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अस्थमा पीड़ित रोगी के लिए है इनहेलर सबसे उपयोगी

विश्व अस्थमा दिवस (5 मई ) पर विशेष लेख डॉ सूर्यकान्त की कलम से

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’’विश्व अस्थमा दिवस’’ प्रति वर्ष मई माह के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस 5 मई 2026 को मनाया जा रहा है। इसका उद्देश्य दुनिया भर में अस्थमा की बीमारी और देखभाल के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस की थीम “अस्थमा से पीड़ित हर व्यक्ति के लिए सूजन-रोधी इनहेलर की उपलब्धता – अब भी एक अत्यंत आवश्यक ज़रूरत” है। विश्व अस्थमा दिवस का आयोजन ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा (GINA) द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। सन् 1998 में, बार्सिलोना, स्पेन में पहली विश्व अस्थमा बैठक में 35 से अधिक देशों द्वारा पहला विश्व अस्थमा दिवस मनाया गया था। इस मौसम में तापमान में बदलाव आता है, फूलों के पराग कण बढ़ जाते हैं, जिससे अस्थमा की तकलीफ़ बढ़ जाती है।

अस्थमा (दमा) एक आनुवांशिक रोग है, जिसमें रोगी की श्वास नलिकाएँ अतिसंवेदनशील हो जाती हैं। विभिन्न कारकों के प्रभाव से इन नलिकाओं में सूजन उत्पन्न हो जाती है, जिससे रोगी को सांस लेने में कठिनाई होने लगती है। ऐसे कारकों में घर या बाहर की धूल, कागज़ (पेपर) की धूल, रसोई का धुआँ, नमी एवं सीलन, मौसम में परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूम्रपान, फास्ट फूड, मानसिक तनाव, व्यायाम, पालतू जानवर, पेड़-पौधों व फूलों के परागकण, तथा वायरस एवं बैक्टीरिया के संक्रमण प्रमुख हैं। जब ये कारक मरीज के संपर्क में आते हैं, तो शरीर में विभिन्न रासायनिक पदार्थ (जैसे हिस्टामीन) स्रावित होते हैं, जिनके प्रभाव से श्वास नलिकाएँ संकुचित हो जाती हैं। साथ ही, उनकी भीतरी दीवार में लालिमा और सूजन आ जाती है तथा उनमें बलगम बनने लगता है। इन सभी परिवर्तनों के कारण दमा के लक्षण प्रकट होते हैं। बार-बार इन कारकों के संपर्क में आने से श्वास नलिकाओं में स्थायी परिवर्तन भी हो सकते हैं।

अस्थमा से पीड़ित मरीज सामान्यतः दो प्रकार के इन्हेलर का उपयोग करते हैं—एक, श्वास नलिकाओं की सिकुड़न (ब्रोंकोस्पाज्म) को कम करने के लिए, और दूसरा, सूजन को कम करने के लिए। इनमें सूजन-रोधी इन्हेलर का उपयोग अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि श्वास नलिकाओं में पहले सूजन उत्पन्न होती है, जिसके बाद ही सिकुड़न विकसित होती है। यदि सूजन-रोधी इन्हेलर का नियमित और निरंतर उपयोग किया जाए, तो अस्थमा अटैक की संभावना काफी हद तक कम की जा सकती है।
भारत में अक्सर देखा जाता है कि सूजन-रोधी इन्हेलर के स्थान पर केवल सिकुड़न कम करने वाले इन्हेलर का अधिक उपयोग किया जाता है, जो दीर्घकालीन दृष्टि से पर्याप्त नहीं है। इसके परिणामस्वरूप कई बार मरीजों को गंभीर अस्थमा अटैक का सामना करना पड़ता है, और कुछ मामलों में यह स्थिति जानलेवा भी सिद्ध हो सकती है।

