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कैंसर होने का एकमात्र लक्षण भी हो सकता है एनीमिया

-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ ‘सेहत टाइम्स’ की विशेष वार्ता शृंखला

-रक्त और उसके अवयव भाग – 10

प्रो एके त्रिपाठी

धर्मेन्द्र सक्सेना

लखनऊ। रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवारत रह चुके राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा स्वस्थ बने रहने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए जॉर्जियंस आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।

अब तक आपने पढ़ा…

भाग 1 में …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें

भाग 2 में …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें 

भाग 3 में …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें 

भाग 4 में…‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें  

भाग 5 में …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें

भाग 6 में …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये…क्लिक करें 

भाग 7 में … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण…क्लिक करें   

 भाग 8 में … बुढ़ापे में एनीमिया को न करें नजरंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत…क्लिक करें  

भाग 9 में …प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करना जरूरी…क्लिक करें     

प्रस्तुत है शृंखला की अगली कड़ी भाग 10

कैंसर होने का एकमात्र लक्षण भी हो सकता है एनीमिया

प्रो त्रिपाठी ने बताया कि कैंसर रोग में एनीमिया होना आम बात है। कैंसर चाहे किसी अंग का हो जैसे फेफड़ा, प्रोस्टेट, आंत, आमाशय, इत्यादि या रक्त कैंसर हो, कभी-कभी अन्दर पल रहे कैंसर का एकमात्र लक्षण होता है एनीमिया और उसकी वजह से कमज़ोरी। ऐसी परिस्थिति में प्रारम्भिक अवस्था में रोग का पता लगाना कठिन हो जाता है।

इस बारे में उन्होंने एक मरीज का उदाहरण देते हुए बताया कि भोलानाथ की उम्र लगभग 51 वर्ष थी। वह एक सरकारी नौकरी में थे। पिछले छः महीनों से उन्हें कमज़ोरी लगने लगी थी, भूख भी कम लगती थी। उन्होंने इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया, सोचा शायद काम के बोझ से ऐसा हो रहा हो। एक दिन उन्हें सुबह पार्क में टहलते समय चक्कर आ गया तथा गिरते-गिरते बचे। उन्होंने डॉक्टर को दिखाया। वैसे उन्हें हाई ब्लडप्रेशर या शुगर (डायबिटीज) की बीमारी नहीं थी। इससे पहले छोटी-मोटी तकलीफ या बुखार को छोड़कर उन्हें कोई विशेष स्वास्थ्य समस्या नहीं रही। खाने में कोई खास लापरवाही भी नहीं करते थे। रोज 1-2 सिगरेट पीने की आदत पिछले 10-12 वर्षों से थी।

शारीरिक परीक्षण से डॉक्टर को पता चला कि भोलानाथ को एनीमिया है। जांच द्वारा पाया गया कि हीमोग्लोबिन मात्र 5 ग्राम% रह गया है। एनीमिया का कारण जानने के लिए उनसे डॉक्टर ने कुछ सवाल पूछे। भोलानाथ के भोजन में भी कोई खास कमी न थी और न ही उनका पेट खराब रहता था। कहीं से कोई रक्तस्राव भी नहीं होता था। बुखार या अन्य कोई इन्फेक्शन भी नहीं था। खून की जांच में डब्ल्यू बी सी व फ्लेट्लेट्स सही थे। आर.बी.सी. की संख्या में कमी थी पर उसमें कोई खास खराबी नहीं दिख रही थी। आयरन तथा विटामिन बी-12 की मात्रा भी सही थी। लिवर व गुर्दे सम्बंधी जांचे भी सही थीं। एनीमिया का कोई कारण नहीं मिल रहा था। बोन मैरो की जांच भी की गई पर वह भी लगभग सामान्य था हालांकि उसमें थोड़ा संकेत था कि शायद आर.बी.सी की उत्पत्ति में कुछ खराबी है। एक और जांच, ई. एस. आर. काफी ज़्यादा था (60 mm/hr)। काफी बढ़े हुए ESR से किसी रोग विशेष का पता तो नहीं चलता पर इससे अवश्य किसी खतरनाक व महत्वपूर्ण बीमारी का संकेत मिलता है।

