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पितरों के प्रति श्रद्धा-कृतज्ञता की अभिव्यक्ति है श्राद्ध एवं तर्पण

पितृ विसर्जन अमावस्या पर विशेष लेख : प्रस्तुति अरविन्द निगम

भारतीय संस्कृति ने यह तथ्य घोषित किया है कि मृत्यु के साथ जीवन समाप्त नहीं होता। अनन्त जीवन श्रृंखला की एक कड़ी मृत्यु भी है। इसलिए संस्कारों के क्रम में ‘जीव’ की उस स्थिति को भी बांधा गया है, जब वह एक जन्म पूरा करके अगले जीवन की ओर उन्मुख होता है। कामना की जाती है कि संबंधित जीवात्मा का अगला जीवन पिछले की अपेक्षा अधिक सुसंस्कारवान् बने। इस निमित्त जो कर्मकांड किए जाते हैं, उनके लाभ जीवात्मा की क्रिया-कर्म करने वालों की श्रद्धा के माध्यम से ही मिलते हैं। इसीलिए मरणोत्तर संस्कार को श्राद्धकर्म भी कहा जाता है।

इस दृश्य संसार में स्थूल शरीर वालों को जिस इन्द्रिय भोग, वासना, तृष्णा एवं अहंकार की पूर्ति में सुख मिलता है, उसी प्रकार पितरों का सूक्ष्म शरीर शुभ कर्मों से उत्पन्न सुगन्ध का रसास्वादन करते हुए तृप्ति अनुभव करते हैं। उनकी प्रसन्नता तथा आकांक्षा का केंद्र बिन्दु श्रद्धा है।

श्रद्धा भरे वातावरण के सानिध्य में पितर अपनी अशांति खोकर आनंद का अनुभव करते हैं। श्रद्धा ही उनकी भूख है, इसी से उन्हें तृप्ति होती है। इसलिए पितरों की प्रसन्नता के लिए श्राद्ध एवं तर्पण किए जाते हैं। पितर वे हैं, जो पिछला शरीर त्याग चुके; किंतु अगला शरीर अभी प्राप्त नहीं कर सके। इस मध्यवर्ती स्थिति में रहते हुए वे अपना स्तर मनुष्यों जैसा ही अनुभव करते हैं।मुक्त आत्माओं और पितरों के प्रति मनुष्यों को वैसा ही श्रद्धाभाव दृढ़ रखना चाहिए: जैसा देवों-प्रजापतियों तथा परमात्म-सत्ता के प्रति। मुक्तों, देवों, प्रजापतियों एवं ब्रह्म को तो मनुष्यों की सहायता की आवश्यकता नहीं होती। किंतु पितरों को ऐसी आवश्यकता होती है। उन्हें ऐसी सहायता दी जा सके, इसीलिए मनीषि-पूर्वजों ने पितर-पूजन, श्राद्धकर्म की परम्परायें प्रचलित की थी।

योगवासिष्ठ में बताया गया है कि मरने के समय प्रत्येक जीव मूर्छा का अनुभव करता है। वह मूर्छा महाप्रलय की रात्रि के समान होती है। उसके उपरांत प्रत्येक व्यक्ति स्वयं ही अपने स्वप्न और संकल्प के अनुसार अपने परलोक की सृष्टि करता है।योगवासिष्ठ में यह भी बताया गया है कि मृत्यु के उपरांत प्रेत यानी मरे हुए जीव अपने बन्धु बान्धवों के पिण्डदान द्वारा ही अपना शरीर बना हुआ अनुभव करते हैं।

गीता के आठवें अध्याय में कहा गया है कि ” हे अर्जुन! जो अन्त समय में जिन भावों का स्मरण करता हुआ देह छोड़ता है, उन्हीं भावों से अनुप्राणित होकर वैसा ही नया शरीर, नया व्यक्तित्व प्राप्त करता है।”संन्यासी से इसीलिए संन्यास लेते समय उसके श्राद्ध-संस्कार भी उसी के द्वारा करा दिए जाते हैं, कि उसकी कोई भी आकांक्षा आसक्तिसूक्ष्म रूप में भी शेष न रहे।संसार एक समुद्र समान है, जिसमें जलकणों की भांति हर एक जीव है। विश्व एक शिला है, तो व्यक्ति एक परमाणु। जीवित या मृत आत्मा इस विश्व में मौजूद है और अन्य समस्त आत्माओं से सम्बद्ध है। संसार में कहीं भी अनीति, युद्ध, कष्ट, अनाचार, अत्याचार हो रहे हों, तो सुदूर देशों के निवासियों के मन में भी उद्वेग उत्पन्न होता है। जाड़े और गर्मी के मौसम में हर एक वस्तु ठण्डी और गर्म हो जाती है। छोटा सा यज्ञ करने पर भी उसकी दिव्यगंध व भावना समस्त संसार के प्राणियों को लाभ पहुंचाती है। इसी प्रकार कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता हैं। यह सूक्ष्म भाव तरंगें तृप्तिकारक और आन्नददायक होती है। सद्भावना की तरंगें जीवित-मृत सभी को तृप्त करती हैं, परन्तु अधिकांश भाग उन्हीं को पहुंचता है, जिनके लिये वह श्राद्ध विशेष प्रकार से किया गया है।