इसी कारण, ग्लोबल बर्डन ऑफ अस्थमा रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 34 करोड़ लोग अस्थमा से पीड़ित हैं, जबकि भारत में यह संख्या लगभग 4 करोड़ है। वैश्विक स्तर पर वार्षिक मृत्यु दर लगभग 13 प्रतिशत बताई जाती है, जबकि भारत में यह दर लगभग 43 प्रतिशत तक पहुँच जाती है, जो अत्यंत चिंताजनक और विचारणीय विषय है। लगभग दो-तिहाई रोगियों में दमा बचपन से ही प्रारंभ हो जाता है। बच्चों में इसके लक्षणों में बार-बार खाँसी आना, सांस फूलना, सीने में जकड़न या भारीपन, छींक आना, नाक बहना तथा शारीरिक विकास में बाधा शामिल हैं। शेष एक-तिहाई रोगियों में इसके लक्षण युवावस्था में प्रकट होते हैं। इस प्रकार, दमा प्रायः बचपन या युवावस्था में आरंभ होने वाला रोग है।

दमा के उपचार में इन्हेलर चिकित्सा को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि इसमें दवा की कम मात्रा की आवश्यकता होती है, प्रभाव सीधे श्वास नलिकाओं पर तीव्रता से पड़ता है, और इसके दुष्प्रभाव भी अत्यंत कम होते हैं।

अस्थमा के लक्षण- अस्थमा के प्रमुख लक्षण हैं, जैसे- खाँसी जो रात में और गम्भीर हो जाती है, सांस लेने में कठिनाई जोकि दौरों के रूप में तकलीफ देती हो, छाती में कसाव/जकड़न, छाती में से घरघटाहट जैसी आवाज आना, गले से सीटी जैसी आवाज आना।

अस्थमा का निदान- दमा का निदान, अधिकतर लक्षणों के आधार पर एवं कुछ परीक्षण करके जैसे चिकित्सक का रोगी का परीक्षण तथा फेफड़े की कार्यक्षमता की जांच (पी0ई0एफ0आर0, स्पाइरोमेट्री, इम्पल्स ओस्लिमेटरी) द्वारा किया जाता है। अन्य जांचें जैसे कि खून की जांच, छाती एवं साइनस का एक्सरे इत्यादि भी की जाती हैं।

अस्थमा का उपचार- दमा के इलाज के लिए दो तरह की दवाइयां होती है। वायुमार्ग खोलने के लिए वायुमार्ग की सूजन कम करने के लिए।

इसके लिए इन्हेलर होते है जिनके द्वारा सांस के जरिए दवा सीधे फेफड़े में पहुचंती है और उसका शरीर के अन्य अंगों पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है। दमा के इलाज के लिए दो प्रमुख तरीके के इन्हेलर है।

रिलीवर इन्हेलर- जो कि ये जल्दी से काम करके श्वांस की नलिकाओं की मांसपेशियों का तनाव ढीला करते है और तुरन्त असर करते है। जिससे सिकुड़ी हुयी सांस की नलियां तुरन्त खुल जाती है। इनको सांस फूलने पर लेना होता है।

कंट्रोलर इन्हेलर- ये श्वास नलियों में उत्तेजना और सूजन घटाकर उनको अधिक संवेदनशील बनने से रोकते है और गम्भीर दौरे का खतरा कम करते है। इनको लक्षण न होने पर भी लगातार लेना चाहिए। दमा के अन्य नये उपचार जैसे कि बायोजीकल्स का प्रयोग आदि हैं।

दमा के दौरे को रोकने के लिए हम ये उपाय कर सकते हैः इस मौसम में घटते -बढ़ते तापमान में अपना ध्यान रखें। दमें की दवा हमेशा अपने पास रखें और कंट्रोलर इन्हेलर हमेशा समय से ले। सिगरेट/सिगार व बीड़ी के धुएं से बचें, तथा प्रमुख एलर्जन से बचें। अपने फेफड़े को मजबूत बनाने के लिए सांस का व्यायाम अर्थात प्राणायाम करें। यदि बलगम गाढ़ा हो गया है, खांसी, घरघराहट और सांस लेने में तकलीफ बढ़ जाये या रिलीवर इन्हेलर की जरूरत बढ़ गई हो तो तुरन्त अपने चिकित्सक से मिलें।

