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जब रक्त चढ़ाने के बाद भी नहीं बढ़ता है हीमोग्लोबिन

-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट डॉ एके त्रिपाठी के साथ वार्ता शृंखला-भाग-15

डॉ. ए.के.त्रिपाठी

सेहत टाइम्स

लखनऊ। स्वस्थ बने रहना व्यक्ति का सपना होता है, लेकिन कैसे स्वस्थ रहें, यह एक बड़ी चुनौती होती है। इसी चुनौती को आसान बनाने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। इस शृंखला के तहत राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा आसान शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारियां दी जाती हैं। ज्ञात हो रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले प्रो त्रिपाठी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं।

आमजन के साथ ही स्टूडेंट्स के लिए भी है उपयोगी हैं ये जानकारियां

ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए विद्यार्थी आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।

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इस विषय में पर यदि आपको डॉ एके त्रिपाठी से पूछना हो कोई सवाल, तो नीचे स्क्रीन के कोने में व्हाट्सअप बटन पर क्लिक करें

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पहले के सभी एपीसोड नीचे दिये गये उनके शीर्षक पर क्लिक कर पढ़े जा सकते हैं

भाग 1 …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें

भाग 2 …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें 

भाग 3 …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें 

भाग 4 …‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें  

भाग 5 …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें

भाग 6 …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये…क्लिक करें 

भाग 7 … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण…क्लिक करें   

भाग 8 … बुढ़ापे में एनीमिया को न करें नजरंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत…क्लिक करें  

भाग 9 …प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करना जरूरी…क्लिक करें     

भाग 10… कैंसर होने का एकमात्र लक्षण भी हो सकता है एनीमिया…क्लिक करें

भाग 11…अक्सर पेट खराब रहना भी बड़ी वजह है एनीमिया होने की…क्लिक करें

भाग 12  एनीमिया होने के कारणों में एक बड़ा कारण है तम्बाकू का सेवन…क्लिक करें

भाग 13  अनुवांशिक भी होता है एनीमिया…क्लिक करें   

भाग 14 एनीमिया के उपचार में ब्लड ट्रांसफ्यूजन कब, क्या है पैमाना ? …क्लिक करें   

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अब प्रस्तुत है भाग 15

जानिये, कब रक्त चढ़ाने के बाद भी नहीं होती है हीमोग्लोबिन में अपेक्षित वृद्धि

प्रो एके त्रिपाठी ने बताया कि सामान्यतः लोग यह मानते हैं कि रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर कम होने पर इसकी पूर्ति रक्त चढ़ाने से हो जायेगी, लेकिन यह जरूरी नहीं है कि रक्त चढ़ाने के बाद हीमोग्लोबिन बढ़ ही जायेगा।

उन्होंने बताया कि रक्तदाता से एक बार में लगभग 250 ml रक्त लिया जाता है और इसमें घोल मिलाने से एक यूनिट की मात्रा 350 ml हो जाती है। इसको होल ब्लड कहते हैं। इसमें रक्त कणिकाओं के साथ-साथ प्लाज़्मा भी होता है। एनीमिया के मरीजों के लिए केवल आर.बी.सी. की आवश्यकता होती है, जबकि रक्त में अन्य रक्त कणिकायें जैसे डब्ल्यू.बी.सी., प्लेट्लेट्स भी होती हैं। होल ब्लड चढ़ाने से मरीज का ब्लड वोल्यूम ज्यादा ही बढ़ जाता है और रक्त कणिकाओं का घनत्व कम हो जाता है। इससे रक्त चढ़ाने के पश्चात् हिमोग्लोबिन में वाँछित वृद्धि नहीं हो पाती है। दूसरे, प्लासमा के माध्यम से मरीज के शरीर में कई संक्रमण तथा अनचाहे प्रोटीन (एन्टीबाडीज) प्रवेश कर जाते हैं, इससे तरह-तरह के रोग तथा एलर्जी होने का खतरा रहता है। अतः एनीमिया को ठीक करने के लिए होल ब्लड न देकर पैक आर.बी.सी. (होल ब्लड से प्लाज्मा को हटा दिया जाता है) देना चाहिए। पैड आर.बी.सी. अब ब्लड बैंकों में आसानी से उपलब्ध हैं।

