॉप
-भारत में लम्बे समय से बना हुआ है क्रेनियोफेशियल सर्जरी के प्रशिक्षण की सुविधा का अभाव
-80 प्रतिशत प्लास्टिक सर्जन को नहीं होती है क्रेनियोफेशियल सर्जरी की जानकारी

सेहत टाइम्स
लखनऊ। जन्मजात विकारों, कैंसर, किसी सर्जरी के दौरान, गोली लगने से अथवा रोड एक्सीडेंट आदि के चलते विकृत हो चुके सिर व चेहरे को करेक्ट करने के लिए की जाने वाली स्पेशियलिटी क्रेनियोफेशियल सर्जरी एक जटिल सर्जरी है, जो क्रेनियोफेशियल सर्जन न्यूरो सर्जन के साथ मिलकर करता है, इस सर्जरी का प्रशिक्षण अत्यन्त महत्वपूर्ण है जो कि विदेशों में होता है लेकिन भारत में उपलब्ध नहीं है, इसीलिए इस विधा के सर्जन की संख्या भारत में बेहद कम हैं, उन्होंने बताया कि 80 प्रतिशत प्लास्टिक सर्जन क्रेनियोफेशियल सर्जरी नहीं कर पाते हैं। पिछले वर्षों की भांति इस वर्ष भी इस सर्जरी को सिखाने के उद्देश्य से ‘इंडो गल्फ क्रेनियोफेशियल हैन्ड्स ऑन वर्कशॉप ऑन क्रेनियल वॉल्ट रीमॉडलिंग एंड ऑस्टियोसिंथेसिस’ का आयोजन कल 4 मार्च को यहां होटल क्लार्क्स अवध में किया जा रहा है।


यह जानकारी आज आयोजित पत्रकार वार्ता में इस कार्यशाला के आयोजक व कोर्स डाइरेक्टर (भारत) संजय गांधी पीजीआई के प्लास्टिक सर्जरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ राजीव अग्रवाल, कोर्स डाइरेक्टर (ओमान सल्तनत) डॉ तैमूर अल बुलुशी व कोर्स डाइरेक्टर (सऊदी अरब) डॉ टगरीड अल हम्सी ने संयुक्त रूप से दी। 20 वर्ष पूर्व अमेरिका से दो साल प्लास्टिक सर्जरी व एक साल क्रेनियोफेशियल सर्जरी का प्रशिक्षण लेने वाले डॉ राजीव अग्रवाल ने बताया कि होटल क्लार्क्स अवध में कल आयोजित एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में लगभग 40 प्रतिभागी भाग ले रहे हैं। उन्होंने बताया कि प्रथम चरण में चार घंटे का वर्कशॉप कार्यक्रम रखा गया है जिसमें इस सर्जरी के बारे में प्रतिभागियों को थ्योरी की जानकारी दी जायेगी जबकि इसके बाद तीन घंटे इस सर्जरी के लिए प्रैक्टिकल हैंड्स ऑन वर्कशॉप यानी इस सर्जरी को खोपड़ी के मॉडल पर प्रैक्टिकल करके प्रतिभागियों को सिखाया जायेगा।
डॉ राजीव अग्रवाल ने इस सर्जरी के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए बताया कि इस सर्जरी में फेस की खाल को, खोपड़ी की खाल को उतारा जाता है। उन्होंने विस्तार से बताते हुए कहा कि दरअसल हमारी खोपड़ी में कई सूचर यानी जोड़ होते हैं, जेनेटिक कारणों से जो सूचर फ्यूज हो जाते हैं तो उस जगह की ग्रोथ रुक जाती है, जबकि दूसरी जगह पर ग्रोथ होती रहती है जिसकी वजह से खोपड़ी में विकृति आ जाती है। इसकी पहचान के बारे में उन्होंने बताया कि देखने से ही सिर की विकृति दिख जाती है, जैसे सिर कहीं ज्यादा बड़ा कहीं छोटा दिखता है, दोनों आंखों के बीच की दूरी ज्यादा होती है, जो कि आसानी से नजर आ जाती है। बहुत छोटे बच्चे में सीटी स्कैन की मदद भी ली जाती है।
डॉ तैमूर ने बताया कि जैसे खोपड़ी के यदि दो सूचर फ्यूज हो गये, तो उस जगह ग्रोथ रुक जाती है लेकिन उसके नीचे ब्रेन डेवलप कर रहा है लेकिन सूचर फ्यूज होने से उसे बढ़ने का रास्ता नहीं मिल पाता है, जिससे ब्रेन पर दबाव पड़ता है जिससे बच्चे को आंखों की दिक्कत, दिव्यांगता, सोने में परेशानी जैसी विभिन्न प्रकार की दिक्कतें शुरू हो जाती हैं यहां तक कि मृत्यु तक हो जाती है, ऐसे बच्चों की सर्जरी तीन माह से 9 माह की उम्र तक में हो जानी ठीक रहती है। उन्होंने बताया कि सिंड्रोम केस छोड़कर दूसरे प्रत्येक केस में आदर्श ट्रीटमेंट की उम्र अलग होती है। उन्होंने बताया कि क्रेनियोफेशियल की दिक्कत सिर्फ बच्चों में ही नहीं पायी जाती है बल्कि दुर्घटना, गोली लगने, कैंसर, गलत सर्जरी आदि किसी भी कारण से हुई विकृति से पीडि़त बड़ों में भी होती है।
डॉ राजीव ने बताया कि सर्जरी करने की प्रक्रिया में हम सूचर को खोलकर पूरी खोपड़ी को उतार लेते हैं नीचे सिर्फ ब्रेन रह जाता है। इस उतारने की प्रक्रिया के समय न्यूरो सर्जन की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण होती है, खोपड़ी को उतार कर जहां-जहां वह दबी हुई है या फूली हुई है उसे ठीक करके उस पर खाल चढ़ाकर वापस ब्रेन के ऊपर लगा देते हैं।
