-रक्त और उसके अवयव भाग 1
-सामान्य व्यक्ति और मेडिकल स्टूडेंट, दोनों को उपयोगी जानकारियां मिलेंगी एक प्लेटफॉर्म पर
-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ जानकारियों की शृंखला शुरू की ‘सेहत टाइम्स’ ने
-केजीएमयू, आरएमएलआई और एसजीपीजीआई में महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं प्रो एके त्रिपाठी

सेहत टाइम्स/धर्मेन्द्र सक्सेना
लखनऊ। स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा दोनों महत्वपूर्ण विषय हैं, प्रत्येक व्यक्ति स्वस्थ रहना चाहता है, लेकिन कभी जानकारी के अभाव में तो कभी लापरवाहीवश वह ऐसी गलतियां कर बैठता है जिससे बीमारियों का शिकार हो जाता है। जाहिर है कि अगर व्यक्ति जानकार और जागरूक रहे तो जीवन का आनंद स्वस्थ रहकर उठा सकता है। स्वस्थ कैसे रहें, इसके बारे में हमें अक्सर यह बताया जाता है कि फलां-फलां बातों का ध्यान रखें तो फलां बीमारी से बच सकते हैं। इस तरह की हिदायत देना सही है लेकिन यही बात अगर व्यक्ति को विस्तृत रूप में कारणों के साथ, उसका शरीर पर किस प्रकार प्रभाव पड़ता है, बताते हुए बतायी जाये तो जागरूकता का लेवल बढ़ जाता है।
इसी प्रकार चिकित्सा शिक्षा की बात करें तो विशेषकर हिन्दी भाषी क्षेत्रों में जहां शिक्षा का माध्यम भले ही अंग्रेजी का होता है लेकिन आमतौर पर घरों के अंदर बात तो हिन्दी में ही होती है, मेडिकल स्टूडेंट सोचता तो हिन्दी में ही है, डॉक्टर बनने पर उसके पास आने वाला मरीज भी ज्यादातर हिन्दी भाषा का ही जानकार होता है, तो ऐसे में जानकारी के मर्म तक पहुंचने और उसे दूसरे को समझाने में भाषा की बड़ी भूमिका होती है। सिर्फ रटकर परीक्षा में पास तो हुआ जा सकता है लेकिन रटने से वास्तविक ज्ञान हासिल होना कठिन है। मेडिकल स्टूडेंट की इसी समस्या को समझने के साथ ही आम व्यक्ति को स्वस्थ रखने के लिए उसे आसानी से समझाने के लिए करीब डेढ़ दशक पूर्व वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो अनिल कुमार त्रिपाठी (प्रो ए.के.त्रिपाठी) ने हिन्दी में दो पुस्तकें लिखी थीं। पहली है ‘एनीमिया कुछ रोचक जानकारियां’ तथा दूसरी है ‘प्लेटलेट्स की कमी भ्रांतियां एवं समाधान’। ये दोनों ही पुस्तकें रक्त संबंधी अनेक महत्वपूर्ण जानकारियों से भरपूर हैं। ज्ञात हो प्रो त्रिपाठी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय के क्लीनिकल हीमेटोलॉजी विभाग के डीन एवं विभागाध्यक्ष तथा डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान, लखनऊ व संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) लखनऊ के निदेशक रह चुके हैं।
रक्त और उसके अवयवों के बारे में रुचिकर तरीके से जानकारी देकर आम व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुण बताने तथा मेडिकल स्टूडेंट्स को उनकी शिक्षा को रुचिकर बनाने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ प्रो एके त्रिपाठी से बातचीत कर शृंखलाबद्ध तरीके से एक से बढ़कर एक जानकारी से अपने पाठकों को अवगत कराने जा रहा है।
पाठक भी पूछ सकते हैं अपने प्रश्न
प्रत्येक एपीसोड के विषय में कोई भी व्यक्ति अथवा मेडिकल स्टूडेंट का कोई प्रश्न होगा तो प्रो एके त्रिपाठी के हवाले से उस प्रश्न का उत्तर दिया जायेगा। (आपकी स्क्रीन पर दिये व्हाट्सऐप बटन पर क्लिक कर अपना प्रश्न भेज सकते हैं)
एनीमिया यानी शरीर में खून की कमी की शिकायत रोगियों में आम है। एक बड़ी आबादी एनीमिया से ग्रस्त है। इसका प्रकोप हर उम्र के लोगों में देखा जाता है। हमने प्रो एके त्रिपाठी से बातचीत का सिलसिला एनीमिया से ही शुरू किया।
प्रश्न: गर्भवती स्त्रियों सहित अनेक लोगों में खून की कमी यानी एनीमिया बीमारी के बारे में बताइये