प्रो त्रिपाठी ने बताया कि इतना सबकुछ किये जाने के बाद भी एनीमिया के कारण का पता नहीं चल पाया फिर भी भोलानाथ को कुछ विटामिन्स तथा आयरन की गोलियां दे दी गईं। बढ़ती कमज़ोरी को देखते हुए उन्हें 2 बोतल खून भी चढ़ाया गया। लगभग 3 महीने बाद भोलानाथ बाथरूम में गिर गये। उनके दाएं हाथ व कूल्हे की हड्डी में फ्रैक्चर हो गया। एक्स-रे से पता चला कि शरीर की लगभग सभी हड्डियों में कमज़ोरी व खराबी (Osteolysis) आ गई है। इससे संदेह हुआ कि शायद उन्हें कैंसर है जो अब फैलकर हड्डियों में आ गया है। चूंकि भोलानाथ धूम्रपान करते थे इसलिए पहला शक फेफड़ों के कैंसर पर गया। सी०टी० स्कैन कराया गया पर फेफड़ों में कोई कैंसर नहीं था। पुरुषों में प्रोस्टेट ग्रन्थि का कैंसर भी काफी देखने में आता है जिससे मरीज को पेशाब में रुकावट हो सकती है। परन्तु भोलानाथ में ऐसी कोई तकलीफ नहीं थी। फिर भी प्रोस्टेट ग्रन्थि से सम्बन्धित एक जांच PSA (Prostate specific anti-gen) कराया गया। सीरम पी एस ए काफी बढ़ा हुआ था (30 ng/ml) जबकि इसका सामान्य लेवल 4ng/ml से कम है।

यूरोलाजिस्ट ने बाद में अन्य जांचे कराई तथा प्रोस्टेट कैंसर की पुष्टि की। इस रोग का समुचित इलाज किया गया। कुछ ही महीनों में इलाज से हड्डियों के दर्द में काफी कमी हो गई तथा हीमोग्लोबिन बढ़कर 10 ग्राम% हो गया।

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प्रो त्रिपाठी ने बताया कि कैंसर के मरीजों में एनीमिया कई वजह से हो सकता है। मरीज़ों में भूख कम होने के कारण शरीर में पर्याप्त खुराक नहीं पहुंच पाती है। इसके अलावा रोग से या दवाओं के प्रयोग से बार-बार मिचली उल्टी होती रहती है तथा पाचन भी गड़बड़ रहता है। इससे भोजन में उपस्थित आवश्यक तत्व शोषित नहीं हो पाते। कीमोथेरैपी से बोनमैरो पर बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति भी प्रभावित होती है। कैंसर के मरीजों में विभिन्न प्रकार के नुक्सानदेह केमिकल (साइटोकाइन्स) पैदा हो जाते हैं जो बोन मैरो को सामान्य रूप से काम नहीं करने देते।

कैंसर के मरीजों में एनीमिया से बचने के लिए या उसके उपचार के लिए प्रयास किया जाता है। ऐसे मरीजों को उल्टी मिचली की दवा दी जाती है जिससे वे भोजन सुचारु रूप से ग्रहण कर सकें। यदि हीमोग्लोबिन की मात्रा काफी कम रहती है तो रक्त चढ़वाना पड़ता है जिससे हीमोग्लोबिन सामान्यतः 10 ग्राम% तक बनी रहे। कैंसर के मरीजों में हीमोग्लोबिन बढ़ाने के लिए EPO (एरीथ्रोप्वायटिन) का भी प्रयोग किया जाता है। यह एक हार्मोन है जो बोन मैरो पर असर कर RBC की उत्पत्ति को बढ़ाता है। इसको देने का निर्णय सावधानीपूर्वक करना चाहिए क्योंकि इसके प्रयोग से यह देखा गया है कि कोई-कोई कैंसर बढ़ने लगते हैं। हीमोग्लोबिन को 12 ग्राम% से ज्यादा नहीं बढ़ने देना चाहिए वरना रक्त में थक्के (Thrombosis) बनने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि कैंसर के मरीजों में वैसे भी Thrombosis का ज़्यादा खतरा रहता है।

कैंसर रोगियों को क्यों ज्यादा होता है एनीमिया का खतरा

1. भूख कम लगना।

2. पाचन में गड़बड़ी, उल्टी व मिचली होना।

3. रक्तस्राव ।

4. कीमोथिरैपी से एनीमिया।

5. बोनमैरो का कम काम करना।