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सावधान : मम्मियां शिशु को झुनझुना पकड़ायें, मोबाइल नहीं

-डेढ़ वर्ष की आयु तक बच्‍चे को सिर्फ ‘लोरी-कटोरी और स्‍टोरी’ : डॉ पियाली भट्टाचार्य
-क्‍या कहती है अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइन

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। आज आप अगर अपने बच्‍चे की मोबाइल की लत से परेशान हैं तो क्‍या आपने कभी यह सोचा है कि इसकी शुरुआत कैसे हुई, कहीं ऐसा तो नहीं कि आपने बच्‍चे के हाथ में पारम्‍परिक झुनझुने की जगह मोबाइल पकड़ा दिया हो। जी हां यह सच है कि आजकल की लाइफ स्‍टाइल में मोबाइल हमारी जिन्‍दगी में इतना प्रवेश कर चुका है कि अक्‍सर ऐसा होता है कि घर के चार सदस्‍य पास-पास बैठे होंगे लेकिन वे आपस में बात नहीं कर रहे होते हैं बल्कि चारों के हाथ में स्‍मार्ट फोन होता है और वे उसी दुनिया में खोये रहते हैं, यही बात बच्‍चे की परवरिश करते समय सामने आती है, अक्‍सर मांएं अपनी व्‍यस्‍तता के चलते बच्‍चे को स्‍मार्ट फोन पकड़ा देती हैं, बस यहीं से होती है बच्‍चे की मोबाइल की आदत पड़ने की शुरुआत।

यह बात संजय गांधी पीजीआई की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ पियाली भट्टाचार्य ने रविवार को हजरतगंज स्थित एक होटल में एडोल्‍सेंट हेल्‍थ एकेडमी के तत्‍वावधान में आयोजित सतत चिकित्‍सा शिक्षा (सीएमई) में अपनी प्रस्‍तुति में कही। इसका विषय था मीडिया बून और बेन। उन्‍होंने कहा कि अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ पीडियाट्रिक्स ने बच्‍चों के लिए स्‍क्रीन टाइम निर्धारित किया है, इसके अनुसार 18 माह तक के बच्‍चों को स्‍क्रीन मीडिया से दूर रखें, डॉ पियाली कहती हैं कि डेढ़ साल तक के बच्‍चे को सिर्फ ‘लोरी-कटोरी और स्‍टोरी’ सुनायें यहां स्‍टोरी से तात्‍पर्य उसको दुलारने के दौरान उससे की जाने वाली बातों से है। इसी प्रकार 18 माह से 24 माह तक के बच्‍चों को माता-पिता अपनी देखरेख में हाई क्‍वालिटी वाले कार्यक्रमों को दिखायें तथा यह देखें कि बच्‍चा क्‍या चीज रुचि लेकर देखा रहा है। दो वर्ष से पांच वर्ष तक की आयु वाले बच्‍चे को 24 घंटे में एक घंटा स्‍क्रीन देखने की अनुमति है, माता-पिता को चाहिये कि बच्‍चा हाई क्‍वालिटी वाले कार्यक्रमों को उनके साथ बैठकर देखे। पांच वर्ष के ऊपर के बच्‍चों को स्‍क्रीन टाइम सुसंगत तरीके से तय करें, जिसमें यह ध्‍यान रखें कि उसकी दिनचर्या, नींद प्रभावित न हो।

उन्‍होंने कहा कि बच्‍चे की पर‍वरिश में माता-पिता उसके रोल मॉडल होते हैं, बच्‍चे वही करते हैं जो वह माता-पिता को करते देखते हैं, अगर मां घंटों मोबाइल पर व्‍यस्‍त रहेगी तो बच्‍चे भी ऐसा ही करेंगे। उन्‍होंने बताया कि मोबाइल या अन्‍य गैजेट्स चलाने की लत से बचाने के लिए यह आवश्‍यक है कि हम बच्‍चे के फ्रेंड बनकर उन्‍हें समझाते हुए इस लत को न पड़ने दें। उन्‍होंने कहा कि बच्‍चे पर सख्‍ती करके उसे इंटरनेट से दूर रखना मुश्किल है क्‍योंकि ऐसा करके उनमें चोरी से इंटरनेट चलाने की आदत पड़ जायेगी इसलिए आवश्‍यक है कि इसके लिए एक टाइम टेबल बना लें।

उन्‍होंने कहा कि इसके साथ ही जब बच्‍चा इंटरनेट चलाये तो उसपर नजर रखें कि वह उसका उपयोग क्‍या चीज देखने में कर रहा है, क्‍योंकि अगर नजर नहीं रखी जायेगी तो उस पर वह पोर्नोग्राफी या कोई हिंसक मैटर भी देख सकता है। अगर बच्‍चा गेम खेल रहा है तो यह देखें कि वह कौन से गेम खेल रहा है, क्‍योंकि पिछले दिनों गेम खेलने वाले बच्‍चों के आत्‍महत्‍या के मामले भी सामने आये थे।

रोजाना 150 बार मोबाइल चेक करते हैं हम

-डॉ पियाली भट्टाचार्य बताती हैं कि सर्वे में पाया गया है कि अगर नींद के 8 घंटे निकाल दें तो बचे 16 घंटों में व्‍यक्ति 150 बार अपना मोबाइल चेक करता है।

-40 प्रतिशत आईटी प्रोफेशनल्‍स का कहना है कि वे प्रति 10 मिनट में अपनी ऑनलाइन प्रोफाइल चेक करते हैं।

-87 प्रतिशत भारतीय युवाओं का मानना है कि ऑफलाइन और ऑनलाइन लोगों की अपनी अलग-अलग पहचान होती है।

कितना इंटरनेट उपयोग करते हैं हम

-रोज 2 घंटे 31 मिनट सोशल मीडिया का उपयोग करता है व्‍यक्ति

-रोज 3 घंटे 24 मिनट मोबाइल पर इंटरनेट का उपयोग करता है व्‍यक्ति

-टैबलेट और कम्‍प्‍यूटर के माध्‍यम से एक व्‍यक्ति रोजाना 5 घंटे 4 मिनट इंटरनेट उपयोग करता है।

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इस सीएमई में डॉ निर्मला जोशी ने किशोरावस्‍था में पोषणयुक्‍त भोजन की आवश्‍यकता के बारे में जानकारी दी, जबकि डॉ निरुपमा पाण्‍डेय ने बच्‍चों के गलत व्‍यवहार को पॉजिटिव तरीके से सुधारने के बारे में तथा लड़कों को लड़कियों की इज्‍जत करना सिखाने के लिए व्‍यवहारगत तरीके से उन्‍हें कैसे समझाया जाये, इस बारे में बताया। सीएमई में डॉ इंदु वाखलू, डॉ आशीष बंसल, डॉ संजय, डॉ सुरभि, डॉ आर रस्‍तोगी, डॉ एस गुप्‍ता, डॉ पीके जोशी भी उपस्थित थे।

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