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प्रोस्‍टेट कैंसर की कष्‍टकारी बायोप्‍सी अब गुजरे दिनों की बात, एसजीपीजीआई में दर्दरहित रोबोटिक बायोप्‍सी

-अभी तक यह सुविधा सिर्फ एम्‍स दिल्‍ली व पीजीआई चंडीगढ़ में उपलब्‍ध
-अब तक 15 केसेज में सफलतापूर्वक की जा चुकी है गाइडेड बायोप्‍सी

रोबोटिक बायोप्‍सी प्रक्रिया करती डॉ आफताब व उनकी टीम


धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना
लखनऊ।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित संजय गांधी पीजीआई में रोबोट से प्रोस्टेट की बायोप्सी की सुविधा सफलतापूर्वक शुरू हो चुकी है। इस नयी विधि से अब तक करीब 15 केसेज में सफल बायोप्‍सी की जा चुकी है। यह प्रदेश का पहला ऐसा संस्थान है जहां रोबोट से बायोप्‍सी की सुविधा अब उपलब्ध हो गई है, अभी तक यह सुविधा सिर्फ चंडीगढ़ पीजीआई और एम्स दिल्ली में ही उपलब्ध थी। आपको बता दें कि प्रोस्टेट कैंसर की पुष्टि के लिए बायोप्सी अनिवार्य रूप से की जाती है।

संस्थान के न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग में बीते सितंबर माह से इस विधि से बायोप्‍सी शुरू करने वाले न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ आफताब नजर ने बताया कि रोबोट से की जाने वाली इस बायोप्सी को गाइडेड बायोप्सी कहा जाता है।
डॉ आफताब ने बताया इस प्रोसेस से बायोप्‍सी करने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह लगभग दर्द रहित है, इसमें मात्र एक इंजेक्‍शन की तरह नाममात्र की चुभन महसूस होती है, और साथ ही पुरानी पद्धति से की जाने वाली बायोप्‍सी की अपेक्षा समय भी आधे से कम लगता है।

डॉ आफताब ने बताया कि अभी तक यह बायोप्सी प्रक्रिया मरीज के गुदाद्वार में सुई डालकर की जाती है, यह प्रक्रिया मरीज के लिए कष्टकारी और असुविधाजनक होती है क्योंकि इस पुरानी विधि से प्रोस्टेट ग्रंथि के अलग-अलग हिस्सों से 8 से 10 सैंपल लेने पड़ते हैं, लेकिन अब इस नई प्रक्रिया में पहले मरीज का पीएसएमए पेट स्कैन किया जाता है जिससे पता चलता है कि प्रोस्टेट के किस हिस्से में कैंसर कोशिकाएं ज्यादा हैं, इस हिस्से को न्यूक्लियर मेडिसिन चिकित्सक द्वारा चिन्हित करने के बाद रोबोट को निर्देशित किया जाता है। इस नई प्रक्रिया के तहत रोबोट की मदद से कमर के निचले हिस्से में एक बार सुई डालकर बायोप्सी प्रक्रिया संपन्न हो जाती है।


उन्होंने बताया कि इस नई तकनीक के माध्यम से मरीज के समस्त अंगों में कैंसर कोशिकाओं के फैलाव के साथ-साथ रोबोट द्वारा बायोप्सी करके कैंसर की सत्यता स्थापित की जा सकेगी इस प्रक्रिया में 15 से 20 मिनट का समय लगता है जबकि अब तक की जाने वाली कष्टकारी प्रक्रिया में करीब 1 घंटे का समय लग जाता है ऐसी स्थिति में समय की भी बचत होती है।
डॉ आफताब ने बताया कि इस प्रक्रिया को शुरू करने में उनके साथ उनकी पूरी टीम का योगदान बहुत सराहनीय है उनकी टीम में न्यूक्लियर मेडिसिन विभाग के डॉ प्रकाश, डॉ विवेक, डॉ लोकेश, डॉ बेला के साथ ही यूरोलॉजी विभाग की डॉ सुरेखा व डॉ अनिल शामिल हैं।

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