-बनावटी स्वाद के चक्कर में असली जिन्दगी दांव पर
-विश्व तम्बाकू निषेध दिवस (31 मई) पर प्रो सूर्यकान्त का विशेष लेख

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) World Health Organization द्वारा विश्व तम्बाकू निषेध दिवस की शुरुआत सन् 1988 में की गई थी। यह दिवस प्रतिवर्ष 31 मई को मनाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को तम्बाकू जैसे हानिकारक पदार्थों से बचाना तथा तम्बाकू के कारण होने वाली मृत्यु और बीमारियों के बढ़ते आंकड़ों को कम करना है। साथ ही लोगों को उनके स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना और तम्बाकू के दुष्प्रभावों से अवगत कराना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है। इस अवसर पर विभिन्न जन-जागरूकता अभियान, स्वास्थ्य शिविर, रैलियाँ तथा संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनके माध्यम से लोगों को तम्बाकू के खतरों के बारे में जानकारी दी जाती है।
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस वर्ष 2026 World No Tobacco Day 2026 की थीम है – “आकर्षण की सच्चाई को उजागर करना – निकोटिन और तंबाकू की लत का मुकाबला करना।” इस वर्ष का मुख्य उद्देश्य उन रणनीतियों और हथकंडों का पर्दाफाश करना है, जिनका उपयोग तम्बाकू और निकोटिन उद्योग अपने उत्पादों को आकर्षक बनाने के लिए करते हैं। वर्तमान समय में युवाओं में तम्बाकू और निकोटिन उत्पादों के प्रति बढ़ता आकर्षण सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। उद्योग इन उत्पादों में कृत्रिम स्वाद, सुगंध और आकर्षक पैकेजिंग का उपयोग करते हैं, जिससे युवा वर्ग आसानी से इनके प्रभाव में आ जाता है। सोशल मीडिया, डिजिटल विज्ञापन और ग्लैमर की संस्कृति के माध्यम से भी इन उत्पादों को आधुनिक जीवनशैली का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है।
भारत दूसरे स्थान पर
विश्वभर में तम्बाकू के उत्पादन और उपभोग के मामले में भारत दूसरे स्थान पर है। तम्बाकू आज अनेक गंभीर बीमारियों का प्रमुख कारण बन चुका है और इसकी लत एक महामारी का रूप धारण कर चुकी है। इसके सेवन से न केवल व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक ह्रास होता है, बल्कि समाज पर भी इसके दूरगामी सामाजिक और आर्थिक दुष्प्रभाव पड़ते हैं। भारत में तम्बाकू का आगमन 16वीं शताब्दी में मुगल काल के दौरान हुआ, जब पुर्तगाली व्यापारी इसे अपने साथ लेकर आए। प्रारंभ में इसे औषधीय वस्तु और विलासिता की चीज़ के रूप में प्रस्तुत किया गया, लेकिन धीरे-धीरे यह समाज के विभिन्न वर्गों में लोकप्रिय हो गया। जहाँगीर ने इसके दुष्प्रभावों को देखते हुए इस पर भारी कर लगाया, परंतु इसकी लत और व्यापारिक लाभ के कारण यह प्रयास अधिक प्रभावी सिद्ध नहीं हुआ।
अंग्रेजों के शासनकाल में तम्बाकू को लाभदायक व्यापारिक वस्तु के रूप में बढ़ावा मिला और बीड़ी, सिगरेट, हुक्का, गुटखा, खैनी जैसे उत्पाद समाज में व्यापक रूप से फैल गए। आज भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। सरकार द्वारा चेतावनी, कर वृद्धि और कानूनों के माध्यम से रोक लगाने के प्रयास किए जाते हैं, लेकिन इसके उपयोग में अपेक्षित कमी नहीं आ सकी है। सदियाँ बीत जाने के बाद भी तम्बाकू व्यापार और उपभोग पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित नहीं हो पाया है।
25 प्रकार की बीमारियाँ, 40 प्रकार के कैंसर
दुनिया भर में लगभग 1.1 अरब लोग धूम्रपान करते हैं तथा करोड़ों लोग धूम्रपान रहित तम्बाकू उत्पादों का सेवन करते हैं। ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे 2016-17 के अनुसार भारत में लगभग 27 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तम्बाकू का सेवन करते हैं। भारत में प्रतिवर्ष लगभग 14 लाख लोगों की मृत्यु तम्बाकू और धूम्रपान के कारण होती है। तम्बाकू के सेवन से लगभग 25 प्रकार की बीमारियाँ तथा 40 प्रकार के कैंसर हो सकते हैं। इनमें मुँह का कैंसर, गले का कैंसर, फेफड़ों का कैंसर, पेट का कैंसर, प्रोस्टेट कैंसर तथा ब्रेन ट्यूमर प्रमुख हैं।
स्वास्थ्य पर धूम्रपान से होने वाले प्रभाव
