अनुसंधानित आयुर्वेदिक दवाओं से किया ब्लड कैंसर को बाय-बाय

डॉक्टर गुलाब सिंह

स्नेह लता

लखनऊ। कैंसर नाम की बीमारी का पता चलते ही रोगी से लेकर परिजनों तक के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति सोचता है कि कैंसर की बीमारी का मतलब मौत करीब है। एक आंकड़े के मुताबिक साल भर में करीब 80 लाख लोग कैंसर से ग्रस्त होकर मौत की गोद में सो जाते हैं। दुनिया भर में कैंसर से निपटने के लिए दवाओं की खोज के लिए रिसर्च चल रही है। इस रिसर्च में बड़े-बड़े वैज्ञानिक जुटे हुए हैं इन सब के बीच उत्तर प्रदेश सरकार में चिकित्सा अधिकारी रह चुके आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ गुलाब सिंह भी अपने निजी प्रयासों से आयुर्वेद दवाओं के अनुसंधान में लगे रहते हैं और अब तक कई बीमारियों का सफल इलाज खोज चुके हैं इन्हीं में कई तरह  के ब्लड कैंसर से निपटने के लिए दवाएं  भी शामिल हैं।  चिरायु आरोग्य रिसर्च सेंटर के संस्थापक डॉ गुलाब सिंह ने अपनी अनुसंधानित की हुई आयुर्वेदिक दवाओं से इडियोपैथिक थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया (आईटीपी), एप्लास्टिक एनीमिया,  क्रॉनिक माईलॉयड ल्यूकेमिया (सीएमएल), एक्यूट लिम्फोब्लाटिक ल्यूकेमिया (एएलएल) के मरीजों को पूर्णत: स्वस्थ किया है। वर्ल्ड कैंसर डे पर इस बारे में डॉ गुलाब सिंह से ‘सेहत टाइम्स’ ने बात की। डॉ गुलाब सिंह ने बताया कि सभी ठीक हुए रोगियों के रोगमुक्त होने की जांच प्रतिष्ठित सरकारी संस्थानों में हुई है।
इडियोपैथिक थ्रॉम्बोसाइटोपीनिया (आईटीपी)
उन्होंने बताया कि इन केसों में सबसे लेटेस्ट केस आईटीपी का है। लखनऊ के कानपुर रोड स्थित एलडीए कॉलोनी की रहने वाली २६ वर्षीया नेेहा त्रिपाठी की प्लेटलेट्स काउंट काफी गिर गयी थी, इसके लिए संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान एसजीपीजीआई और एम्स दिल्ली से इलाज चल रहा था जिससे आराम नहीं हो रहा था और प्लेट्लेट्स २५ हजार से ऊपर नहीं बढ़ पा रही थी। इनका इलाज डॉ गुलाब सिंह  ने अपने रिसर्च सेंटर पर जून २०१६ में इलाज शुरू किया था और अभी स्थिति यह है कि मरीज की प्लेटलेट्स डेढ़ लाख पहुंच चुकी है और उसे काफी आराम है।
एप्लास्टिक एनीमिया
डॉ गुलाब सिंह ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया का पहला केस उनके पास सीतापुर के ग्राम सिकंदर पुर की रहने वाली बबली का वर्ष २००३ में आया था। एप्लास्टिक एनीमिया रोग की डायगनोसिस एसजीपीजीआई में हुई थी। उन्होंने बताया कि इस प्रकार के कैंसर में बोन मैरो काम नहीं करती है जिससे खून नहीं बनता है और बार-बार चढ़ाना पड़ता था। उन्होंने बताया कि मार्च २००३ में शुरू होकर अप्रैल २००४ तक चले इलाज के बाद बबली पूर्णत: स्वस्थ हो गयी। एप्लास्टिक का एक और केस कन्नौज जिले के गांव सराय दौलत के रहने वाले १४ वर्षीय शिवांशु का इलाज भी सितम्बर २०१२ से शुरू हुआ और अब वह ठीक है।

क्रॉनिक माईलॉयड ल्यूकेमिया (सीएमएल)
डॉ गुलाब सिंह ने बताया कि क्रॉनिक माईलॉयड ल्यूकेमिया सीएमएल टाइप के ब्लड कैंसर में खून धीरे-धीरे  घटता है, प्लेटलेट्स मेन्टेन रहती हैं, तिल्ली बढ़ जाती है, टीएलसी बढ़ जाती है। इसमें भी लम्बे समय तक बुखार रहता है, कमजोरी रहती है और सारे इलाज फेल हो जाते हैं तब जाकर बोन मैरो की जांच होती है तो पता चलता है कि रोगी सीएमएल से ग्रस्त है। उन्होंने बताया कि सीतापुर के सेठगंज के रहने वाले ६० वर्षीय कैलाश सिंह सीएमएल से ग्रस्त होकर उनके पास मार्च २००३ में आये थे तबसे इनका इलाज शुरू किया गया और जनवरी २००५ में यह पूर्णत: स्वस्थ हो गये।
एक्यूट लिम्फोब्लाटिक ल्यूकेमिया (एएलएल) 
डॉ गुलाब सिंह ने बताया कि एक्यूट लिम्फोब्लाटिक ल्यूकेमिया एएलएल से ग्रस्त ५२ वर्षीय विमला देवी हरदोई जिले के अतरौली गांव की रहने वाली हैं इन्हें  एसजीपीजीआई में इनकी बीमारी के बारे में बताया गया। इस बीमारी में लम्बे समय तक बुखार रहता है, खून की कमी हो जाती है, दवाओंं का असर होना भी बंद हो जाता है। डॉ गुलाब सिंह ने अपनी अनुसंधानित की हुई दवाओं से इनका इलाज सितम्बर २००३ में शुरू किया था तथा दिसम्बर २००३ में यह पूर्णत: स्वस्थ हो गयीं ।

सिर्फ रिपोर्ट देखकर ही कर देते हैं इलाज
डॉ गुलाब सिंह ने बताया कि उनके पास आने वाले केसों में मरीज को लाने की जरूरत नहीं है, वह सिर्फ रिपोर्ट के आधार पर ही दवाएं तैयार कर दे देते हैं। उन्होंने बताया कि ठीक हुए मरीजों और उनके परिजनों से फ़ोन पर पुष्टि की जा सकती है।