प्रो त्रिपाठी: एनीमिया (रक्त अल्पता) किसी एक बीमारी का नाम नहीं बल्कि लक्षण मात्र है जिसमें हीमोग्लोबिन की मात्रा में कमी होने की वजह से शरीर में तरह तरह की परेशानियां उत्पन्न हो जाती हैं।
हमारा रक्त मुख्यतः दो भागों से बना होता है, रक्त कोशिकाएं तथा द्रव वाला हिस्सा। द्रव वाले हिस्से को प्लाज़्मा कहते हैं जो लगभग दो तिहाई होता है। प्लाज़्मा में मुख्यतः प्रोटीन होते हैं जो शरीर निर्माण, वृद्धि, मरम्मत तथा सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। रक्त में लगभग 40% हिस्सा रक्त कोशिकाओं का होता है। रक्त कोशिकाएं तीन प्रकार की होती हैं, लाल रक्त कोशिकाएं (Red Blood cells, RBC) श्वेत रक्त कोशिकाएं (White Blood cells, WBC) तथा प्लेटलेट्स (Platelets)। लाल रक्त कोशिकाओं का मुख्य कार्य फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर शरीर के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाना है जिससे सारे अंग सुचारु रूप से कार्य कर सकें। WBC का कार्य शरीर को रोगों से लड़ने के लिए सुरक्षा प्रदान करना है तथा प्लेटलेट्स का कार्य शरीर में हो रहे अनावश्यक तथा अत्यधिक रक्तस्राव को रोकना है।
आर. बी. सी. लाल रंग का होता है और यह लाल रंग उसमें उपस्थित एक पदार्थ हीमोग्लोबिन की वजह से है। हीमोग्लोबिन के दो हिस्से हैं हीम एवं ग्लोबिन। हीम अवयव में लौह तत्व होता है जो आक्सीजन को अपने में समेट कर शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाता है जबकि ग्लोबिन एक प्रोटीन है जो हीम अणुओं को सहारा देता है। अंगों को सुचारु रूप से कार्य करने के लिए तथा शरीर में ऊर्जा प्रदान करने के लिए आक्सीजन की आवश्यकता होती है। अतः हीमोग्लोबिन की कमी (एनीमिया) हो जाने पर ऊर्जा की कमी से लोगों को काफी कमज़ोरी लगने लगती है। सामान्यतः स्वस्थ पुरुषों में 13-16 ग्राम% तथा स्त्रियों में 12-14 ग्राम% हीमोग्लोबिन होता है। यदि हीमोग्लोबिन इससे कम हो जाय तो एनीमिया कहते हैं।
प्रश्न: एनीमिया को पहचानने के लक्षण क्या हैं ?
प्रो त्रिपाठी: देखिये सबसे पहले तो रक्त की कमी वाले व्यक्ति का रंग फीका सा दिखता है, उसकी त्वचा में वह चमक नहीं होती है जो होनी चाहिये। इसके अलावा बेहद कमजोरी लगना, चक्कर आना, थोड़ी सी मेहनत पर सांस फूलना व धड़कन बढ़ जाना, याददाश्त व एकाग्रता में कमी होना, हाथों पैरों में दर्द, सनसनाहट इत्यादि।
इसके अलावा भूख कम हो जाना तथा खाने में स्वाद की कमी, पाचन में परेशानी, एनीमिया की वजह से कोई परेशानी होती है या नहीं, मुख्यत: इस बात पर निर्भर करता है कि हीमोग्लोबिन कितना कम हुआ है। उदाहरण के तौर पर यदि हीमोग्लोबिन गिरकर 4-5 ग्राम% हो जाता है तो ऐसे में मरीज की स्थिति गम्भीर हो सकती है, और यदि यह 10-11 ग्राम% है तो कोई परेशानी नहीं होती है। एनीमिया के लक्षण इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि हीमोग्लोबिन में गिरावट कितनी तेज़ी से हुआ है। उदाहरण स्वरूप यदि किसी व्यक्ति में हीमोग्लोबिन लेवल 2 दिनों में 13 ग्राम से घटकर 8 ग्राम% हो जाता है (जैसे कि बवासीर से रक्तस्राव होने पर) तो उसमें गम्भीर लक्षण पैदा हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि किर में हीमोग्लोबिन 13 ग्राम% से 8 ग्राम% धीरे-धीरे तथा कुछ महीनों में होता है तो उसमें या तो कोई परेशानी नहीं होती या अगर होती भी है तो बहुत कम।
प्रश्न: जैसा कि आपने कहा कि एनीमिया अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, यह संकेत है तो ऐसे में कोमॉर्बिटीज वाले रोगियों को कैसे सतर्क रहना चाहिये, क्या ये ऐसे लोगों के लिए ज्यादा खतरनाक हो सकता है ?
