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बस एक छोटा सा चीरा और ब्रेन ट्यूमर बाहर

बिना खोपड़ी खोले, संभव है एमआईएस तकनीक से ब्रेन सर्जरी

पद्माकर पांडेय
लखनऊ। ब्रेन ट्यूमर को निकालने के लिए खोपड़ी खोलना और हड्डी काटने का जोखिम उठाने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इसके लिए मिनिमल इनवेजिबिल सर्जरी तकनीक से मात्र 3 सेमी का चीरा लगाकर, इंडोस्कोप से ट्यूमर को बाहर निकालना संभव हो चुका है। उक्त टेक्रीक का प्रशिक्षण आस्ट्रेलिया के वरिष्ठ न्यूरो सर्जन चार्ल्स टिओ ने, न्यूरोलॉजिकल सर्जन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया के 7 वें वार्षिक अधिवेशन के अवसर पर केजीएमयू में विभिन्न प्रांतों से आये न्यूरो सर्जन्स को लाइव सर्जरी द्वारा दिया। यह जानकारी शनिवार को केजीएमयू के न्यूरोसर्जरी हेड डॉ.बीके ओझा ने दी।

कन्वेंशन सेंटर में चल रही तीन दिवसीय कार्यशाला के दूसरे दिन डॉ.ओझा ने बताया कि शरीर के विभिन्न अंगों में लेप्रोस्कोपिक की भांति ब्रेन सर्जरी भी संभव हो चुकी है। ऑस्ट्रेलिया के डॉ.चार्ल्स ने, इंडोस्कोप द्वारा मिनिलम इन्वेजिबिल सर्जरी तकनीक का इजाद कर, ओपन ब्रेन सर्जरी के खतरे को कम कर दिया है। हलांकि हर तरह के ब्रेन ट्यूमर पर, कारगर नही हुई है। मगर, तमाम मरीज कम खतरे और नुकसान में ब्रेन ट्यूमर से निजाद पा जा रहे हैं। इस सर्जरी में उन्होंने बताया कि सीटी द्वारा ट्यूमर की एक्चुअल स्थिति देखी जाती है। इसके बाद ट्यूमर के सामने सबसे सुरक्षित जगह पर सिर में छेद कर इंडोस्कोप मशीन डालते हैं और उसी रास्ते से ट्यूमर को बाहर निकालना संभव है। जबकि अभी तक पहले सिर की ऊपरी हड्डी काटना होता है और फिर ब्रेन को क्षति पहुंचाते हुए ट्यूमर को निकालना पड़ता है। एमआईएस तकनीक से मरीज में ब्लीडिंग नहीं होती है और शीघ्र ही घर चला जाता है।

रीढ़ की हड्डी भी फिक्स करना संभव हुआ एमआईएस तकनीक से

डॉ.ओझा ने बताया कि रीढ़ की हडड़ी में जोड़ों में गैप आ जाता है, हड़डियां हिलने लगती हैं, जिसकी वजह से दिक्कतें शुरू हो जाती हैं ऐसी स्थिति में अब, बड़ा चीरा लगाकर स्पाइन सर्जरी करने की जरूरत नहीं है, एमआईएस तकनीक द्वारा जिस हिस्से में दिक्कत हैं वहीं पर छोटा चीरा लगातार हड़डिय़ों को फिक्स करना संभव हो चुका है। इतना ही नहीं, ब्रेन और स्पाइन को जोडऩे वाले हिस्से कार्पस कोलेजम का ट्यूमर भी एमआईएस तकनीक से निकालना सहज हो चुका है।

वेंट्रीकल ट्यृूमर को भी इंडोस्कोपी तकनीक से निकालना संभव

डॉ.बीके ओझा ने बताया कि ब्रेन में पानी की थैली (वेंट्रीकल) में ट्यूमर बन जाता है। इसे निकालने के लिए ब्रेन को काटने की जरूरत नहीं है, बल्कि इंट्रावेंट्रीकुलर तकनीक (इंडोस्कोप) से ट्यूमर को निकाला जा सकता है। यह तकनीक मरीज को ओपन ब्रेन सर्जरी के समस्त खतरों से बचाती है। पानी के अंदर थैली की दीवारों पर थक्के जम जाते हैं उन्हें भी निकाला जा सकता है। कार्यशाला के पहले दिन तमाम चिकित्सकों ने तकनीक का प्रशिक्षण लिया।

रेडिएशन सर्जरी सबसे बेहतर

पीजीआई के न्यूरो सर्जन डॉ.अनन्त मेहरोत्रा ने बताया कि ब्रेन के 70 प्रतिशत नॉन कैंसरस ट्यूमर को रेडिएशन सर्जरी (गामा और साइबर नाइफ)तकनीक द्वारा खत्म किया जा सकता है। खासबात है कि यह सर्जरी बिना किसी नुकसान के, उतने की खर्च में संभव है। हलांकि यह तकनीक कुछ कैंसर युक्त ट्यूमर के लिए मुफीद हैं। उन्होंने बताया कि इस तकनीक में विशेष प्रकार की किरणों से ब्रेन के ट्यूमर को तीन सेमी के आकार तक सिकोड़ देते हैं। इसके बाद उक्त ट्यूमर पर और हैवी रेडिएशन, हार्ड पावर की किरणें छोंड़ी जाती है। जिससे उक्त ट्यूमर बर्न होकर खत्म हो जाता है। यह तकनीक वन डे प्रोसिजर है, अर्थात ब्रेन ट्यूमर का मरीज उसी दिन वापस घर चला जाता है। इसके खतरे बिलकुल नहीं है, क्योंकि रेडिएशन में दी जाने वाली किरणें, ट्यूमर के अतिरिक्त किसी अंग पर प्रभावी नहीं होती हैं। कुछ तरह की स्पाइन सर्जरी में भी यह तकनीक कारगर है।

बच्चों में जैसा ट्यूमर, वैसा इलाज

केजीएमयू में मॉलीकुलर बायोलॉजी सेंटर की डॉ.नीतू सिंह के प्रयासों से बच्चों के पोस्टरियर फोसा ट्यूमर ( ब्रेन ट्यूमर) का इलाज आसान हो गया है। डॉ.नीतू ने बताया कि बच्चों में ब्रेन के नीचे हिस्से में ट्यूमर की शिकायत हो जाती है। जो कि इलाज के लिहाज से बहुत खतरनाक होता है। बीते तीन साल में केजीएमयू में आने वाले 30 से 40 बच्चों के ट्यूमर का सैंपल एकत्र किया और जांच द्वारा 15 तरह के ट्यूमर की पुष्टि हुई। सभी ट्यूमर का नेचर अलग है, जिसकी वजह से सबका ट्रीटमेंट भी अलग है। उक्त जांच के बाद, मरीज बच्चे के ट्यूमर के नेचर के आधार पर रेडिएशन या कीमो दी जाती है। इसकी वजह से, कीमो या रेडिएशन से होने वाले सामूहिक नुकसान को बचाना संभव हो चुका है, अन्यथा अभी तक सभी बच्चों को एक प्रकार से हाई पावर की दवाओं की कीमो या रेडिएशन दिया जाता रहा है, जिसके साइड इफेक्ट झेलने के लिए बच्चे मजबूर थे।

समारोह में प्रख्यात न्यूरो सर्जन्स डॉ. पी.एन. टण्डन, डॉ. वी.एस. दवे, डॉ. डी.के. छाबड़ा, डॉ. मजहर हुसैन, डॉ. वी.के. जैन और डॉ. देविका नाग को सम्मानित भी किया गया।

 

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