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बस कंडक्टर

जीवन जीने की कला सिखाती कहानी – 78 

डॉ भूपेन्‍द्र सिंह

प्रेरणादायक प्रसंग/कहानियों का इतिहास बहुत पुराना है, अच्‍छे विचारों को जेहन में गहरे से उतारने की कला के रूप में इन कहानियों की बड़ी भूमिका है। बचपन में दादा-दादी व अन्‍य बुजुर्ग बच्‍चों को कहानी-कहानी में ही जीवन जीने का ऐसा सलीका बता देते थे, जो बड़े होने पर भी आपको प्रेरणा देता रहता है। किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍वविद्यालय (केजीएमयू) के वृद्धावस्‍था मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य विभाग के एडिशनल प्रोफेसर डॉ भूपेन्‍द्र सिंह के माध्‍यम से ‘सेहत टाइम्‍स’ अपने पाठकों तक मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य में सहायक ऐसे प्रसंग/कहानियां पहुंचाने का प्रयास कर रहा है…

प्रस्‍तुत है 78वीं कहानी – बस कंडक्टर

हेलो भाईसाहब टिकट ले लीजिए टिकट..

बस कंडक्टर ने उस आदमी से कहा।

उस आदमी ने पीछे मुड़कर देखा और रौबदार आवाज में बोला, मैं टिकट नहीं लेता। दुबले-पतले कंडक्टर ने उस 6 फुट लम्बे और बॉडी बिल्डर आदमी को देखा तो उसकी दोबारा बोलने की हिम्मत ही नहीं हुई।

वह चुपचाप आगे बढ़ गया। अगले दिन वह आदमी फिर मिल गया। कंडक्टर ने फिर उससे टिकट के लिए पूछा, मैं कभी टिकट नहीं लेता। फिर वहीं उत्तर मिला।

अगले दिन वह बस में फिर चढ़ा और फिर उसने टिकट नहीं लिया। अगले कई दिनों तक यहीं सिलसिला चलता रहा। उसके टिकट न लेने से कंडक्टर के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती लेकिन उसके हट्टे-कट्टे शरीर को देखकर उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता।

एक दिन कंडक्टर के भीतर का मर्द जाग उठा, उसने सोचा कि आखिर कब तक इसके डर से नुकसान उठाते रहेंगे। अब तो इज्जत का सवाल है।

आखिरकार कंडक्टर ने एक महीने की छुट्टी ले कर अखाड़े में भर्ती हो गया।

अखाड़े में उसने खूब मेहनत की खूब पसीने बहाए। एक महीने बाद फिर वह अपने काम पर वापस आया तो उसकी खूब बॉडी बन चुकी थी और उसका आत्मविश्वास भी बढ़ गया था।

हां भाई टिकट के पैसे निकालो, कंडक्टर ने सोच लिया था कि आज इसे टिकट दे कर रहूंगा।

 मैं टिकट नहीं लेता, फिर वहीं जवाब मिला। अबे ऐसे कैसे नहीं लेगा।

कंडक्टर ने रोबदार आवाज में बोला। क्योंकि मैंने एक साल के लिए पास बनवा रखा है।

यह कहते हुए उसने पास निकाल कर बढ़ा दिया। अब तो कंडक्टर की ऐसी स्थिति हो गई जैसे खोदा पहाड़ और निकली चुहिया।

सीख

ऐसा अक्सर हमारे साथ होता है कि हम बिना जाने-समझे सामने वाले के प्रति अपनी राय बना लेते हैं। ये अच्छा है वो बुरा है, ये गलत है, वो सही है। इस प्रकार से हम मन ही मन कल्पनाओं के पहाड़ खड़े करते रहते हैं। मगर जब परिणाम सामने निकलता है तो हमें या तो शर्मिन्दा होना पड़ता है या पछताना पड़ता है। इसलिए हमें ऐसे नकारात्मक विचारों से बचना चाहिए।