भारत में लगभग 12 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं। तम्बाकू के धुएँ में 500 से अधिक हानिकारक गैसें और लगभग 7000 रासायनिक पदार्थ पाए जाते हैं, जिनमें निकोटिन और टार प्रमुख हैं। शोधों में लगभग 70 रसायनों को कैंसरकारी सिद्ध किया गया है। बीड़ी पीना सिगरेट की तुलना में अधिक नुकसानदायक माना जाता है, क्योंकि इसमें निकोटिन की मात्रा कम होने के कारण व्यक्ति बार-बार इसे पीता है और अधिक धुआँ शरीर में पहुँचता है।
धूम्रपान का प्रभाव केवल धूम्रपान करने वाले व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता। जब कोई व्यक्ति बीड़ी या सिगरेट पीता है तो उसका लगभग 70 प्रतिशत धुआँ वातावरण में फैल जाता है, जिससे आसपास मौजूद लोग भी प्रभावित होते हैं। इसे परोक्ष धूम्रपान कहा जाता है। परोक्ष धूम्रपान बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के लिए अत्यंत हानिकारक होता है। धूम्रपान के कारण ब्रॉन्काइटिस, टीबी, उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, लकवा, माइग्रेन, नपुंसकता तथा फेफड़ों की अनेक बीमारियाँ हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान यदि महिलाएँ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से धूम्रपान के संपर्क में रहती हैं तो नवजात शिशु का वजन कम होना, समय से पहले जन्म, जन्मजात विकृतियाँ तथा शिशु मृत्यु का खतरा बढ़ जाता है।
धूम्रपान की लत के कारण
बीड़ी या सिगरेट के धुएँ में मौजूद निकोटिन कुछ ही सेकंड में मस्तिष्क तक पहुँच जाता है और मस्तिष्क के उन हिस्सों को प्रभावित करता है जो आनंद और उत्तेजना से जुड़े होते हैं। इससे व्यक्ति को कुछ समय के लिए तनाव में कमी, सतर्कता और मानसिक सक्रियता का अनुभव होता है। यही अनुभव धीरे-धीरे आदत और फिर लत का रूप ले लेता है।
युवाओं में धूम्रपान की शुरुआत कई कारणों से होती है, जैसे मित्रों का दबाव, फैशन, तनाव से मुक्ति की चाह, जिज्ञासा, फिल्मों और सोशल मीडिया का प्रभाव आदि। कई लोग इसे आधुनिकता और प्रतिष्ठा का प्रतीक मान लेते हैं। एक बार आदत बनने के बाद निकोटिन की निर्भरता इतनी बढ़ जाती है कि व्यक्ति चाहकर भी इसे छोड़ नहीं पाता। विशेषज्ञों के अनुसार निकोटिन की लत कई अन्य नशों से भी अधिक मजबूत हो सकती है।
रोकथाम और कानून
तम्बाकू सेवन से होने वाले दुष्प्रभावों को देखते हुए भारत सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं। “सिगरेट्स एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट (COTPA) 2003” के अंतर्गत तम्बाकू उत्पादों के प्रचार-प्रसार, बिक्री और वितरण पर विभिन्न प्रतिबंध लगाए गए हैं। सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषिद्ध किया गया है तथा तम्बाकू उत्पादों के पैकेटों पर स्वास्थ्य चेतावनी देना अनिवार्य किया गया है।
किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 77 के अनुसार किसी बच्चे को तम्बाकू या मादक पदार्थ उपलब्ध कराने पर कठोर दंड का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास तम्बाकू उत्पादों की बिक्री पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। 31 मई 2004 को विश्व तम्बाकू निषेध दिवस के अवसर पर इन कानूनों को प्रभावी रूप से लागू किया गया।
तम्बाकू छोड़ने के बाद शरीर में होने वाले लाभ
8 घंटे बाद– धूम्रपान छोड़ने के केवल 8 घंटे के भीतर शरीर में मौजूद निकोटीन और कार्बन मोनोऑक्साइड का स्तर आधा हो जाता है। कार्बन मोनोऑक्साइड एक जहरीली गैस है जो हीमोग्लोबिन से जुड़कर ऑक्सीजन को शरीर के अंगों तक पहुँचने से रोकती है। इसका स्तर घटने से रक्त में ऑक्सीजन का प्रवाह सामान्य हो जाता है। निकोटीन, जो धूम्रपान की लत के लिए जिम्मेदार है, कम होते ही शरीर हल्कापन महसूस करने लगता है। व्यक्ति को सांस लेने में थोड़ी आसानी महसूस होती है और थकावट कम लगती है।
24 घंटे बाद- केवल एक दिन के भीतर कार्बन मोनोऑक्साइड पूरी तरह शरीर से बाहर निकल जाती है। रक्त में ऑक्सीजन का स्तर पूर्णतः सामान्य हो जाता है। हृदय और मस्तिष्क को ऑक्सीजन की पर्याप्त आपूर्ति मिलने लगती है, जिससे दिल का कार्य बेहतर होता है। हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा घटने लगता है।
