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अक्सर पेट खराब रहना भी बड़ी वजह है एनीमिया होने की

-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ ‘सेहत टाइम्स’ की विशेष वार्ता शृंखला

-रक्त और उसके अवयव भाग – 11

प्रो एके त्रिपाठी

सेहत टाइम्स

लखनऊ। स्वस्थ बने रहना व्यक्ति का सपना होता है, लेकिन कैसे स्वस्थ रहें, यह एक बड़ी चुनौती होती है। इसी चुनौती को आसान बनाने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। इस शृंखला के तहत राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा आसान शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारियां दी जाती हैं। ज्ञात हो रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले प्रो त्रिपाठी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं।

आमजन के साथ ही स्टूडेंट्स के लिए भी है उपयोगी हैं ये जानकारियां

ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए विद्यार्थी आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।

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यदि आपके मन  में हैं इस विषय को लेकर कोई प्रश्न तो कृपया अपनी स्क्रीन पर बने व्हाट्सअप बटन पर क्लिक कर अपना प्रश्न भेजें, प्रश्न का उत्तर प्रो एके त्रिपाठी द्वारा दिया जायेगा

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1 से लेकर 10 तक के सभी एपीसोड के शीर्षक

भाग 1 …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें

भाग 2 …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें 

भाग 3 …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें 

भाग 4 …‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें  

भाग 5 …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें

भाग 6 …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये…क्लिक करें 

भाग 7 … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण…क्लिक करें   

 भाग 8 … बुढ़ापे में एनीमिया को न करें नजरंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत…क्लिक करें  

भाग 9 …प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करना जरूरी…क्लिक करें     

भाग 10…कैंसर होने के एकमात्र लक्षण भी हो सकता है एनीमिया

 

प्रस्तुत है शृंखला की अगली कड़ी भाग 11

अक्सर पेट खराब रहना भी जिम्मेदार है एनीमिया के लिए

प्रो एके त्रिपाठी बताते हैं कि हमारे देश की अधिकांश जनसंख्या गाँव में रहती है और गाँवों में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्यायें शहरों से भिन्न होती हैं। हालांकि एनीमिया Anemia की समस्या गाँव और शहर दोनों जगहों पर व्याप्त है, बस एनीमिया को उत्पन्न करने के कारण अलग हो सकते हैं। यह देखा गया कि एनीमिया प्रायः भोजन की मात्रा कम हो जाने से नहीं बल्कि संतुलित भोजन ग्रहण न करने से होता है। संतुलित भोजन का अभिप्राय भोजन में स्वस्थ रहने के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की उचित मात्रा से है।

कैसे हो जाता है संतुलित भोजन का अभाव

उन्होंने बताया कि लोगों में संतुलित भोजन Balanced Diet का अभाव कई कारणों से हो सकता है, जैसे अज्ञानता, लापरवाही तथा गरीबी। अपने देश की कृषि एवं आर्थिक स्थिति पहले से बेहतर होने तथा गाँव में रोज़गार के अवसर बेहतर होने से अब भोजन के अभाव में एनीमिया नहीं होता है, लेकिन गाँवों में लोगों का पेट अक्सर ख़राब रहता है। भोजन के तुरन्त बाद शौच के लिए भागना पड़ता है, व्यक्ति को दस्त, आंव, पेचिश की समस्या बनी रहती है। ये समस्यायें अमीबा (Ameba) तथा अन्य संक्रमणों के कारण होता है। ये संक्रमण दूषित पदार्थों या दूषित जल से शरीर में प्रवेश करते हैं। पेट खराब होने से भोजन के आवश्यक तत्वों का पाचन प्रभावित होता है। अतः यह बात स्पष्ट है कि हमें साफ पानी का प्रयोग करना चाहिए।

