जटिल फ्रैक्चर के नए तरीकों से उपचार की गाइडलाइन तय करेगा AOTRAUMA

तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन 26 से 28 अप्रैल तक

लखनऊ. जिस तेजी से जिन्दगी की रफ़्तार हो रही है, हाइवेज पर एक्सीडेंट हो रहे हैं उनमें होने वाले फ्रैक्चर भी बहुत ही जटिल तरीके से हो रहे हैं. डॉक्टरी की किताबों में दी गयी फ्रैक्चर और उन्हें ठीक करने की विधि पुरानी हो चली है. ऐसे में विकसित और विकासशील देशों में नयी-नयी तकनीक से फ्रैक्चर का उपचार हो रहा है. तीन दिवसीय सम्मलेन में फ्रैक्चर के उपचार की सर्वोत्तम गाइडलाइन तय की जायेगी. जिससे मरीज को अच्छे से अच्छे उपचार का लाभ मिल सके. कांफ्रेंस का उद्देश्य भारत और विदेशों में हो रहे ऑर्थोपेडिक इलाज से सम्बंधित शोध और नए तरीकों को आम जनता के हित में सामने लाना है. इसलिए AOTRAUMA सम्मेलन का तीन दिवसीय आयोजन किया जा रहा है. इसमें विश्व भर से 250 लोग प्रतिभाग करने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आ रहे हैं. यह आठवीं कांफ्रेंस 26 से 28 अप्रैल तक गोमती नगर स्थित होटल हयात में आयोजित की जा रही है. भारत में होने वाली यह पहली कांफ्रेंस है.

 

पत्रकार वार्ता में यह जानकारी देते हुए इस सम्मेलन के आयोजन सचिव डॉ. संदीप कपूर ने बताया कि देश में तेजी से विकास हो रहा है, तेज गति से वाहन दौड़ रहे हैं. इससे जहाँ यातायात सुगम हुआ है वहीँ ट्रामा की घटनाओं में भी वृद्धि हो रही है. उन्होंने बताया कि अब कूल्हे, जोड़ के फ्रैक्चर के अलावा पैर और एड़ी की जटिल चोट सामने आने लगी है. इस सम्मलेन के को-चेयरमैन डॉ. संदीप गर्ग ने बताया कि सम्मलेन में आमंत्रित वक्ताओं में चिली से क्रिस्टियन ओर्तीज, जर्मनी से फ्रेडरिच बौमगाऐर्टेल, ऑस्ट्रेलिया से लेस ग्रूजिक और चीन से जिन बाओ वू के साथ ही भारत से वक्ताओं के रूप में डॉ. एमएस ढिल्लो, डॉ. संदीप कपूर, डॉ. संदीप गर्ग, डॉ. राजीव शाह, डॉ. बलविंदर राणा, डॉ मंगल परिहार शामिल हैं.

 

डॉ. कपूर ने बताया कि भारत में इस तरह का पहला सेमिनार है. उन्होंने बताया कि पहले जैसी स्थिति नहीं रही है, पहले जब पैर की हड्डी टूट जाती थी तो चार माह व्यक्ति को बिस्तर पर लिटाया जाता था फिर जब पैर ठीक हो जाता था तो अगर चलने में थोड़ी लंगडाहट भी हुई तो मान लिया जाता था कि यह तो स्वाभाविक है. लेकिन अब ऐसा नहीं है अब एक-एक मिलीमीटर नाप कर हड्डी जोड़ी जाती है. उन्होंने बताया कि आजकल कूल्हे के सॉकेट जब एक्सीडेंट में टूटते हैं तो वह काफी जटिल होते है. एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि कूल्हे का सॉकेट अगर मिलीमीटर में नहीं बैठा तो गठिया होने का डर बना रहता है.

 

डॉ. संदीप गर्ग ने भारत सरकार द्वारा पैर आदि के ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों को सस्ते दामों में उपलब्ध कराने का स्वागत करते हुए कहा कि बस इसमें एक दिक्कत यह है कि सस्ती होने के कारण इसकी डिमांड काफी बढ़ गयी है जिससे इसकी सप्लाई में दिक्कत आ रही है. उन्होंने बताया कि चूँकि पहले के मुकाबले अब सरकार द्वारा उपकरण का दाम कम तय कर दिया गया है इसलिए कंपनी को घाटा होने पर इसकी सप्लाई पूरी नहीं हो रही है. फिलहाल देश-विदेश के प्रमुख विषेशज्ञ इलाज की नयी-नयी  तकनीकियों को साझा कर एक नयी इबारत लिखेंगे.