48 घंटे बाद- शरीर से निकोटीन पूरी तरह समाप्त हो जाता है। स्वाद कलिकाएं (टेस्ट बड्स) फिर से सक्रिय होने लगती हैं, जिससे भोजन का स्वाद बेहतर महसूस होता है। सूँघने की शक्ति (स्मेल सेंस) भी धीरे-धीरे तेज होती है। इस चरण में कुछ लोगों को निकोटीन की तलब महसूस हो सकती है, लेकिन यह तलब अस्थायी होती है।
1 महीने बाद- चेहरे की रंगत में स्पष्ट सुधार दिखने लगता है। त्वचा की भूरी पीलापन और धूम्रपान से उत्पन्न झुर्रियाँ कम होने लगती हैं। व्यक्ति पहले से अधिक ताजा और स्वस्थ दिखने लगता है। श्वसन तंत्र की सिलिया— जो फेफड़ों को साफ रखने में मदद करती हैं — पुनः विकसित होने लगती हैं। खांसी और कफ धीरे-धीरे कम होने लगता है। वापसी के लक्षण जो शुरुआत में होते हैं, अब काफी हद तक कम हो जाते हैं।
3 से 9 महीने बाद- व्यक्ति की खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ में उल्लेखनीय सुधार होता है। फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, जिससे दौड़ने, सीढ़ियाँ चढ़ने जैसी गतिविधियाँ आसान लगने लगती हैं। इम्यून सिस्टम मजबूत होता है और संक्रमण से लड़ने की शक्ति बढ़ती है। बार-बार होने वाले सर्दी, खांसी और ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियाँ कम हो जाती हैं।
5 वर्ष बाद- दिल के दौरे (हार्ट अटैक) का खतरा अब लगभग आधा रह जाता है, एक ऐसे व्यक्ति की तुलना में जो अब भी धूम्रपान करता है। रक्त धमनियों की कार्यप्रणाली सामान्य होने लगती है। शरीर में रक्त का थक्का बनने की प्रवृत्ति कम हो जाती है, जिससे स्ट्रोक का खतरा भी घटता है।
10 वर्ष बाद- अब तक फेफड़ों के कैंसर का खतरा आधा हो चुका होता है। मुंह, गला, ग्रासनली, मूत्राशय और अग्न्याशय के कैंसर का जोखिम भी उल्लेखनीय रूप से घट जाता है। व्यक्ति का संपूर्ण स्वास्थ्य एक धूम्रपान न करने वाले व्यक्ति के बराबर पहुँचने लगता है, बशर्ते वह निरंतर स्वस्थ जीवनशैली अपनाए रखे।
धूम्रपान छोड़ना केवल एक आदत का परित्याग नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, दीर्घायु और जीवन की गुणवत्ता को सुधारने की दिशा में एक महान कदम है।
तम्बाकू पर प्रतिबंध के लिए लेखक की अपील
तम्बाकू के गंभीर दुष्प्रभावों को देखते हुए लेखक वर्ष 2018 से भारत के प्रधानमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को पत्र लिखकर तम्बाकू के उत्पादन, भंडारण और बिक्री पर रोक लगाने की मुहिम चला रहे हैं। तम्बाकू उद्योग के पक्ष में अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि इससे करोड़ों लोगों को रोजगार मिलता है और सरकार को राजस्व प्राप्त होता है। परंतु यदि तम्बाकू से होने वाली बीमारियों के उपचार पर होने वाले खर्च को देखा जाए तो यह राजस्व बहुत कम साबित होता है। फेफड़ों और मुँह के कैंसर जैसी बीमारियों के इलाज पर देश को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ता है।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने तम्बाकू की खेती करने वाले किसानों से अपील की थी कि वे तम्बाकू जैसी जहरीली फसल छोड़कर फूलों और अन्य उपयोगी फसलों की खेती करें। यही सोच आज भी प्रासंगिक है। यदि तम्बाकू उत्पादन से जुड़े लोगों को वैकल्पिक रोजगार और कृषि के बेहतर अवसर उपलब्ध कराए जाएँ, तो समाज को तम्बाकू मुक्त बनाने की दिशा में बड़ा परिवर्तन संभव है।
अंततः यह समझना आवश्यक है कि तम्बाकू केवल एक व्यक्तिगत आदत नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय स्वास्थ्य से जुड़ी गंभीर समस्या है। इसके विरुद्ध जागरूकता, कठोर कानून, सामाजिक सहयोग और व्यक्तिगत संकल्प ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। विश्व तम्बाकू निषेध दिवस हमें यह संदेश देता है कि स्वस्थ जीवन के लिए तम्बाकू से दूरी बनाना ही सबसे बड़ा और सही निर्णय है।
(डॉ0 सूर्यकान्त किंग जॅार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय, उ0प्र0, लखनऊ में विभागाध्यक्ष रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग हैं )

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