इन मरीजों को होती है होल ब्लड की आवश्यकता

इसका मतलब यह नहीं कि होल ब्लड की आवश्यकता ही नहीं है। इसकी आवश्यकता उन मरीजों में होती है जिनमें अत्यधिक स्राव होने से शरीर से रक्त निकल जाता है। फलस्वरूप ब्लड वोल्यूम कम हो जाता है। इस परिस्थिति में होल ब्लड की आवश्यकता होती है। प्रायः लोग (मरीज और चिकित्सक) यह कहते सुने जाते हैं कि खून बढाने के लिए ताजा रक्त की आवश्यकता है। एनीमिया के इलाज के लिए पैक आर.बी.सी. का ताजा होना आवश्यक नहीं है। आर.बी.सी. को कई हफ्तों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके अलावा रक्त दाता से लिया गया रक्त तुरन्त चढ़ाने के लिए दिया भी नहीं जाता क्योंकि उस रक्त का परीक्षण किया जाना होता है। विभिन्न प्रकार के संक्रमण जैसे- एच०आई०वी०, हीपेटाइटिस, मलेरिया इत्यादि का पूरी तरह से परीक्षण करने के बाद ही रक्त या रक्त अवयवों को मरीज के लिए उपलब्ध कराया जाता है। अतः हमें मरीजों के लिए शुद्ध और संक्रमण रहित रक्त की ज़रूरत होती है न कि ताज़ा ब्लड की।

प्रायः लोग ज़िद करते हैं कि जो रक्त उनके सम्बंधियों द्वारा दिया गया है, वही रक्त उनके मरीज़ को मिलना चाहिए, जबकि ब्लडबैंक में ऐसा नहीं किया जाता है। दिये गये ब्लड के बदले मरीज़ को मैच किया हुआ तथा पहले से परीक्षित ब्लड ही दिया जाता है। चूंकि रक्त तभी चढ़ाना चाहिए जब इसकी आवश्यकता हो और आवश्यकता कभी एक यूनिट रक्त से पूरी नहीं की जा सकती है, इसलिए केवल एक यूनिट रक्त चढ़ाना चिकित्सीय दृष्टि से सार्थक नहीं है।

रोग और परिस्थितियों पर निर्भर

मरीज को कितने यूनिट ब्लड की आवश्यकता है यह मरीज में उपस्थित रोग और अन्य परिस्थितियों पर निर्भर करता है। इन सभी बातों का ख़्याल रखकर चिकित्सक निर्धारित करता है। यदि कई यूनिट रक्त की आवश्यकता है तो ऐसी स्थिति में कितनी जल्दी-जल्दी रक्त चढ़ाया जाय यह भी मरीज़ के रोग और दशा पर निर्भर करता है। उदाहरण स्वरूप, हृदय के रोगियों को या वृद्धावस्था में रक्त तेज़ी से चढ़ाने पर हृदय पर ज़ोर पड़ता है जिसके दुष्परिणाम हो सकते हैं। कुछ मरीज़ों में रक्त बार-बार चढ़वाने की आवश्यकता होती है, क्योंकि इलाज के तौर पर यही विकल्प उपलब्ध होता है। उदाहरण के तौर पर, थैलेसीमिया मेजर से पीड़ित बच्चों को हर महीने पैक आर.बी.सी. की आवश्यकता होती है। बार-बार रक्त चढ़ाने से शरीर में आयरन की मात्रा काफी हद तक बढ़ जाती है। आयरन के शरीर के विभिन्न अंगों में अत्यधिक मात्रा में संचय हो जाने से कई अंग जैसे हृदय, पेन्क्रियाज, लीवर, खराब होने लगते हैं। इसलिए ऐसे मरीजों में जरूरत पर उतना ही रक्त चढ़ायें (ज्यादा नहीं) जिससे शरीर की आवश्यकता पूरी हो जाये।