-होम्योपैथी को ऐलोपैथी का अल्टरनेटिव कहना ठीक नहीं
-लीजेंड हम लोग नहीं, हैनिमैन, हेरिंग, नैश, केंट जैसी विभूतियां थीं
-छत्रपति संभाजीनगर में वाइटल होम्योपैथी फोरम ने दिया अपना प्रतिष्ठित पुरस्कार

सेहत टाइम्स
लखनऊ। होम्योपैथी को अल्टरनेटिव कहना सही नहीं है, होम्योपैथी ऑल्टरनेटिव कैसे हो गयी, और अगर है, तो ऐलोपैथी भी ऑल्टरनेटिव है क्योंकि कुछ रोगों का इलाज होम्योपैथी में नहीं है, लेकिन ऐलोपैथी में है, और कुछ रोगों का उपचार ऐलोपैथी में नहीं है, लेकिन होम्योपैथी में है।
यह बात लखनऊ स्थित गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक व चीफ कन्सल्टेंट डॉ गिरीश गुप्ता ने महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) में बीती 26 अप्रैल को होटल अमरप्रीत में आयोजित सेमिनार में मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रूप में शामिल होते हुए कही। सेमिनार का आयोजन वाइटल होम्योपैथी फोरम ने इस वर्ष का ‘द लीजेंड आफ होम्योपैथी’ The Legend of Homoeopathy पुरस्कार डॉ गिरीश गुप्ता को देने के लिए किया था। उन्होंने कहा कि होम्योपैथी से वैज्ञानिक साक्ष्य मांगे जाते थे, मैंने बड़ी संख्या में साक्ष्य आधारित कार्य कर दिया है, उदाहरण के लिए जैसे मैंने त्वचा रोगों सोरयासिस, ल्यूकोडर्मा पर जो काम किया है, उसके साक्ष्य मौजूद हैं, अगर किसी ने इन रोगों के सफल उपचार पर ऐसा कार्य किया हो तो बतायें।

हम लोग तो उनके कामों को पढ़कर प्रैक्टिस कर रहे
डॉ गिरीश गुप्ता ने सम्मान ग्रहण करने के बाद अपने सम्बोधन में कहा कि आपने मुझे बुलाकर द लीजेंड ऑफ होम्योपैथी पुरस्कार से सम्मानित किया, इसके लिए आपका आभार प्रकट करता हूं, सम्मान लेेना सभी को अच्छा लगता है, लेकिन मेरा यह मानना है कि लीजेंड हम लोग नहीं, बल्कि डॉ सैमुअल हैनिमैन, डॉ कॉन्स्टेंटाइन हेरिंग, डॉ जेटी केंट, डॉ नैश जैसी विभूतियां थी, हम लोग तो उनके ही किये हुए कामों को पढ़कर अपनी प्रैक्टिस कर रहे हैं, कमाई कर रहे हैं। डॉ हैनिमैन ने आर्गेनन ऑफ मेडिसिन के छह संस्करण किये, आज तक किसी ने भी सातवां संस्करण नहीं तैयार किया, जो दवायें वे लोग प्रूव करके गयेे, उनके अलावा तो कुछ नहीं बढ़ाया।
हीनभावना मन में न लाइये, अपने प्रोफेशन पर गर्व करिये
उन्होंने कहा कि होम्योपैथी की शिक्षा देने वाले शिक्षक हों या विद्यार्थी, के अंदर हीन भावना रहती है जैसे कि इनफीरियर हो, उन्होंने कहा कि ऐसा सोचना सही नहीं है, आप जो भी कार्य कर रहे हैं, उस पर गर्व करिये।
वाइटल होम्योपैथिक फोरम द्वारा आयोजित किये गये इस सेमिनार में लगभग 200 लोग उपस्थित रहे, जिनमें फोरम के प्रेसिडेंट डॉ राजेंद्र श्रीमाली, सचिव डॉ प्रशांत गंगवाल, डॉ सोमिनाथ गोपालघड़े, डॉ प्रवीन बीडकर सहित प्रैक्टिशनर्स, होम्योपैथिक कॉलेजों के प्राचार्य, शिक्षक एवं विद्यार्थियों के साथ ही फोरम के पदाधिकारी शामिल रहे।
फोरम के पदाधिकारियों के अनुसार प्रत्येक वर्ष, वाइटल होम्योपैथिक फोरम उन जाने-माने होम्योपैथिक एक्सपर्ट्स को पुरस्कृत करता है, जिन्होंने होम्योपैथी के प्रमोशन, प्रचार और रिसर्च में अहम योगदान दिया है।
पदाधिकारियों के अनुसार अब तक यह अवॉर्ड कई जाने-माने इंटरनेशनल होम्योपैथिक एक्सपर्ट्स को दिया जा चुका है, जिनमें डॉ. राजन शंकरन (मुंबई), डॉ. दिनेश शर्मा (मुंबई), डॉ. मिस्टर और मिसेज जोशी (मुंबई), डॉ. अजीत कुलकर्णी (सतारा), डॉ. संजीव डोले (पुणे), डॉ. सुभाष सिंह (कोलकाता), डॉ. अनिल हब्बू (पुणे), डॉ. धनिपकर (मुंबई) और डॉ. फारुख मास्टर (मुंबई) शामिल हैं। इस वर्ष यह पुरस्कार डॉ गिरीश गुप्ता को दिया गया है, डॉ गिरीश गुप्ता का शोध कार्य न सिर्फ चिकित्सकों बल्कि विद्यार्थियों के लिए भी अत्यन्त प्रेरणादायक है। फोरम डॉ गिरीश गुप्ता को सम्मानित करके अपने आप को गौरवान्वित महसूस कर रही है।