श्राद्ध प्रक्रिया में देव तर्पण, ऋषि तर्पण, दिव्य मानव तर्पण, दिव्य पितृ तर्पण, यम तर्पण, मनुष्य पितृ तर्पण नाम से 6 तर्पण कृत्य किये जाते हैं। इन सबके पीछे भिन्न भिन्न दार्शनिक पृष्ठभूमि है।देव तर्पण अर्थात ईश्वर की उन सभी महान् विभूतियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जो मानव कल्याण हेतु नि:स्वार्थ भाव से प्रयत्नरत हैं। वायु, सूर्य, अग्नि, चन्द्र, विद्युत् एवं अवतारी ईश्वर अंशों की मुक्त आत्माएं इसके अंतर्गत आती हैं।ऋषि तर्पण अर्थात व्यास, वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, जमदग्नि, अत्रि, गौतम, विश्वामित्र, नारद , चरक, सुश्रुत, पाणिनि, दधिचि आदि ऋषियों के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति के निमित्त किया जाता है।

दिव्य मानव तर्पण अर्थात उनके प्रति अपनी कृतज्ञता की अभिव्यक्ति, जो लोकमंगल के प्रति समर्पित हो, त्यागी जीवन जिए एवं विश्वमानव के लिए प्राणोत्सर्ग कर गए।दिव्य पितृ अर्थात वे, जो कोई बड़ी लोकसेवा तो न कर सके, पर व्यक्तिगत रूप से आदर्शवादी जीवन जी कर अनुकरणीय पवित्र सम्पत्ति अपने पीछे छोड़ गए।यम तर्पण अर्थात जन्म मरण का नियंत्रण करने वाली शक्ति। कुमार्ग पर चलने से रोक लगाने वाली विवेक शक्ति ही यम हैं। इसकी निरंतर पुष्टि होती रहे, मृत्यु का भाव बना रहे, इसलिये यम तर्पण किया जाता है।अंत में मनुष्य पितृ तर्पण की व्यवस्था है। इससे परिवार से संबंधित दिवंगत नर-नारी, पिता, बाबा-परबाबा, माता, दादी, परदादी, पत्नी,पुत्र, पुत्री, चाचा, नाना, परनाना, भाई, बुआ, मौसी, सास-ससुर एवं अन्त में गुरु-पत्नी,शिष्य एवं मित्रगण आते हैं।

इस प्रकार श्राद्ध तर्पण की सार्वभौमव्यवस्था में सारे समुदाय के प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति समाहित है। यह मात्र कर्मकांड तक सीमित न रहकर व्यवहार में उतरे, वसुधा एक विराट् परिवार है, इस भावना के रूप में साकार हो, उदार दानशीलता के रूप में लोकमंगल के कार्य बन पड़ें, तो ही इनकी सार्थकता है।पितृपक्ष का हिन्दू धर्म एवं संस्कृति में विशेष महात्म्य है। जो पितरों के नाम पर श्राद्ध और पिण्डदान नहीं करता, वह सनातन धर्मी, सच्चा देव संस्कृति का अनुयायी नहीं माना जा सकता। शास्त्र मान्यतानुसार मृत्यु होने पर मनुष्य की जीवात्मा चन्द्रलोक की तरफ जाती व ऊपर उठकर पितृलोक में पहुंचती हैं। उन मृतात्माओं को अपने नियत स्थान तक पहुंचने की शक्ति प्रदान करने-शांति देने के निमित्त ही पिण्डदान एवं श्राद्ध का विधान किया गया है।

श्रद्धा से श्राद्ध शब्द बना है। श्रद्धापूर्वक किया गया कार्य ही श्राद्ध कहलाता है। श्राद्ध से श्रद्धा जीवित रहती है। हमारे अदृश्य सहायक पितर गण गुरुजनों एवं पूर्वजों के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के निमित्त मात्र श्राद्ध-तर्पण के रूप में ही बन पड़ता है। मृत पितरों के प्रति कृतज्ञता के उन भावों का स्थिर रहना हमारी संस्कृति के अनुयायियों ने वर्ष में पंद्रह दिन का समय पृथक निकाल लिया है। पितृभक्ति का इससे उज्जवल उदाहरण और कहीं देखने को नहीं मिलता है।यह बात सदैव स्मरण रखना चाहिए कि यदि पितरों को सच्ची श्रद्धा दी जाएगी, उन्हें तृप्त रखा जाएगा तो वे निश्चित ही शक्ति, प्रकाश, प्रेरणा मागदर्शन, सहयोग व भावनात्मक अनुदान देंगे। पितरों के प्रति व्यक्त की गयी कृतज्ञता उलटे लौटकर बहुगुणित होकर स्वयं पर बरसती है। अपनी मोटी बुद्धि को तार्किक बनाते हुए हमें परोक्ष जगत् के अस्तित्व को श्रद्धा के साथ स्वीकार करना चाहिए तथा वहां विद्यमान सहायक आत्माओं से सम्पर्क स्थापित कर उनके अनुदानों से लाभान्वित होना चाहिए।

(लेख के प्रस्तुतकर्ता अरविंद कुमार निगम प्रतिनिधि अंतर्राष्ट्रीय गायत्री परिवार शांतिकुंज हरिद्वार, स्थानीय समन्वयक, लखनऊ अयोध्या जोन तथा वरिष्ठ प्रतिनिधि गायत्री परिवार, लखनऊ हैं।)

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