Thursday , December 2 2021

जन्‍म कुंडली की तरह बननी चाहिये चिकित्‍सीय कुंडली, विवाह पूर्व इसे भी मिलायें

एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी में ‘क्लीनिकल रिसर्च और डायग्नोसिस’ विषय पर दो दिवसीय राष्‍ट्रीय सेमिनार शुरू  

लखनऊ। विभिन्‍न बीमारियों के बारे में पहले से ही अनुमान लगाने में  बायोमार्कर टेक्‍नोलॉजी एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभा सकती है, जिससे कि हम लोगों को भविष्य में होने वाली बीमारियों से आगाह करते हुए उन्हें बचा पायेंगे। जिस प्रकार प्राचीन काल से जन्‍म कुंडली बनने की प्रक्रिया चली आ रही है, जिसका प्रयोग भविष्‍य की जानकारी, विवाह के समय मिलान के लिए किया जाता है। ऐसे में मेरी यह सलाह है कि बायोमार्कर टेक्‍नोलॉजी का उपयोग करते हुए अ‍ब व्‍यक्ति की चिकित्‍सीय कुंडली (मेडिकल हॉरोस्‍कोप) बनायी जानी चाहिये, जिससे कि भविष्‍य में होने वाली बीमारियों के प्रति व्‍यक्ति सतर्क रहे साथ ही विवाह के समय वर-वधू दोनों की मेडिकल हॉरोस्‍कोप का भी मिलान किया जाये। क्‍योंकि बहुत सी बीमारियां ऐसी होती हैं जो वैवाहिक जीवन में आने के बाद उभरती हैं और जिनका असर होने वाली संतान पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में सही जीवनसाथी का चुनाव आसान हो जायेगा।

 

यह सलाह किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय (केजीएमयू) के पल्‍मोनरी विभाग के विभागाध्‍यक्ष प्रो सूर्यकांत ने आज यहां एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी एमिटी विश्वविद्यालय लखनऊ द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में मुख्‍य अतिथि के रूप में कही। इस संगोष्‍ठी का विषय ‘क्लीनिकल रिसर्च और डायग्नोसिस’ है। डॉ सूर्यकांत ने कहा कि पहले वैद्य नब्‍ज देखकर रोग की डायग्‍नोसिस करते थे, इसके बाद स्‍टेथोस्‍कोप (आला) आया, फि‍र एक्‍स रे, अल्‍ट्रासाउन्‍ड, सीटी स्‍कैन से जांच होने लगी। उन्होंने कहा कि जिस देश में आज 16 प्रतिशत से ज्यादा स्कूली छात्र एलर्जी और अस्थमा जैसी बीमारियों से लड़ रहे हों, यह आवश्यक हो जाता है कि हम क्लीनिकल रिसर्च और डायग्नोसिस की ओर ध्यान दें।

कैसर, डायबिटीज जैसे रोगों की पूर्व पहचान के लिए भी तैयार करें बायोमार्कर्स

उन्‍होंने कहा कि टीबी के रोग के डायग्‍नोसिस की बात करें तो पहले मरीज के बलगम की जांच करके टीबी का पता लगाया जाता था, इसकी सेंस्टिविटी 50 प्रतिशत थी, यानी हम चार मरीज की जांच में दो मरीज पकड़ में नहीं आ पाते थे, कल्‍चर जांच की अगर बात करें तो इसकी रिपोर्ट छह हफ्ते में आती थी लेकिन अब नयी जांच जीन एक्‍सपर्ट से सिर्फ दो घंटे में टीबी की जांच होना संभव हो गया है। उन्‍होंने कहा कि जीन एक्‍सपर्ट का अविष्‍कार बायोटेक्‍नोलॉजी से ही संभव हो सका। बायोटेक्‍नोलॉजी का अर्थ ही यह है‍ कि जैविक क्षेत्र में टेक्‍नोलॉजी का इस्‍तेमाल करना। उन्होंने छात्रों से आह्वान किया कि जीन एक्‍सपर्ट की तर्ज पर अगर आप लोग ऐसे बायो मार्कर तैयार करें जिससे डायबिटीज, हाइपरटेंशन, हृदय रोग, कैंसर आदि बीमारियों के बारे मे पूर्व से ही ज्ञात हो जाये कि किस उम्र में अमुक बीमारी होने की संभावना है, इससे उस बीमारी से बचने में मदद मिलेगी।