साफ पानी की बड़ी भूमिका

प्रो त्रिपाठी का कहना है कि साफ पानी के लिए आवश्यक है कि पानी का स्रोत सही हो, पानी का बर्तन साफ हो, पीने का पानी जिस बर्तन में हो, वह ढंका हुआ हो। इसके अलावा बर्तन से पानी निकालने का तरीका सही हो जिससे जल के प्रयोग अथवा रख-रखाव के दौरान गन्दगी न हो। यह अच्छी बात है कि पीने के जल के लिए गाँव में कुओं का प्रयोग कम होता है क्योंकि अब हर जगह हैण्डपम्प से जल की सुविधा उपलब्ध है। हैण्डपम्प का पानी साफ और असंक्रमित माना जाता है, परन्तु कभी-कभी यह पीने योग्य नहीं माना जाता विशेषकर जब यह हैण्डपम्प गन्दे स्थानों जैसे, कूड़ा करकट, गन्दे नाले के पास हो। अतः पानी के स्रोत का ध्यान रखना भी आवश्यक है। अतः गाँवों में एनीमिया विशेष रूप से बच्चों में होने का यह मुख्य कारण है। यह कहना उचित नहीं होगा कि यह केवल गाँव तक ही सीमित है। शहरों में रहने वाले लोग जो सही पेयजल और भोज्य पदार्थों Food items का उपयोग नहीं करते हैं, शारीरिक साफ-सफाई का ध्यान नहीं रखते, उनको भी यह रोग हो सकता है।

अपनी प्रथा को भूलते जा रहे हम

उन्होंने बताया कि यद्यपि हमारे देश की प्राचीन सभ्यता में भोजन करने के पहले हाथ धोने की प्रथा रही है लेकिन दुर्भाग्यवश आज कल लोग तथाकथित आधुनिक होने या बनने के भ्रम में इसे रूढ़िवादिता मानते हैं। जबकि वैज्ञानिक और पारम्परिक रूप से प्रमाणित है कि संक्रमण से बचने में हाथ का सही तरीके से धोना एक कारगर तरीका है। हाथों को विसंक्रमित करने को लेकर कोविड काल में भी बहुत जागरूकता फैलायी गयी थी। भोजन के साथ संक्रमण का प्रवेश रोकने के लिए हाथों का अच्छी तरह से साफ करना बहुत जरूरी है।

क्यों न चलें नंगे पैर

प्रो त्रिपाठी ने बताया कि इसी प्रकार मल में प्रायः पेट में पल रहे विभिन्न प्रकार के परजीवी कृमि (Intestinal Parasites) जैसे एस्कैरिस, हुक वर्म के अण्डे रहते हैं। ये अण्डे काफी समय तक विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहते हैं तथा लार्वा पैदा करते हैं, जो मनुष्य की त्वचा में छेद कर शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। इसीलिए गाँवों में नंगे पैर चलने से इन लार्वा के पैरों की त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश करने की सम्भावना बढ़ जाती है।

प्रो त्रिपाठी का कहना है कि एनीमिया उत्पन्न करने में सबसे प्रमुख है हुकवर्म Hookworm जो छोटी आंत की दीवारों में चिपककर रक्त चूसता रहता है वैसे प्रत्येक कृमि बहुत कम मात्रा में (0.2 मिली) रक्त चूसता है, लेकिन इनकी संख्या हज़ारों में होती है, इसलिए ये अच्छा-खासा रक्त चूस लेते हैं। आंतों में रहने वाले परजीवी कृमि को कम करने के लिए सफल दवाइयां उपलब्ध हैं, जिनमें ऐलबेन्डाजोल की (400 मिग्रा०) एक गोली पर्याप्त है। इसे समय-समय पर लेना उचित रहता है।

स्टूल की जाँच आवश्यक

एनीमिया होने पर मल stool  की जाँच करना आवश्यक होता है। इससे कई बातों का पता चल सकता है। स्टूल में कृमि का पता चल जाता है। यह भी बताया जा सकता है कि मल में रक्त का ह्रास हो रहा है कि नहीं। कभी-कभी केवल एक बार जाँच करने पर मल की खराबी पकड़ में नहीं आंती। इसलिए ऐसी दशा में मल की जाँच कम से कम तीन बार करानी चाहिए।