-आरएमएलआई में विश्व अस्थमा दिवस पर फीजियोलॉजी विभाग व श्वसन रोग विभाग ने आयोजित किया जागरूकता कार्यक्रम

सेहत टाइम्स
लखनऊ। प्रो. (डॉ.) सी. एम. सिंह, निदेशक, डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (डॉ. आरएमएलआईएमएस), लखनऊ के मार्गदर्शन में फीजियोलॉजी विभाग एवं श्वसन रोग विभाग के संयुक्त तत्वावधान में विश्व अस्थमा दिवस 2026 के अवसर पर सेंटर ऑफ इंडियन नॉलेज सिस्टम (योगशाला), डॉ. आरएमएलआईएमएस में “अस्थमा रोगियों हेतु योग जागरूकता कार्यक्रम” का आयोजन किया गया।
इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस की थीम “अस्थमा से पीड़ित प्रत्येक व्यक्ति के लिए एंटी-इन्फ्लेमेटरी इनहेलर्स की उपलब्धता-अभी भी एक अत्यावश्यक आवश्यकता” रखी गई है। कार्यक्रम का उद्देश्य अस्थमा की रोकथाम, इनहेलर के महत्व, स्वच्छ वायु की आवश्यकता तथा योग एवं प्राणायाम के माध्यम से श्वसन स्वास्थ्य, फेफड़ों की क्षमता एवं समग्र स्वास्थ्य में सुधार के प्रति जागरूकता फैलाना था।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए डॉ. अजय कुमार वर्मा, प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, श्वसन रोग विभाग ने कहा कि भारत में अस्थमा रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है तथा वायु प्रदूषण इसके प्रमुख कारणों में से एक बन चुका है। उन्होंने बताया कि अस्थमा अब केवल दवाओं और इनहेलर से नियंत्रित होने वाला रोग नहीं रह गया है, बल्कि यह तेजी से बिगड़ती पर्यावरणीय परिस्थितियों एवं प्रदूषित वायु से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
डॉ. वर्मा ने बताया कि भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक है। उन्होंने लंग केयर फाउंडेशन द्वारा किए गए एक बहु-शहरी अध्ययन का उल्लेख करते हुए बताया कि अत्यधिक प्रदूषित शहरों में रहने वाले बच्चों में अस्थमा की व्यापकता चिंताजनक रूप से अधिक पाई गई। अध्ययन में लक्षणों के आधार पर अस्थमा की दर 21.7% थी, जबकि स्पाइरोमेट्री जांच में यह बढ़कर 29.4% पाई गई, अर्थात लगभग प्रत्येक तीन में से एक बच्चे में फेफड़ों की कार्यक्षमता प्रभावित मिली।
उन्होंने यह भी बताया कि बड़ी संख्या में अस्थमा रोगी समय पर चिन्हित नहीं हो पाते, जिसका कारण जागरूकता की कमी, इनहेलर के प्रति सामाजिक भ्रांतियां तथा स्पाइरोमेट्री जैसी जांच सुविधाओं की सीमित उपलब्धता है। परिणामस्वरूप रोग की पहचान और उपचार में देरी होती है, जिससे रोग अधिक गंभीर रूप ले सकता है।
डॉ. वर्मा ने विशेष रूप से बच्चों को सबसे अधिक संवेदनशील वर्ग बताते हुए कहा कि बचपन तथा गर्भावस्था के दौरान प्रदूषित वायु के संपर्क में आने से फेफड़ों के विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा भविष्य में श्वसन रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
उन्होंने कहा कि यद्यपि इनहेलर अस्थमा नियंत्रण के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान स्वच्छ वायु, प्रदूषण नियंत्रण एवं स्वस्थ जीवनशैली अपनाने में निहित है। उन्होंने योग एवं प्राणायाम को फेफड़ों की क्षमता बढ़ाने, श्वसन क्रिया सुधारने, तनाव कम करने तथा जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाने में अत्यंत लाभकारी बताया।
डॉ. रजनी बाला जसरोतिया, विभागाध्यक्ष, फीजियोलॉजी विभाग एवं डॉ. मनीष वर्मा, प्रभारी योगशाला ने भी प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए योग के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य लाभों पर प्रकाश डाला तथा नियमित योग अभ्यास अपनाने के लिए प्रेरित किया। व्यावहारिक सत्र के दौरान डॉ. पुलकित गुप्ता एवं डॉ. शिवम वर्मा द्वारा अस्थमा रोगियों को श्वास संबंधी व्यायाम, योग तकनीकों एवं श्वसन देखभाल संबंधी प्रशिक्षण प्रदान किया गया।
कार्यक्रम में मरीजों, स्वास्थ्यकर्मियों, संकाय सदस्यों एवं विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। यह आयोजन योग, स्वच्छ वायु एवं स्वस्थ जीवनशैली के माध्यम से श्वसन स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की दिशा में एक सफल जन-जागरूकता पहल साबित हुआ।
कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि अस्थमा नियंत्रण में दवाएं एवं इनहेलर महत्वपूर्ण हैं, किंतु दीर्घकालिक रूप से स्वस्थ श्वसन जीवन के लिए स्वच्छ वायु सबसे प्रभावी उपाय है।

Sehat Times | सेहत टाइम्स Health news and updates | Sehat Times