 

उन्‍होंने कहा कि जनसंख्‍या के लिहाज से वर्ष 2035 तक हमारा देश भारत सबसे ज्‍यादा आबादी वाला देश होगा। जब आ‍बादी ज्‍यादा होगी तो बीमारी भी ज्‍यादा होंगी, ऐसे में बायोमार्कर्स की भूमिका बहुत महत्‍वपूर्ण होगी।

 

उन्होंने कहा कि बीमारियों का प्रारम्भिक अवस्था अथवा उनके होने से पहले ही जांच कर पता लगाया जा सकता है। इस दिशा में बायोमार्कर टेक्नोलॉजी अपना विशेष योगदान दे सकती है जिससे कि हम लोगों को भविष्य में होने वाली बीमारियों से आगाह करते हुए उन्हें बचा पायेंगे। उन्होंने कहा कि जैसे हमारे देश में शादी के लिए कुंडली मिलान की प्रथा है उसी प्रकार आज आवश्यकता है कि हम विवाह पूर्व व्यक्ति की चिकित्सकीय कुंडली का मिलान करें या चिकित्सीय कुंडली बनाने की दिशा में प्रयास करें ताकि रोगों के प्रति पहले से सचेत हुआ जा सके।

तीन साल पहले का सुझाव याद रहा एमिटी संस्‍थान को

इससे पूर्व डॉ सूर्यकांत को समारोह में पौधा भेंट किया गया। अपने सम्‍बोधन में इसका जिक्र करते हुए डॉ सूर्यकांत ने कहा कि मुझे खुशी है कि करीब तीन साल पहले जब मैं एमिटी संस्‍थान में वायु प्रदूषण विषय पर आयोजित कार्यक्रम में आया था, उस समय मैंने गुलदस्‍ता की जगह पौधा देने का जो आह्वान किया था, उसे आप लोगों ने इस बार कर दिखाया, यह निश्चित ही सभी के लिए प्रेरणादायक कदम है।

 

संगोष्‍ठी में  विशिष्ट अतिथि प्रमुख सचिव विधानसभा उत्तर प्रदेश प्रदीप कुमार दुबे, निदेशक परियोजना एमिटी विश्वविद्यालय लखनऊ परिसर नरेश चन्द्रा, एमिटी इंस्टीट्यूट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी के विभागाध्यक्ष डॉ जेके श्रीवास्तव और उप निदेशक सूचना एवं जनसम्पर्क एमिटी विवि लखनऊ आशुतोष चौबे भी मौजूद रहे।

 

इस अवसर पर डीन अकादमिक, एमिटी विवि, डॉ राजेश तिवारी ने मुख्य अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। नरेश चन्द्रा ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि बायोटेक्नोलॉजी आज क्लीनिकल रिसर्च और डाग्नोस्टिक के क्षेत्र में गेमचेंजर बन चुका है। बायोटेक्नोलॉजी चिकित्सा विज्ञान को विभिन्न जानलेवा बीमारियों से लड़ने में सक्षम बनाने में महत्वपूर्ण कार्य किया है। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी में निश्चय ही बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में हो रहे नवीनतम अनुसंधानों से छात्र परिचित होंगे।

 

विशिष्ट अतिथि प्रदीप कुमार दुबे ने एमिटी विश्वविद्यालय परिवार को संगोष्ठी के आयोजन पर बधाई देते हुए कहा कि वर्तमान परिदृश्य में जबकि दुनिया कई असाध्य रोगों से लड़ रही है, इस तरह की चर्चाएं निश्चय ही शोधकर्ताओं और छात्रों के लिए उपोयोगी सिद्ध होंगी। उन्होंने कहा कि चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में बायोटेक्टनोलॉजी ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं जिससे रोगों से लड़ने की हमारी क्षमता और दिनप्रतिदिन के जीवन में भी महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। सेमिनार के आयोजन में डॉ रचना चतुर्वेदी, डॉ प्राची श्रीवास्‍तव, गरिमा अवस्‍थी, डॉ ज्‍योति प्रकाश और रुचि यादव का विशेष योगदान रहा।