स्त्री रोगों और त्वचा रोगों पर किये शोध कार्य दिखाये
डॉ गिरीश गुप्ता के रिसर्च कार्यों को फोरम द्वारा दिये गये महत्व का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि डॉ गुप्ता के लिए दो अलग-अलग सत्र (पहला 3 घंटे तथा दूसरा करीब 2 घंटे) निर्धारित किये गये थे। प्रथम सत्र का विषय स्त्री रोग विज्ञान में होम्योपैथी का साक्ष्य-आधारित अनुसंधान Evidence-based Research of Homoeopathy in Gynaecology तथा दूसरे सत्र का विषय त्वचा विज्ञान में होम्योपैथी का साक्ष्य-आधारित अनुसंधान Evidence-based Research of Homoeopathy in Dermatology था।
डॉ गुप्ता ने प्रथम सत्र में स्त्री रोगों यूट्राइन फायब्रॉयड, ओवेरियन सिस्ट, पॉलिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम पर किये गये शोध कार्य और दूसरे सत्र में त्वचा रोगों ल्यूकोडर्मा (सफेद दाग), सोरियासिस, एलोपीशिया एरियटा, लाइकिन प्लेनस, वार्ट, मोलस्कम कॉन्टेजियोसम तथा माइकोसेस ऑफ नेल पर किये गये अपने अनुसंधान कार्यों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। अपनी प्रस्तुतियों के दौरान डॉ गिरीश ने कुछ मॉडल केसेज भी प्रस्तुत किये, जिसमें उन्होंने बताया कि किस प्रकार होम्योपैथी के सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक रोगी के शारीरिक और मन से जुड़े लक्षणों, आदत, व्यवहार, पसंद-नापसंद जैसी अनेक बातों की हिस्ट्री लेकर होलिस्टिक एप्रोच के साथ उस रोगी के लिए ज्यादा प्रभावी दवा का चयन किया गया। डॉ गिरीश गुप्ता ने कहा कि जीसीसीएचआर में शोध कार्य/स्टडी एक सतत प्रक्रिया है।

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