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काश ज़हीर खान को मिल जाता अच्छा ट्रीटमेंट तो कैरिअर ख़त्म न होता

 

केजीएमयू में खुलेगा प्रदेश का पहला स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर

 

लखनऊ. क्रिकेटर ज़हीर खान को अगर समय पर अच्छा फीज़ियोथेरेपिस्ट मिल जाता तो उसका कैरिअर समाप्त नहीं होता. चूँकि अक्सर ज़हीर अक्सर चोटिल हो जाते थे, इसलिए टीम से बाहर रहना पड़ता था. उस समय उन्हें एक अच्छे फीज़ियोथेरेपिस्ट और ट्रीटमेंट की जरूरत थी, लेकिन वह नहीं मिल पाया. खिलाड़ियों को चोट लगना बहुत स्वाभाविक बात है लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि उन्हें यह बताया जाये कि वह ऐसा क्या करें जिससे उन्हें चोट लगने की संभावना न रहे या कम रहे. यही नहीं उन्हें चोट लगने के बाद किस तरह का विशेष ट्रीटमेंट दिया जाये जिससे उनके कैरिअर पर असर न पड़े. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर ही स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर की स्थापना की जाती है. उत्तर प्रदेश में पहला स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी में बनेगा. इसके लिए भारत सरकार से 12.5 करोड़ रुपये की सहायता केजीएमयू को दी गयी है.

यह जानकारी आज यहाँ आयोजित एक पत्रकार वार्ता में केजीएमयू के ओर्थोपेडिक सर्जन प्रो. आशीष कुमार और फीजियोलॉजी के प्रो. नर सिंह वर्मा ने देते हुए बताया केंद्र से यह धनराशि सेंटर के निर्माण और उसे पांच साल चलाने के लिए दी गयी है. पांच साल बाद इसे चलाने की जिम्मेदारी केजीएमयू की होगी. इस सेंटर के बन जाने से जहाँ चोटिल खिलाड़ियों का गुणवत्तायुक्त इलाज हो सकेगा वहीँ स्पोर्ट्स मेडिसिन में पोस्ट ग्रेजुएट और डिप्लोमाधारक भी तैयार हो सकेंगे.

उन्होंने बताया कि भारत सरकार के मिनिस्ट्री ऑफ़ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स ने देश भर में पांच स्थानों को स्पोर्ट्स मेडिसिन सेंटर खोलने के लिए चुना था, उनमें केजीएमयू भी शामिल है. उन्होंने बताया कि देश भर में गिने-चुने स्थानों पर ही इस तरह के सेंटर उपलब्ध हैं, जबकि उत्तर प्रदेश और आस-पास के प्रदेशों में यह पहला सेंटर है जहाँ खिलाड़ियों का इलाज के साथ ही स्पोर्ट्स स्पेशलिस्ट डॉक्टर भी तैयार किये जायेंगे.

उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश में 68 स्टेडियम, 3 स्पोर्ट्स कॉलेज, 5 हॉकी स्टेडियम, 13 बास्केटबॉल स्टेडियम के अलावा अनेक क्रीड़ा स्थान हैं लेकिन स्पोर्ट्स इंजरी के लिए कोई स्पेशलिस्ट संस्थान नहीं है. अब यह उत्तर प्रदेश का पहला तथा भारत का छठा स्पोर्ट्स मेडिसिन संस्थान बनने जा रहा है. उन्होंने बताया कि उम्मीद है कि इसमें अगले वर्ष से पोस्टग्रेजुएट कोर्स के तहत एमडी की 2 सीटों तथा डिप्लोमा की 3 सीटों पर पढ़ाई शुरू हो जाएगी. इस विभाग में पांच शिक्षकों की नियुक्ति की जायेगी.

डॉक्टरों ने बताया कि इस सेंटर का मुख्य उद्देश्य स्पोर्ट्स सेंटर, स्पोर्ट्स कॉलेज, सपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (साई) के एक क्षेत्रीय, छह प्रशिक्षण केंद्र एवं 8 अतिरिक्त सेंटर जो कि उत्तर प्रदेश में स्थित हैं, के साथ ही आस पास के प्रदेशों के इसी प्रकार के संस्थानों को जोड़ना तथा इनमें प्रशिक्षण पा रहे खिलाड़ियों को स्टेट ऑफ़ आर्ट, उत्कृष्ट सुविधाएं प्रदान करना है. विश्वस्तरीय अन्य संस्थाओं से सहयोग (एमओयू) करना तथा जिन छह संस्थानों के साथ सहयोग चल रहा है उसे आगे बढ़ाना एवं शोध कार्य करना है. इस सेंटर पर ओर्थोस्कोपी की सुविधा भी मिलेगी.

डॉक्टरों ने बताया कि प्रतिस्पर्धा वाले खेलों में खिलाड़ियों को अक्सर चोटें लगती रहती हैं. सामान्यतः इसका इलाज साधारण डॉक्टरों द्वारा ही किया जाता है. इसी कार्य के लिए प्रशिक्षण प्राप्त चिकित्सक, फीज़ियोथेरेपिस्ट एवं अन्य प्रकार की सुविधाओं के अभाव में खिलाड़ी का कैरिअर बिगड़ सकता है. एक सवाल के जवाब में डॉ. वर्मा ने बताया कि ज़हीर खान फ़ास्ट बॉलर था. दरअसल होता यह है कि फ़ास्ट बॉलर को सबसे ज्यादा दिक्कत पैरों में होती है पैरों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे वह अनफिट हो जाता है. ज़हीर खान के साथ भी ऐसा होता था वह खेल कम पाते थे, अक्सर चोटिल होकर टीम से बाहर हो जाते थे. इसी के विपरीत कपिल देव ऐसे खिलाड़ी थे जो कभी चोटिल होकर टीम से बाहर नहीं रहे. डॉ. वर्मा ने कहा कि बहुत कुछ खिलाड़ी के दृढ़ संकल्प (determination) पर भी निर्भर करता है कि वह अपने आप के साथ कितना सामंजस्य बना कर खेलता है.

 

 

 

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