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विश्व ल्यूपस दिवस : ऑटोइम्यून बीमारियों का होम्योपैथिक दवाओं से इलाज संभव

-जोड़ों, त्वचा, किडनी, हृदय और फेफड़ों पर प्रहार करती है यह बीमारी
-जीसीसीएचआर के मुख्य परामर्शदाता डॉ गिरीश गुप्ता से विशेष वार्ता

डॉ गिरीश गुप्ता

सेहत टाइम्स
लखनऊ। ल्यूपस/सिस्टेमिक ल्यूपस एरिथेमेटोसस (Lupus/SLE) एक क्रोनिक ऑटोइम्यून बीमारी है, इसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली स्वस्थ कोशिकाओं को दुश्मन समझकर उन पर हमला करती है। यह बीमारी जोड़ों, त्वचा, किडनी, हृदय और फेफड़ों में सूजन व क्षति का कारण बन सकती है। ल्यूपस का उपचार होम्योपैथिक दवाओं से किया जाना संभव है।

यह कहना है गौरांग क्लिनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के मुख्य परामर्शदाता वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता का। विश्व ल्यूपस दिवस (10 मई) के मौके पर ‘सेहत टाइम्स’ के साथ विशेष वार्ता में उन्होेंने बताया कि अनेक प्रकार की ऑटोइम्यून बीमारियों का उपचार होम्योपैथी में उपलब्ध है। सोरायसिस, रूमेटाइड आर्थराइटिस, एलोपेशिया एरियाटा, लाइकेन प्लेनस जैसी कई अन्य बीमारियों पर जीसीसीएचआर में किये गये उनके शोध राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय जर्नल्स में प्रकाशित किये जा चुके हैं।

डॉ गिरीश ने बताया कि होम्योपैथी के सिद्धांतों के अनुसार इलाज रोग का नहीं, रोगी का किया जाता है। होम्योपैथी में एक ही प्रकार के रोग की दर्जनों दवाएं मौजूद हैं, सभी दवाएं सभी रोगियों को फायदा दें, यह आवश्यक नहीं है, इसीलिए प्रत्येक मरीज की विस्तार से हिस्ट्री ली जाती है जिसमें उसके शारीरिक लक्षणों के साथ ही उसकी मन:स्थिति के बारे में जानकारी ली जाती है। इस तरह ‘टेलर मेड मेडिसिन’ एप्रोच के साथ रोग के मूल कारणों तक पहुंच कर प्रत्येक मरीज के लिए उसके अनुकूल दवा का चुनाव किया जाता है।

उन्होंने बताया कि ल्यूपस बीमारी के प्रमुख लक्षणों में अत्यधिक थकान, जोड़ों में दर्द, बुखार, और चेहरे पर तितली के आकार के रैश (Butterfly Rash) शामिल हैं। यह बीमारी अक्सर युवा महिलाओं में अधिक देखी जाती है।

डॉ. गुप्ता का कहना है कि होम्योपैथी केवल रोग के बाहरी लक्षणों को दबाने के बजाय व्यक्ति की सम्पूर्ण शारीरिक, मानसिक और प्रतिरक्षा स्थिति का अध्ययन कर उपचार करती है। इसी कारण ऑटोइम्यून बीमारियों में व्यक्तिगत प्रकृति के अनुसार दवा चयन को विशेष महत्व दिया जाता है।

आपको बता दें कि डॉ. गिरीश गुप्ता द्वारा प्रकाशित अपनी पुस्तक “एविडेंस बेस्ड रिसर्च ऑफ होम्योपैथी इन डर्मेटोलॉजी” में भी सोरायसिस, विटिलिगो, एलोपेशिया एरियाटा और लाइकेन प्लेनस जैसे रोगों पर शोध आधारित मामलों को शामिल किया गया है।

डॉ गिरीश गुप्ता ने कहा कि ऑटोइम्यून बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है, ऐसे में सुरक्षित और दीर्घकालिक उपचार के विकल्पों पर शोध की आवश्यकता बढ़ गई है। होम्योपैथी में हो रहे ऐसे अध्ययन मरीजों और चिकित्सा जगत दोनों के लिए नई संभावनाएं प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक मरीज की प्रकृति व अन्य शारीरिक-मानसिक लक्षणों के अनुसार दवा का चुनाव किये जाने के सिद्धांत के चलते होम्योपैथी में शोध कार्यों को बढ़ाने की आवश्यकता है।