शिशु को एनीमिया से बचाना है तो गर्भनाल काटने में न करें जल्दबाजी

सभी अस्पतालों को भी इसके प्रति किया जायेगा जागरूक

लखनऊ। राष्ट्रीय पोषण मिशन के तहत सरकार द्वारा एनीमिया का समाधान करने की रणनीति बनायीं गयी हैं जिसमे सभी सरकारी अस्पतालों में गर्भनाल को देरी से काटने के लिए 3 मिनट (या कॉर्ड पल्सेशन बंद होने तक) – बढ़ावा दिया जायेगा ताकि जन्म के 6 महीने तक नवजात शिशु के आयरन तत्वों के स्तर में सुधार हो सके। लौह तत्व या आयरन की कमी के कारण ही एनीमिया (खून की कमी) होता हैं।

 

डॉ. रेखा सचान, क्वीन मैरी अस्पताल, केजीएमयू की स्त्री रोग विशेषज्ञ बताती है कि एनीमिया भारत में एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है। बड़ी संख्या में महिलाएं एनीमिक हैं, खासतौर पर गर्भवती महिलाएं जिनमे सही समय पर एनीमिया का पता न चलने पर वो अपनी जान भी गंवा सकती हैं।

 

वह बताती है “समान रूप से गर्भनाल काटने को लेकर कई महत्वपूर्ण धारणाएं हैं। अगर मां का ग्रुप रेसस (आरएच) नेगेटिव है या बच्चा समय से पहले जन्मा है तो गर्भनाल तुरंत काट दी जानी चाहिए बाकी परिस्तिथियों में गर्भनाल को देरी से ही काटना चाहिए।”

 

उन्होंने सुझाव दिया कि फेरस एस्कॉर्बेट टैबलेट का उपयोग फेरस सल्फेट टैबलेट की तुलना में अधिक प्रभावी हैं जो वर्तमान में वितरित किए जा रहे हैं। एस्कॉर्बिक एसिड (विटामिन सी) की वजह से आयरन तीन गुना ज्यादा खून में अब्जोर्ब होता हैं जिसके कारण खून में एचबी की मात्रा बढ़ जाती हैं।

 

इसके साथ ही सभी नवजात शिशु की प्रतिरक्षण क्षमता बढ़ाने के लिए जन्म के एक घंटे के भीतर स्तनपान करवाने के प्रयास को बढ़ावा दिया जाएगा। यह कार्य प्रसव करवाने वाली स्वास्थ्य कर्मी करेंगे इसके अलावा एनीमिया की स्क्रीनिंग शुरू की जाएगी और हीमोग्लोबिन का स्तर जानने के लिए नई तकनीक उपलब्ध कराई जाएगी। विद्यालय के किशोरों का राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) की मोबाइल टीमों द्वारा बिना सुई लगाये डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर का उपयोग करके जांच की जाएगी जबकि गर्भवती महिलाओं का एचबी टेस्ट सभी प्रसवपूर्व चेक-अप (एएनसी) के दौरान किया जाएगा।

यह नेशनल आयरन प्लस इनिशिएटिव (नीपी) द्वारा जारी किए गए दिशानिर्देशों में सूचीबद्ध कुछ कदम हैं, जिससे जीवन भर एनीमिया से बचाव किया जा सकता है , जो अब एनीमिया मुक्त भारत का हिस्सा है।

पोषण अभियान के लक्ष्यों का देखते हुए, एनीमिया मुक्त भारत की रणनीति को इस तरह से बनाया गया हैं ताकि बच्चों, प्रजनन आयु वर्ग (15-49 वर्ष) के किशोरों और महिलाओ में एनीमिया के प्रसार को कम करने के लिए 2018 से 2022 के बीच प्रति वर्ष 3 प्रतिशत अंक को कम किया जायेगा।

 

एनीमिया न केवल प्रतिरक्षण क्षमता और मनुष्य की कार्य करने की क्षमता को कम करता है , बल्कि बच्चों के संज्ञानात्मक विकास पर भी प्रतिकूल प्रभाव डालता है। अगर गर्भवती महिलाएं एनीमिक हैं तो उन्हें प्रसव उपरान्त रक्तस्राव, तंत्रिका नली दोष, कम वज़न का बच्चा, समयपूर्व जन्म और मातृ मृत्यु जैसे जोखिमो का खतरा रहता हैं। एनीमिया अपने सबसे गंभीर रूप में होने पर मौत का कारण भी बन सकता है।