-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट डॉ एके त्रिपाठी के साथ वार्ता शृंखला-भाग-14

सेहत टाइम्स
लखनऊ। स्वस्थ बने रहना व्यक्ति का सपना होता है, लेकिन कैसे स्वस्थ रहें, यह एक बड़ी चुनौती होती है। इसी चुनौती को आसान बनाने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा समाचार शृंखला चलायी जा रही है। इस शृंखला के तहत राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा आसान शब्दों में महत्वपूर्ण जानकारियां दी जाती हैं। ज्ञात हो रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले प्रो त्रिपाठी किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवाएं दे चुके हैं।
आमजन के साथ ही स्टूडेंट्स के लिए भी है उपयोगी हैं ये जानकारियां
ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक हैं, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी हैं, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए विद्यार्थी आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।
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पहले के सभी एपीसोड नीचे दिये गये उनके शीर्षक पर क्लिक कर पढ़े जा सकते हैं
1 से लेकर 13 तक के सभी एपीसोड के शीर्षक
भाग 1 …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें‘
भाग 2 …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें
भाग 3 …‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें
भाग 4 …‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें
भाग 5 …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें
भाग 6 …सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये…क्लिक करें
भाग 7 … खतरनाक रोग है एप्लास्टिक एनीमिया क्योंकि निश्चित और एक नहीं है इसका कारण…क्लिक करें
भाग 8 … बुढ़ापे में एनीमिया को न करें नजरंदाज, गंभीर बीमारी का हो सकता है संकेत…क्लिक करें
भाग 9 …प्रसव के बाद भी माँ को लम्बे समय तक आयरन का इस्तेमाल करना जरूरी…क्लिक करें
भाग 10… कैंसर होने का एकमात्र लक्षण भी हो सकता है एनीमिया…क्लिक करें
भाग 11…अक्सर पेट खराब रहना भी बड़ी वजह है एनीमिया होने की…क्लिक करें
भाग 12 एनीमिया होने के कारणों में एक बड़ा कारण है तम्बाकू का सेवन…क्लिक करें
भाग 13 अनुवांशिक भी होता है एनीमिया…क्लिक करें
अब प्रस्तुत है भाग 14
एनीमिया के उपचार में ब्लड ट्रांसफ्यूजन कब, क्या है पैमाना
इस एपीसोड में एनीमिया के उपचार में दवा और रक्त चढ़ाने की क्या भूमिका के बारे में जानकारी दी गयी है, इसके अलावा रक्तदान को लेकर लोगों में बैठे भ्रम पर भी प्रकाश डाला गया है।
डॉ एके त्रिपाठी बताते हैं कि एनीमिया होने पर प्रायः लोग यह मांग करते हैं कि क्यों न रक्त चढ़ा दिया जाये जिससे मरीज तुरन्त ठीक हो जाये। ऐसा भी होता है कि एनीमिया के इलाज के नाम पर चिकित्सक द्वारा बिना किसी डायग्नोसिस के रक्त चढ़ा दिया जाता है। रक्त चढ़ाने के मसले को इतनी सरलता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि इसके कई दुष्परिणाम भी हो सकते हैं, इसलिए रक्त तभी चढ़ाना चाहिए जब एनीमिया के इलाज में और कोई विकल्प न हो।
हीमोग्लोबिन की मात्रा रक्त चढ़ाने का पैमाना नहीं