दमा के रोगी ये न करें: गांवों में इस समय गेहूँ की कटाई (थ्रेसर से) चल रही है ऐसे में खेतों की तरफ न जायें एवं भूसा और गन्दगी से अपने आपको बचायें। बच्चों को लम्बे रोंयेंदार कपड़े न पहनायें व रोंयेदार खिलौने खेलने को न दें। पंख या रेशम के तकिये का इस्तेमाल न करें। सेंमल की रूई से भरे तकिए, गद्दा या रजाई का इस्तेमाल न करें। घर के अन्दर फूलों वाले पौधे या ताजे फूलों को न रखें। सिगरेट/बीड़ी न पियें। रोगी के घर में किसी अन्य को भी सिगरेट/बीड़ी न पीनें दें। रोगी एयरकंडीशन या कूलर के कमरे से एकदम गर्म हवा में बाहर न जायें। यात्रा के दौरान बच्चों को लेकर वाहन की खिड़की के पास न बैठें। बिना डाक्टर की सलाह के कोई दवा लम्बे समय तक न खायें। धुआँ, धूल, मिट्टी, वाली जगह से बिना नाक मुँह ढंके न गुजरें। अस्थमा रोगी इत्र, परफ्यूम या डीओडेरेन्ट का इस्तेमाल न करें। प्रमुख एलर्जन के सम्पर्क में न आयें। घर में जानवरों को न पालें तथा घर में धूल को न जमने दें व गंदा न रखें। मच्छरों को भागाने वाली कॉइल या अगरबत्ती आदि का इस्तेमाल न करें। अस्थमा के रोगी अगरबत्ती/धूपबत्ती का भी प्रयोग न करें।

अस्थमा रोग से बचने के लिए अन्य कारगर उपायः मौसम बदलने से सांस की तकलीफ बढ़ती है इसलिए मौसम बदलने के 4 से 6 सप्ताह पहले ही सजग हो जाना चाहिए और उचित चिकित्सा परामर्श लेना चाहिए। इन्हेलर व दवाएं विषेशज्ञ की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए। ऐसे कारक जिनकी वजह से सांस की तकलीफ बढ़ती है या जो सांस के दौरे को जन्म देते है उनसे बचाव करना चाहिए। जैसे- धूल, धुंआ, गर्दा, नमी, सर्दी व धूम्रपान आदि। ऐसे खाद्य पदार्थ, जो रोगी के संज्ञान में स्वयं आ जाते है कि वे नुकसान कर रहे है, का परहेज करना चाहिए। साधारणतः शीतलपेय, फास्टफूड तथा केमिकल व प्रिजरवेटिव युक्त खाद्य पदार्थो (चाकलेट, टाफी, कोल्ड ड्रिंक व आइसक्रीम आदि) का परहेज करना चाहिए। सर्दी, जुकाम, गले की खरास या फ्लू जैसी बीमारी का तुरन्त इलाज कराना चाहिए, क्योंकि इससे बीमारी के बिगड़ने का खतरा रहता है। सेमल की रूई युक्त बिस्तरों का प्रयोग नहीं करना चाहिए तथा कारपेट, बिस्तर व चादरों की नियमित तथा सोने से पूर्व अवश्य सफाई करनी चाहिए। व्यायाम या मेहनत का कार्य करने से पहले इन्हेलर अवश्य लेना चाहिए। यदि रात में सांस फूलती है तो रात में सोने से पहले ही इन्हेलर तथा अन्य दवाएं उचित चिकित्सीय सलाह से लेने चाहिए। घर हवादार होना चाहिए, सीलन युक्त न हो तथा खुली धूप आनी चाहिए। रोगी को तेज व ठंडी हवा से बचायें, यात्रा के दौरान बच्चों को लेकर वाहन की खिड़की के पास न बैठें। बच्चों को लम्बे रोयेंदार कपड़े न पहनायें व रोयेदार खिलौने खेलने को न दें। घर की सफाई, पुताई व पेंट के समय रोगी को घर से बाहर रहना चाहिए। कुत्ता, बिल्ली, पक्षी न पालें तथा घर को कॉकरोचों आदि से मुक्त रखें।

(डॉ सूर्यकान्त केजीएमयू लखनऊ में रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष हैं)