प्रो त्रिपाठी: हां, एनीमिया कुछ विशेष मरीज़ों में काफी खतरनाक हो सकता है। हृदय रोगियों में धमनियों में रुकावट के कारण पहले से ही रक्त संचार कम रहता है जिससे हृदय को सीमित ऑक्सीजन मिलती है। इस पर एनीमिया यानी खून की कमी गंभीर स्थितियां पैदा कर सकती है। इसके अलावा गुर्दे के रोगियों में भी हीमोग्लोबिन की थोड़ी सी गिरावट गंभीर स्थिति पैदा कर सकती है। इसके अलावा गर्भवती स्त्रियों में हीमोग्लोबिन का स्तर कम बने रहना गर्भवती माता और उसके पेट में पल रहे शिशु के जीवन के लिए खतरनाक हो सकता है।
प्रश्न: एनीमिया होने के कारण क्या है ?
प्रो त्रिपाठी : एनीमिया के प्रमुख तीन कारण हैं 1. लाल रक्त कोशिकाओं का कम बनना 2. लाल रक्त कोशिकाओं का अत्यधिक नष्ट होना तथा 3. शरीर से रक्तस्राव होना। लाल रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति अस्थि मज्जा (बोन मैरो) में होती है। वयस्कों में शरीर की कुछ हड्डियाँ जैसे हाथ-पैर, पसलियां, कूल्हे, पक्खे इत्यादि ही सक्रिय रूप से रक्त बनाने में योगदान देती हैं। लाल रक्त कोशिकाओं के समुचित रूप में उत्पादन के लिए कुछ पदार्थों प्रोटीन, आयरन, विटामिन (बी-12, फोलिक एसिड, पाइरीडाक्सिन) का शरीर में बने रहना आवश्यक है। अतः उपर्युक्त चीज़ों की कमी होने पर एनीमिया हो जाता है। बोनमैरो को सुचारु रूप से सक्रिय रहने के लिए कुछ हारमोन्स की भी आवश्यकता होती है जैसे थायरॉयड हार्मोन तथा एरीथ्रोप्वायटीन। अतः थायरॉयड हार्मोन की कमी से एनीमिया हो सकता है।
प्रश्न : इसकी कमी कैसे पूरी करें ?
प्रो त्रिपाठी: लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण के लिए आवश्यक पदार्थ हैं 1. तत्व- आयरन 2. विटामिन्स- विटामिन बी12, फोलिक ऐसिड, पायरीडाक्सिन 3. हार्मोन्स- थायरॉयड हार्मोन, एरीथ्रोप्वायटीन और 4. प्रोटीन। कुछ रोगियों में बोनमेरो द्वारा लालरक्त कोशिकाएं सुचारु रूप से बनती है परन्तु इनमें एनीमिया रक्त कोशिकाओं के अत्यधिक नष्ट जाने की वजह से होता है, जिसे हिमोलिटिक एनीमिया कहते हैं। बच्चो में इसका प्रमुख कारण है कुछ जन्मजात (अनुवांशिक) रोग (जैसे थैलेसीमिया, सिकिल सेल) जिनमें हीमोग्लोबिन की खराबी रहती है जिससे आर.बी.सी. पूरी तरह परिपक्व होने से पहले ही टूट जाते हैं। एनीमिया का एक अन्य कारण है शरीर से रक्त का स्राव होना। उदाहरण के तौर पर आंतों में कृमि (हुकवर्म) खून चूसते रहते हैं, जिससे कुछ समय बाद रक्त की कमी (एनीमिया) हो जाती है। बवासीर (Piles) से भी काफी समय तक रक्त निकलने से मरीज़ एनीमिया शिकार हो जाता है। इसके अलावा रेडियोथेरेपी तथा कैंसर कीमोथेरेपी के फलस्वरूप बोनमैरो नष्ट हो जाने से भी एनीमिया हो सकता है। कुछ प्रकार की दवाइयां भी बोनमैरो पर बुरा प्रभाव डालती हैं जिससे एप्लास्टिक एनीमिया हो जाता है। एनीमिया की जांच के लिए हीमोग्लोबिन टेस्ट कराया जाता है। इसके अलावा जांच का एक और तरीका भी है, जिसे ऑटोमेटेड ब्लड काउंट कहते हैं।

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