-सूचना निदेशक ने कहा, अपुष्ट समाचार से उठते हैं पत्रकारिता की विश्वनीयता पर सवाल
-ख्यातिलब्ध आईटी विशेषज्ञों ने एआई के दौर में पत्रकारों को दीं महत्वपूर्ण जानकारियां
-एनयूजे यूपी ने ‘पत्रकारों में पत्रकारीय समझ’ विषय पर आयोजित किया सेमिनार

सेहत टाइम्स
लखनऊ। कार्य को शीघ्र और आसान बनाने के लिए नित नयी खोज के साथ बढ़ती टेक्नोलॉजी के इस युग में कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस/एआई) का प्रयोग निश्चित ही जरूरी है, लेकिन तकनीक के माध्यम से पहुंची सूचना के तथ्यों की सत्यता को लेकर उसकी पड़ताल करने के लिए पत्रकारों को तकनीक के माध्यम से ही उसकी पड़ताल करने की अपनी समझदारी को भी जागृत रखना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। यह वह लब्बोलुआब है जो शनिवार 24 अक्टूबर, 2026 को यहां सूचना निदेशालय स्थित सभागार में नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (एनयूजे) उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में सूचना विभाग के सहयोग से ‘पत्रकारों में पत्रकारीय समझ’ विषय पर आयोजित सेमिनार में वक्ताओं के वक्तव्यों में निकल कर सामने आया। सेमिनार के मुख्य अतिथि राज्य के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के निदेशक विशाल सिंह रहे, जबकि तीन विशिष्ट अतिथियों के रूप में आईटी विशेषज्ञ प्रोग्राम डाइरेक्टर टीसीएस डॉ अजय सिंह, आईआईटी कानपुर के एलुमनाई आईटी विशेषज्ञ अम्बरीश श्रीवास्तव एवं नेटवर्क 10 के सम्पादक संजय गिरी रहे।
एनयूजे के संरक्षक वीरेन्द्र सक्सेना की अध्यक्षता में आयोजित इस सेमिनार में एनयूजे प्रदेश अध्यक्ष सुरेन्द्र दुबे भी मंचासीन रहे। इस महत्वपूर्ण सेमिनार के संयोजन की कमान सम्भाली प्रमोद गोस्वामी व प्रभात रंजन दीन ने। औपचारिक स्वागत, आगमन सम्मान और स्वागत भाषण के उपरान्त सेमिनार के विषय पर विचारों का सिलसिला प्रारम्भ हुआ। संयोजक और सूत्रधार की भूमिका निभाने वाले प्रमोद गोस्वामी व प्रभात रंजन दीन ने सेमिनार के विषय पर पत्रकारों द्वारा समाचार लिखने के दौरान मस्तिष्क में कौंधने वाले प्रश्नों, भाषाई ज्ञान, अपनायी जाने वाली सतर्कता के बारे में उदाहरण प्रस्तुत कर सेमिनार की भूमिका तैयार करते हुए अतिथियों को विचार रखने के लिए आमंत्रित किया।

विशाल सिंह ने एआई के दुरुपयोग पर चिंता जतायी
मुख्य अतिथि विशाल सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि पत्रकारिता में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए, लेकिन अपुष्ट समाचार से पत्रकारिता की विश्वनीयता पर सवाल खड़े होते हैं क्योंकि सोशल मीडिया और एआई के दौर में खबरों की सत्यता जांचना पत्रकारों की बड़ी जिम्मेदारी है। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए भ्रामक सूचनाएं फैलने और एआई के दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए यूरोपीय देशों में विरोध प्रदर्शनों और लूटपाट की घटनाओं का उदाहरण देते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री लोगों को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में पत्रकारों को किसी भी सूचना को आगे बढ़ाने से पहले उसकी सत्यता की जांच करनी चाहिए।
अपनी दक्षता को तकनीक से जोड़ें : डॉ अजय सिंह

