Wednesday , May 20 2026

प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करना जरूरी

-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ ‘सेहत टाइम्स’ की विशेष वार्ता शृंखला

-रक्त और उसके अवयव भाग – 9

प्रो एके त्रिपाठी

सेहत टाइम्स

लखनऊ। रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवारत रह चुके राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा स्वस्थ बने रहने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए जॉर्जियंस आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।

अब तक आपने पढ़ा…

भाग 1 में …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें

भाग 2 में …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें 

भाग 3 में …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें 

भाग 4 में…‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें  

भाग 5 में …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें

भाग 6 में …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये

भाग 7 में … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण    

 भाग 8 में …बुढ़ापे में एनीमिया को न करें नजरंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत  

प्रस्तुत है शृंखला की अगली कड़ी भाग 9

बड़ी चुनौती है गर्भावस्था में एनीमिया न होने देना

P.C. Narayana Health

प्रो त्रिपाठी बताते हैं कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया की जांच कराते रहना आवश्यक है, एनीमिया से बचे रहना भी किसी चुनौती से कम नहीं होता है। उन्होंने बताया कि गर्भावस्था में गर्भ में पल रहे भ्रूण में समुचित रूप से रक्त बनाये रखने के लिए अधिक रक्त की आवश्यकता होती है। यह प्लाज्मा और रक्त कणिकाओं दोनों के बढ़ने से होता है लेकिन अपेक्षाकृत प्लाज्मा की मात्रा ज्यादा बढ़ती है. जिससे आरबीसी का Dilution हो जाता है, फलस्वरूप हीमोग्लोबिन की मात्रा गिर जाती है। इस अवस्था को हाइड्रीमिया भी कहते हैं। अतः गर्भवती महिलाओं (Pregnant Ladies) में सामान्यतः जो महिलायें गर्भवती नहीं है, उनकी अपेक्षा हीमोग्लोबिन कम होता है। स्पष्ट है कि गर्भावस्था के दौरान समय-समय पर हीमोग्लोबिन की जांच कराते रहना चाहिए।

प्रो त्रिपाठी ने बताया कि वैसे आर.बी.सी को अधिक मात्रा में बनाये रखने की आवश्यकता को पूरा करने के लिए अस्थिमज्जा पूरा प्रयास करता है। इस तरह से अधिक उत्पादन करने के लिए और अधिक (अलग से) पोषक तत्वों के पोषण के अभाव में आर.बी.सी का यथोचित उत्पादन न होने से एनीमिया हो जाता है। आर.बी.सी और हीमोग्लोबिन के उत्पादन के लिए आयरन, फोलिक एसिड, विटामिन बी-12 की आवश्यकता होती है। विटामिन बी-12 का भण्डार लिवर में प्रचुर मात्रा में होता है, इसलिए प्रायः कमी नहीं होने पाती। लेकिन आयरन और फोलिक एसिड का सीमित मात्रा में होने के कारण गर्भावस्था के दौरान प्रायः कमी हो जाती है। आयरन और फोलिक एसिड को गोली के माध्यम से लेना पड़ता है। गर्भावस्था के पहली तिमाही में उल्टी, मिचली, भूख का कम लगना प्रायः बना रहता है जिससे पोषण में और भी कमी हो जाती है। इन सब कारणों से गर्भावस्था के दौरान और बाद में भी आवश्यक तत्वों की भरपाई करना जरूरी हो जाता है। फोलिक एसिड देने से भ्रूण के विकास में होने वाले विकार भी कम देखे गये हैं।

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यदि आपके मन  में हैं इस विषय को लेकर कोई प्रश्न तो कृपया अपनी स्क्रीन पर बने व्हाट्सअप बटन पर क्लिक कर अपना प्रश्न भेजें, प्रश्न का उत्तर प्रो एके त्रिपाठी द्वारा दिया जायेगा

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उन्होंने बताया कि यदि गर्भवती को एनीमिया है तो सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हीमोग्लोबिन कम से कम 9-10 ग्राम के बीच बना रहे। एनीमिया रहने से न केवल माँ की जान को खतरा रहता है, बल्कि गर्भ में पल रहे भ्रूण का विकास भी कम होता है या समय से पहले प्रसव हो सकता है, जिसके अलग दुष्परिणाम होते हैं।

गर्भावस्था में अत्यधिक एनीमिया होने पर प्रायः पेट की तकलीफ या पाचन में कमी होने की वजह से आयरन की टेबलेट मरीज सहन नहीं कर पाता है। उल्टी होती है या दस्त आते हैं या पेट साफ नहीं होता। ऐसी अवस्था में आयरन को ड्रिप के माध्यम से देना पड़ता है। आयरन इन्जेक्शन (आयरन सुक्रोज तथा आयरन पॉलीमाल्टोज़) उपलब्ध हो जाने से अब ये अत्यधिक सुरक्षित और फायदेमंद है। पहले उपलब्ध दवाओं जैसे आयरन डेक्ट्रोज से खतरा उत्पन्न होने का डर था। चूंकि गर्भावस्था में माँ और बच्चों दोनों में पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है इसलिए शरीर में आयरन का भण्डार खत्म हो चुका होता है। अतः प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करते रहना चाहिए तथा डाक्टर की सलाह और जाँच के आधार पर ही दवा बन्द करनी चाहिए।