-गर्भावस्था में मधुमेह की समस्या के समाधान के लिए विस्तृत कार्यशाला का आयोजन
-लखनऊ ऑब्स एंड गाइनी सोसाइटी की कार्यशाला में जुटे लखनऊ सहित देशभर से कई विशेषज्ञ
सेहत टाइम्स
लखनऊ। लखनऊ ऑब्स एंड गाइनी सोसाइटी (LOGS) ने 30 मिलियन से अधिक महिलाओं को प्रभावित कर रही GDM (Gestational Diabetes Mellitus) यानी गर्भावस्था में मधुमेह की समस्या के समाधान के लिए 29 मार्च को विस्तृत कार्यशाला का आयोजन किया। LOGS द्वारा FOGSI और GAWA के ICOG, SAFOG, रिसर्च सोसाइटी ऑफ डायबिटीज इन इंडिया और UPDA के साथ संयुक्त रूप से यहां गोमती नगर स्थित होटल में आयोजित शैक्षिक कार्यशाला में देश भर से 150 से अधिक डॉक्टरों, शोधकर्ताओं, परामर्शदाताओं और डॉ. वी. शेषैया और डॉ. भवथारिनी जैसे विशेषज्ञों ने भाग लिया।
लॉग्स की सचिव डॉ सीमा मेहरोत्रा ने यह जानकारी दी। उन्होंने कहा कि गर्भावस्था में डायबिटीज की जांच बहुत आवश्यक है, और यदि जांच में रक्त में ग्लूकोज का स्तर बढ़ा हुआ आता है तो इसके लिए चिकित्सक की देखरेख में प्रभावी नियंत्रण रखना सबसे ज्यादा जरूरी है। उन्होंने कहा कि क्योंकि डायबिटीज का असर गर्भ में पलने वाली संतान पर पड़ सकता है, जिससे उसे उसके जीवन काल में कभी भी डायबिटीज होने का खतरा रहता है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में आने वाली पीढि़यों पर इसका असर पड़ सकता है। हमें अगली जेनरेशन को इससे बचाना होगा।


कार्यशाला में आये विशेषज्ञों ने कहा कि भारत को दुनिया की मधुमेह राजधानी के रूप में जाना जाता है और गर्भावस्था में Hyperglycemia के मामलों की बढ़ती संख्या कुल जीवित जन्मों के लगभग 13-16% को प्रभावित करती है, जो गंभीर चिंता का विषय है। कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए प्रोफेसर एमेरिटस पद्मश्री डॉ वी शेषाई, जिन्हें GDM के जनक के रूप में जाना जाता है, ने GDM की प्रारंभिक रोकथाम की भूमिका पर प्रकाश डाला क्योंकि GDM का एक मामला सभी पीढ़ियों को प्रभावित करता है और कैसे गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ आहार और जीवन शैली के बारे में शिक्षित करने के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया जा सकता है, जिससे मामलों में महत्वपूर्ण कमी आ सकती है।
इस कार्यशाला का संचालन डॉ प्रीति कुमार अध्यक्ष LOGS, डॉ सुजाता देव सचिव GAWA और डॉ सीमा मेहरोत्रा सचिव LOGS ने किया। कार्यशाला में चेन्नई की प्रमुख मधुमेह रोग विशेषज्ञ डॉ भवथारिनी ने कहा, ‘हर गर्भावस्था कीमती होती है और जटिलताओं को रोकने के लिए हर महिला को जीसीटी (Glucose Challenge Test) करानी चाहिए। डॉ. मनोज श्रीवास्तव, अध्यक्ष UPDA और कानपुर के डॉ. सौरभ मिश्रा ने बतया कि कैसे नई पीढ़ी के इंसुलिन वितरण प्रणाली और नई जांच के तौर-तरीकों के बारे में जानकारी सभी स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के लिए जरूरी है। अहमदाबाद के एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. फागुन शाह और गोरखपुर की डॉ साधना गुप्ता ने लचर जीवन शैली और दोषपूर्ण खान-पान की आदतों के कारण युवा किशोरों में PCOS और GDM के बढ़ते अंतरसंबंध को रेखांकित किया।
शहर के जाने-माने मधुमेह रोग विशेषज्ञ और एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ मुकलेश, डॉ शरद, डॉ कौसर उस्मान ने भी कार्यशाला में महत्वपूर्ण जानकारियां देते हुए बताया कि मोटापे के बढ़ते स्तर (पहले से ही उच्च और महंगा) और लचर जीवन शैली के कारण एचआईपी में वृद्धि जारी है और वर्ष 2040 तक मामलों में दस गुना वृद्धि होने की उम्मीद है। डॉ प्रीति कुमार ने कहा कि गर्भवती महिलाओं को स्वस्थ आहार और जीवन शैली पर शिक्षित करने के लिए स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करके और इस तरह की और अधिक कार्यशालाओं का आयोजन करके प्रभावी क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के माध्यम से इस कैडर को मजबूत करने की आवश्यकता है। कार्यशाला का समापन लॉग्स सचिव डॉ सीमा मेहरोत्रा और संयुक्त सचिव डॉ मालविका द्वारा प्रतिभागियों को धन्यवाद प्रस्ताव और जीडीएम की प्राथमिक रोकथाम को बढ़ावा देने की शपथ के साथ हुआ। कार्यशाला में वरिष्ठ स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ मंजू शुक्ला, डॉ सुनीता चन्द्रा सहित अनेक चिकित्सक उपस्थित रहे।