विशिष्ट अतिथि आईटी विशेषज्ञ डॉ. अजय सिंह ने इनफॉरमेशन एंड कम्युनिकेशन इंडस्ट्री की आमदनी और लोगों तक इसकी पहुंच के आंकड़े देते हुए इसे बेहद ताकतवर बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में इसकी भूमिका और भी बढ़़ेगी, एआई इसी का एक पार्ट है, पत्रकार जितनी जल्दी और जितना ज्यादा इस तकनीक को सीख लेंगे उतना ही उन्हें तकनीक के साथ ही सही और गलत को पहचानने की क्षमता विकसित करने में मदद मिलेगी। उन्होेंने कहा कि एआई और डिजिटल तकनीक पत्रकारिता के कामकाज को तेजी से बदल रहे हैं। पत्रकारों को तकनीक से अपनी दक्षता जोड़नी होगी।
उन्होंने कहा कि इनफॉरमेशन वार की स्थिति में कोई भी गलत सूचना लोगों के बीच मिनटों में पहुंचायी जा सकती है ऐसे में पत्रकारों की भूमिका बढ़ जाती है वे इसे पहचानें कि यह सूचना गलत तो नहीं, इस पहचान करने की क्षमता को डेवलप करने के लिए पत्रकारों में तकनीकी दक्षता होनी जरूरी है। उन्होंने डेटा विश्लेषण, मेटाडेटा की पड़ताल और फेक न्यूज की पहचान पर जोर देते हुए कहा कि खबर देने की गति से अधिक महत्वपूर्ण उसकी सत्यता है। पत्रकारों को डिटेक्टिव की तरह सूचनाओं के स्रोत और तथ्यों की जांच करने के लिए आईटी की मदद लेनी चाहिए। उन्होंने कृष्ण बिहारी नूर के एक शेर का जिक्र करते हुए कहा कि ‘सच बढ़े या घटे सच न रहे, और झूठ की कोई इंतहा नहीं’। इसलिए पत्रकारों को सच और झूठ पकड़ने की टेक्निक सीखनी ही होगी। उन्होंने तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने में टाटा समूह की ओर से सहयोग का आश्वासन भी दिया।
ज्ञान और विवेक के साथ करें एआई का उपयोग : अंबरीष श्रीवास्तव

आमंत्रित अतिथि अंबरीष श्रीवास्तव ने एआई को इंजन की संज्ञा देते हुए कहा कि इसका इस्तेमाल लाभकारी भी हो सकता है और नुकसानदेह भी। डिजिटल दौर में कंटेंट तैयार करने के साथ उसकी सत्यता परखना भी जरूरी है। पत्रकारों को एआई का उपयोग अपने ज्ञान और विवेक के साथ करना चाहिए। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे कोई भी पत्रकार जब समाचार लिखता है तो उसकी एक शैली होती है, यह शैली अलग-अलग भी होती है, साथ ही इसे किस अंदाज से लिखा जायेगा इसका निर्धारण पत्रकार करता है लेकिन जब एआई एक समाचार तैयार करता है तो वह कई लोगों की न्यूज को एकसाथ मिला देता है, और फिर उसकी समीक्षा कर आपके लिए एक न्यूज तैयार कर देता है, एआई द्वारा एकसाथ मिलायी गयी न्यूज के तथ्य सही-गलत दोनों हो सकते हैं, और जब वह न्यूज आपकी ओर से दी जाती है तो उसकी पूरी जिम्मेदारी भी आपकी ही हो जाती है, ऐसे में उस न्यूज के तथ्यों की सत्यता की पहचान करना हर दृष्टिकोण से जरूरी हो जाता है। यह बात आपकी छवि भी लोगों के बीच तय करती है।
मीडिया पर कॉरपोरेट का प्रभाव : संजय गिरी
टीवी नेटवर्क 10 के संपादक संजय गिरि ने मीडिया पर कॉरपोरेट प्रभाव का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि उद्योगपतियों के बढ़ते प्रभाव से पत्रकारिता की निष्पक्षता और स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। पत्रकारिता की मौजूदा स्थिति पर आत्ममंथन करने और संपादकीय स्वतंत्रता बनाए रखने की जरूरत है। उन्होंने पत्रकार संगठनों से मीडिया की विश्वसनीयता और गरिमा बचाने के लिए आगे आने की अपील की।
अर्थ का अनर्थ न हो, ध्यान रखना होगा : प्रभात रंजन दीन
सूत्रधार प्रभात रंजन दीन ने हिंदी पत्रकारिता में भाषा और वर्तनी की गलतियों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पत्रकारों को शब्दों के सही अर्थ और प्रयोग के प्रति सजग रहना चाहिए। ‘पूंछ’ और ‘पूछ’ जैसे शब्दों के अंतर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि लेखन में छोटी-सी गलती भी अर्थ बदल सकती है। उन्होंने ‘विनम्र श्रद्धांजलि’ जैसे प्रयोग का उदाहरण देकर कहा कि श्रद्धांजलि में विनम्रता तो स्वत: निहित है, इसलिए यहां विनम्र का प्रयोग अनावश्यक है। उन्होंने कहा कि पत्रकारिता में खबरों की तह तक पहुंचने और तथ्यों को सामने लाने की परंपरा कमजोर पड़ रही है। स्कूप और खोजपरक पत्रकारिता को फिर मजबूत करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि एनयूजे उत्तर प्रदेश की ओर से आयोजित यह संगोष्ठी पत्रकारों में पत्रकारीय समझ विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है। इस मौके पर एनयूजे यूपी और लखनऊ इकाई के सभी पदाधिकारियों एवं सदस्यों ने पूरी तन्मयता के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन किया।

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