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शोध का प्रकाशन कराते समय फ्रॉड मेडिकल जर्नल्‍स से बचने के गुर बताये

-डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्‍थान में आयोजित हुई एक दिवसीय कार्यशाला

सेहत टाइम्‍स

लखनऊ। चिकित्सा क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोधों के प्रकाशन के लिए अनेक फ्रॉड यानी नकली जर्नल सक्रिय हैं, इन नकली जर्नल्‍स को पहचान कर इसमें न फंसने के लिए किस तरह जागरूक रहा जाए, इसको लेकर यहां डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान में एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों बिहार और उत्तराखंड के मेडिकल कॉलेजों (एम्स पटना, बीएचयू, एमएलबी झांसी, लखनऊ और आसपास के क्षेत्रों) के 40 संकाय सदस्य, जूनियर एवं सीनियर रेजिडेंट डॉक्टर्स एवं रिसर्च स्कॉलर्स व युवा शोधकर्ताओं ने भाग लिया।

आज मंगलवार 17 मई को संस्थान में इसका आयोजन संस्‍थान के कम्‍युनिटी मेडिसिन डिपार्टमेंट द्वारा किया गया। कार्यशाला का उद्घाटन संस्थान की निदेशक प्रोफ़ेसर सोनिया नित्यानंद ने किया। ज्ञात हो प्रो सोनिया नित्यानंद स्वयं एक अंतरराष्ट्रीय स्तर की शोध वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहा कि प्रीडेटरी और फ्रॉड जर्नल्‍स पूरे विश्व समुदाय के लिए चिंता का विषय हैं। उन्होंने कहा इसके बारे में मेडिकल बिरादरी को जागरूक किए जाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि पदोन्नति के लिए शोध का प्रकाशन अनिवार्य होने के कारण फैकल्‍टी व युवा शोधकर्ता अपने शोध के प्रकाशन को लेकर दबाव में होते हैं, ऐसी स्थिति में इन लोगों के ऐसे फ्रॉड जर्नल्स के जाल में फंसना आसान होता है। उन्‍होंने कहा कि स्क्रीनिंग कमेटी द्वारा भी प्रस्तुत प्रकाशनों की सूची में अन्य विषयों के शोध पत्रों को जांचना कठिन होता है, ऐसे में ऐसी कार्यशालोओं की बहुत उपयोगिता है।

एमिटी स्कूल ऑफ कम्युनिकेशन के मुखिया/निदेशक व डिप्टी डीन रिसर्च एमिटी विश्वविद्यालय ग्वालियर डॉ सुमित नरूला ने इस कार्यशाला के लिए कोर्स का निर्धारण किया था। इस मौके पर प्रतिभागियों को नकली, प्रिडेटरी और क्लोन जर्नल्स की पहचान के लिए प्रशिक्षण दिया गया।

कार्यशाला के आयोजन सचिव एसोसिएट प्रोफेसर डॉ मनीष कुमार सिंह ने बताया कि यह सही है कि ऑनलाइन जर्नल्‍स प्रकाशन के लिए अधिक और आसानी से  उपलब्धता प्रदान करते हैं, लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि इनमें फ्रॉड जर्नल्‍स की पहचान कर उनसे बचना चाहिए।

कार्यशाला के आयोजन अध्यक्ष व कम्‍युनिटी मेडिसिन विभाग के हेड प्रोफ़ेसर एसडी कांडपाल ने कहा कि प्रीडेटरी जनरल बिना किसी गुणवत्ता की जांच, बिना किसी मानकों को देखे एक समय सीमा के अंदर उसे छापने का वादा कर लेखकों से फीस लेकर इसे छापने के लिए स्वीकार कर लेते हैं।

कार्यशाला में विभिन्न पत्रिकाओं के एच इंडेक्स, साइट स्कोर द्वारा उद्धृत इम्पैक्ट फैक्टर की शुद्धता की पहचान करने पर चर्चा हुई। अपनी वेबसाइट पर पत्रिकाओं द्वारा उद्धृत अनुक्रमण की प्रामाणिकता की जांच का प्रदर्शन किया गया। कार्यशाला में बताया गया कि कैसे प्रीडेटोरी जर्नल्स, ओपन एक्सेस जर्नल्स से भिन्न हैं। इसी तरह प्रीडेटोरी, नकली क्लोन जर्नल्स की पहचान कैसे करें इसके अतिरिक्‍त युवा शोधकर्ताओं को प्रतिष्ठित शोध-पत्रिकाओं के चयन करने के तरीके के विषय में मार्गदर्शन दिया गया। प्रतिभागियों को बताया गया कि शोध पत्रों की विश्वसनीयता व सत्यता के मानक, इंपैक्ट-फैक्टर्स के नकली होने और संदिग्धता को कैसे पकड़ा जाए।

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