डॉ त्रिपाठी ने खास जानकारी देते हुए बताया कि लोग यह जानना चाहते हैं कि हीमोग्लोबिन कितना गिर जाने पर रक्त चढ़ाना आवश्यक है, तो मैं बता दूं कि इसका कोई एक उत्तर नहीं है। रक्त चढ़ाने का फैसला हीमोग्लोबिन की मात्रा पर निर्भर होने के साथ-साथ इस बात पर भी निर्भर करता है कि मरीज को एनीमिया की वजह एवं लक्षण कौन-कौन से है, तथा एनीमिया के साथ और कौन-कौन सी बीमारियां हैं। उदाहरण के तौर पर हीमोग्लोबिन की मात्रा 6 ग्रा0% तक हो जाने पर भी किसी-किसी मरीज को हल्की कमजोरी के सिवाय और कोई विशेष लक्षण नहीं होता है, जबकि इतने हीमोग्लोबिन पर हृदय रोगियों में हृदय संबन्धी बीमारी के लक्षण (जैसे-सांस फूलना या हृदय में दर्द) बढ़ जाते हैं। इसलिए 6 ग्रा0% हिमोग्लोबिन के स्तर पर ऐसे मरीजों को खून चढ़ाने की आवश्यकता हो जाती है जबकि अन्य मरीजों में (जो अन्य बीमारी से रहित हैं) रक्त चढ़ाना आवश्यक नहीं होता है।
एनीमिया होने की रफ्तार पर भी निर्भर
डॉ त्रिपाठी बताते हैं कि एनीमिया द्वारा उत्पन्न लक्षण और इस स्थिति में रक्त चढ़ाने की आवश्यकता इस बात पर भी निर्भर करती है कि एनीमिया कितनी तेजी से उत्पन्न हुआ है। यदि हीमोग्लोबिन में धीरे-धीरे कमी हुई है, जैसे कुछ महीनों में 12 ग्रा0% से घटकर 5 ग्रा0% हुआ है तो मरीज में हल्की-फुल्की कमजोरी के अलावा और कोई लक्षण नहीं मिलता है क्योंकि शरीर एनीमिया का अभ्यस्त हो जाता है। इसके विपरीत किसी कारणवश (जैसे अधिक रक्त स्राव होने से) यदि एनीमिया एक या दो दिन में 12 ग्रा0% से 5 ग्रा0% तक पहुंच जाता है तो ऐसी स्थिति में शरीर के विभिन्न अंगों और क्रियाओं को संभलने का समय नहीं मिलता है। फलस्वरूप मरीज में काफी गम्भीर लक्षण जैसे अत्यधिक कमजोरी, चक्कर, बेहोशी, सांस फूलना उत्पन्न हो जाते हैं। ऐसी हालत में हिमोग्लोबिन को सामान्य स्तर पर लाने के लिए रक्त का चढ़ाना आवश्यक हो जाता है।
रक्तदान पर भ्रांतियां
एनीमिया के उपचार के लिए रक्त चढ़वाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है। हमारे देश में अनुमानतः प्रतिवर्ष एक करोड़ यूनिट रक्त की आवश्यकता होती है। ज़रूरत पड़ने पर कभी-कभी रक्त उपलब्ध नहीं हो पाता। कारण, रक्तदान को लेकर लोगों में भ्रांतियां हैं। लोग समझते हैं कि रक्तदान करने से शरीर को बहुत नुकसान होता है। जबकि सत्य यह है कि रक्तदान से शरीर में कोई कुप्रभाव नहीं पड़ता है।
लोग रक्तदान के लिए जागरूक हो रहे
18 वर्ष से 60 वर्ष की उम्र तक कोई भी व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। रक्त लेने से पहले व्यक्ति का पूरी तरह परीक्षण किया जाता है और रक्त तभी लिया जाता है जब वह चिकित्सकीय दृष्टि से रक्त देने लायक हो। रक्तदान करने के बाद जल्दी ही शरीर भरपाई कर लेता है। रक्तदाताओं को इस संबन्ध में किसी विशेष प्रकार के पोषण की आवश्यकता नहीं होती। एक स्वस्थ व्यक्ति तीन महीने के अन्तराल पर रक्तदान कर सकता है। यह अच्छी बात है कि अपने देश में लोग रक्तदान के लिए जागरूक हो रहे हैं इसलिए पेशेवर रक्तदाताओं को बढ़ावा नहीं मिल रहा है। विदित है कि पेशेवर रक्तदाताओं के रक्त में एच.आई.वी. और अन्य संक्रमण की सम्भावना स्वैच्छिक रक्तदाताओं से कहीं अधिक होती है।

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