Tuesday , November 30 2021

इंटरनेट का इस्‍तेमाल करने वालों में 12 फीसदी हो चुके हैं इसके लती

शहर में 28 तो गांवों में 26 फीसदी इंटरनेट यूजर, प्रतिवर्ष 9 प्रतिशत बढ़ रहे

केजीएमयू के मनोचिकित्‍सा विभाग के स्‍थापना दिवस पर महत्‍वपूर्ण विषय पर होगी चर्चा

 

लखनऊ। पिछले कुछ वर्षों में, टेक्नोलॉजी ने अभूतपूर्व दर पर हमारे रोजमर्रा के जीवन में अपनी जगह बना ली है। आजकल, हम में से अधिकतर लोग स्मार्टफोन और लैपटॉप के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते, लेकिन क्या टेक्नोलॉजी का नशा वास्तव में इतना खतरनाक है? विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून 2018 में ऑनलाइन गेमिंग को एक मानसिक विकार के रूप में मान्यता दी है। सोशल मीडिया के उपयोग को तेज़ी से नशे की लत के रूप में मान्यता दी जा रही है, क्योंकि लोग लगातार ख़बरों के लिए अपने स्मार्टफोन की जाँच कर रहे हैं, या कार्यस्थल पर ऑनलाइन खरीदारी साइटों को ब्राउज़ कर रहे हैं।  इंटरनेट सामुदायिक जीवन और सामाजिक रिश्तों में भागीदारी को बेहतर बना रहा है या बिगाड़ रहा है, यह चर्चा का विषय है।

 

शुक्रवार को किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व‍ विद्यालय के मनोचिकित्‍सा विभाग का 48वां स्थापना दिवस है। विभागाध्‍यक्ष प्रो पीके दलाल ने यह जानकारी देते हुए बताया कि इस अवसर पर विभाग एक समारोह का आयोजन कर रहा है। कुलपति प्रो एमएलबी भट्ट इस समारोह के मुख्य अतिथि होंगे। पीजीआईएम ईआर, चंडीगढ़ के मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर डॉ. देबाशीष बसु, ‘टेक्नोलॉजी की लत या लत की टेक्नोलॉजी?’ के विषय पर एक लेक्‍चर प्रस्तुत करेंगे।

 

उन्‍होंने बताया कि चिकित्सकीय शब्दावली में टेक्नोलॉजी या इंटरनेट की लत, टेक्नोलॉजी या इंटरनेट के अत्यधिक और अनियंत्रित प्रयोग से संबंधित व्यवहार है जो इससे जुड़े हुए नकारात्मक परिणामों के बावजूद जारी रहता है। इंटरनेट का उपयोग यदि लत के स्तर पर हो तो यह सामाजिक दायरे के घटने, अवसाद, अकेलेपन, आत्मसम्मान की कमी और जीवन  में असंतुष्टि, खराब मानसिक स्वास्थ्य और पारिवारिक कार्यों में गिरावट के साथ जुड़ा हुआ है। आमने-सामने वाली बातचीत की कमी, व्यायाम में कमी, देर रात तक टेक्नोलॉजी का उपयोग करने से नींद की समस्याओं और तेजी से गतिहीन जीवन शैली को अपनाने के जरिये टेक्नोलॉजी की लत ने न केवल मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित किया है।

 

साल  2018 तक, वैश्विक आबादी का लगभग एक तिहाई हिस्सा यानि की लगभग 3.1 बिलियन लोग रोज़ाना सोशल मीडिया का उपयोग कर रहे हैं। देश में 493 मिलियन इंटरनेट या ब्रॉडबैंड ग्राहक हैं। भारत में लगभग 28% शहरी और 26% ग्रामीण जनसंख्या 9% उपयोगकर्ताओं के प्रति वर्ष की वृद्धि के साथ सक्रिय रूप से इंटरनेट का उपयोग कर रही है। इंडियन काउंसिल फॉर मेडिकल रिसर्च की एक रिपोर्ट कहती है कि देश में इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 12 फीसदी लोग इंटरनेट की लत की समस्या से पीड़ित हैं। इंटरनेट और गेमिंग की लत के हानिकारक प्रभाव बच्चों और किशोरों की आबादी में और भी बदतर हैं। यह दिमाग के विकास को संरचनात्मक स्तर पर प्रभावित करता है। इससे प्रभावित अधिकांश किशोर इसे नशे या लत की समस्या मानने के लिए तैयार नहीं होते हैं जिससे इस समस्या में हस्तक्षेप करना और कठिन हो जाता है। कई एशियाई देशों ने इंटरनेट उपवास शिविर शुरू किए हैं जहां प्रभावित बच्चों को शारीरिक गतिविधियों पर समय बिताने के लिए कहा जाता है जिसके परिणाम सकारात्मक रहे हैं। हमारे देश में, कुछ प्रमुख स्वास्थ्य संस्थान पहले से ही टेक्नोलॉजी के स्वस्थ उपयोग के लिए इंटरनेट नशामुक्ति केंद्र चला रहे हैं। लाखों भारतीय या तो पहले से ही इंटरनेट की लत से प्रभावित हैं या होने की संभावना है, यह देखते हुए देश भर में ऐसे कई और केंद्र शुरू करने की आवश्यकता है। टेक्नोलॉजी और इंटरनेट की लत के बारे में  जागरूकता बढ़ाने के लिए, हमें कई तरह के कदम उठाने की आवश्यकता है। इस समस्या को समय रहते हल करने के लिए जल्द हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है।

 

टेक्नोलॉजी के उपयोग से संबंधित व्यवहार संबंधी विकारों के प्रबंधन के लिए के लिए KGMU में मानसिक विभाग एक नया क्लिनिक शुरू करने की योजना बना रहा है। यह क्लिनिक प्रत्येक सप्ताह के गुरुवार को चलेगी। क्लिनिक काउंसलिंग और साइकोथेरपी के माध्यम से  इंटरनेट और टेक्नोलॉजी की लत के प्रबंधन और टेक्नोलॉजी के स्वस्थ उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में काम करेगा। इस क्लिनिक का उद्देश्य टेक्नोलॉजी और इंटरनेट की लत के बारे में जागरूकता बढ़ाना भी होगा।

 

डॉ. देबाशीष बसु एक प्रसिद्ध चिकित्सक, शोधकर्ता और शिक्षाविद हैं। उनके कार्यक्षेत्र में सामान्य वयस्क मनोरोग, नशा मुक्ति और दोहरे निदान शामिल हैं। उनके नाम 300 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन हैं। उन्होंने  भारत और विदेशों में 200 से अधिक वैज्ञानिक बैठकों में अपने शोध को प्रस्तुत किया है और वैज्ञानिक वार्ताएं दी हैं। उनके नाम पर कई अलंकरण और पुरस्कार हैं। राष्ट्रीय स्तर पर उन्हें कुल 26 पुरस्कार मिले हैं। अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन ड्रग एब्यूज (NIDA), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH), यूएसए ने उन्हें NIDA-INVEST अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान फैलोशिप से सम्मानित किया है, साथ ही यूनाइटेड किंगडम की सरकार ने उन्हें एनएचएस इंटरनेशनल फैलोशिप से सम्मानित किया है। वह राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मानक उपचार दिशानिर्देशों को विकसित करने के लिए  एवं चिकित्सा पर विशेषज्ञ समूह के नामित सदस्य भी हैं। वह इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के एडिक्टिव डिसऑर्डर पर स्पेशलिटी सेक्शन के को-चेयरपर्सन हैं।