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महिलाओं में यूट्राइन फायब्रायड का अहम कारण है मन:स्थिति

-जीसीसीएचआर में हुई स्टडी बताती है 54 प्रतिशत केसेज में होम्योपैथी से सफल उपचार

-अंतर्राष्ट्रीय वेबिनार में डॉ गिरीश गुप्ता ने दिया 1157 केसेज का साक्ष्य सहित प्रेजेन्टेशन

सेहत टाइम्स

लखनऊ। गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के संस्थापक वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता ने अमेरिका स्थित कविता होलिस्टिक एप्रोच (केएचए) स्टडी ग्रुप के वेबिनार में महिलाओं में होने वाली यूट्राइन फायब्रायड की बीमारी के 1157 केसेज के उपचार की साक्ष्य आधारित स्टडी प्रस्तुत की। प्रेजेन्टेशन में 1999 में उपचारित किये गये पहले केस की हिस्ट्री के साथ ही सबसे कम समय में ठीक हुआ केस भी दिखाया गया।

भारतीय समय के अनुसार शनिवार रात्रि 8 बजे से आयोजित इस वेबिनार का विषय ‘एवीडेंस बेस्ड क्लीनिकल स्टडी ऑन यूट्राइन फायब्रायड्स’ था। अपने प्रेजेन्टेशन में डॉ गिरीश ने बताया कि मन की स्थिति का असर मस्तिष्क पर, मस्तिष्क से पिट्यूटरी ग्लैंड पर पड़ता है, और फिर वहां से जो हार्मोन्स निकलते हैं वे शरीर के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचते हैं, जहाँ ये पैथोलॉजिकल चेंज पैदा करते हैं। यूट्राइन फायब्रायड यूट्रेस में ट्यूमर बनने की स्थिति है। उन्होंने बताया कि साक्ष्य, तथ्य तथा सत्य आधारित 1157 केसेज की इस स्टडी के परिणामों की बात करें तो 620 केसेज (54 प्रतिशत) में लाभ हुआ, इनमें 289 केसेज में ट्यूमर समाप्त हो गया जबकि 331 के ट्यूमर का आकार कम हुआ, 537 केसेज में लाभ नहीं हुआ।

उन्होंने बताया कि 1157 केसेज में 228 केसेज ऐसे थे जिनमें ट्यूमर का आकार 50 एमएम से ज्यादा था, इन 228 केजेस में सिर्फ 2 केसेज ऐसे थे जिनका ट्यूमर पूरी तरह से गायब हो गया जबकि 102 केसेज में ट्यूमर का आकार कम हो गया, 120 केसेज में लाभ नहीं हुआ। उन्होंने बताया कि यह स्टडी बताती है कि इसके सर्वाधिक 91 प्रतिशत मामले 26-50 वर्ष की आयु वालों में मिले जबकि 25 वर्ष की आयु वाली 59 और 50 वर्ष से ऊपर की आयु वाली 45 महिलाएं इससे ग्रस्त मिलीं। शादीशुदा में यह बीमारी ज्यादा पायी गयी 90 प्रतिशत 1043 शादीशुदा तथा 114 अविवाहित थीं।

डॉ गिरीश ने बताया कि उपचार में ठीक हुए केसेज में सबसे बड़े ट्यूमर का साइज 89×63 एमएम था जो कि डेढ़ वर्ष में गल गयी जबकि सबसे कम समय में गलने वाली 34×32×29 एमएम साइज की गांठ को गलने में 2 माह का समय लगा। उन्होंने बताया कि इन सभी केसेज में होम्योपैथिक के सिद्धांत के अनुसार दवा का चुनाव किया गया, यानी मरीज के सिर्फ रोगग्रस्त ऑर्गन को नहीं बल्कि पूरे मरीज का आकलन किया गया उसकी शारीरिक और मनःस्थिति उसकी पसंद-नापसंद, उसकी प्रकृति, उसके साथ घटी विशेष घटनाओं आदि की विस्तार से हिस्ट्री लेकर दवा का चुनाव किया गया। यह हिस्ट्री बताती है कि यूट्राइन फाइब्रायड भले ही शारीरिक बीमारी है लेकिन इसके कारणों में मन की स्थिति की भूमिका अहम है।

उन्होंने दो मॉडल केसेज भी प्रस्तुत करते हुए उनके बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि कब इलाज शुरू हुआ और उस समय की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट तथा ठीक होने के बाद की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करते हुए मरीजों की केस हिस्ट्री प्रदर्शित की। डॉ गिरीश ने यूट्राइन फायब्रायड के शोध का प्रकाशन जिन जर्नल्स में हुआ, उसे भी स्लाइड में प्रस्तुत किया।

डॉ गुप्ता ने बताया कि यहां मैं यह साफ करना चाहता हूं कि ये 1157 केसेज वे हैं जिनके उपचारित होने के साक्ष्य मौजूद हैं, जबकि दो सौ से ज्यादा ऐसे केस भी हैं, जो उपचार में ठीक तो हुए लेकिन किन्हीं कारणों से उनके ठीक होने के साक्ष्य यानी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट उपलब्ध नही हैं। उन्होंने कहा कि पहला केस जो ठीक हुआ वह 1993 में आया था, लेकिन साक्ष्य के रूप में अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट न होने के कारण मैंने पहला केस 1999 का प्रेजेन्ट किया, जिसके साक्ष्य उपलब्ध हैं। वेबिनार का संचालन डॉ श्वेता सिंह ने किया।