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कंजक्टिवाइटिस या आई फ्लू हो तो अपने मन से नहीं, डॉक्‍टर की सलाह से ही लें दवा

-आंख से आंख मिलाने से नहीं होता है संक्रमण, आंख छूने से करें परहेज

-संजय गांधी पीजीआई में नेत्र रोग विभाग के चिकित्‍सकों ने दी महत्‍वपूर्ण सलाह


सेहत टाइम्‍स
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई के नेत्र विज्ञान विभाग के चिकित्‍सकों ने लोगों को सलाह दी है कि‍ आजकल फैल रहे कंजंक्टिवाइटिस और आई फ्लू होने पर दवा सिर्फ डॉक्‍टर की सलाह से ही लें, बिना डॉक्‍टर की सलाह के सीधे दुकान से न खरीदें। इसके साथ ही विशेषज्ञों ने बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हुए कहा कि आंखों को छूने से परहेज करें। उन्‍होंने कहा है कि बिना छुए सिर्फ देखने से यह रोग नहीं होता है।

डॉक्‍टरों के अनुसार पिछले कुछ हफ्तों के दौरान उत्तर भारत में भारी बारिश के बीच कंजंक्टिवाइटिस और आई फ्लू के मरीजों की संख्या में अचानक वृद्धि हुई है। ऐसी घटना हर साल घटती है, हालांकि, इस वर्ष असामान्य रूप से लंबे समय तक भारी बारिश के कारण वातावरण में नमी और तापमान में वृद्धि के कारण इसका प्रकोप और बढ़ गया है।

सूजी हुई पलकें, दर्द, पानी आना, चिपचिपाहट

लखनऊ शहर में, निजी और सरकारी दोनों तरह के नेत्र रोग विशेषज्ञों द्वारा कंजंक्टिवाइटिस के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। संजय गांधी पी जी आई के नेत्र विज्ञान विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रचना अग्रवाल ने बताया कि ऑप्थैलोमोलॉजी ओपीडी में हर दिन कंजंक्टिवाइटिस के 10 से 12 मामले आ रहे हैं, जिसमें सुबह सूजी हुई पलकों के साथ आंखों में दर्द, पानी आना, चिपचिपाहट की शिकायत रहती है। अधिकांश मामलों में हल्के लक्षण होते हैं और उपचार करने पर अच्‍छा लाभ होता है।

इस वर्ष हो रहे इस प्रकोप के कारक एजेंट और प्रकोप की सीमा का निर्धारण करने के लिए नेत्र विज्ञान विभाग से डॉ. अंकिता ऐश्वर्या ने कंजंक्टिवाइटिस के रोगियों से कंजंक्टिवल स्वैब एकत्र किए और उन्हें कारक एजेंट की पहचान और प्रकोप की सीमा का निर्धारण करने के लिए माइक्रोबायोलॉजी विभाग की वायरोलॉजी प्रयोगशाला में भेजा।

एंटरो वायरस, एडेनो वायरस और ह्यूमन हर्पीस वायरस पाया जा रहा कारक

डॉ. अतुल गर्ग, एसोसिएट प्रोफेसर, वायरोलॉजी यूनिट, माइक्रोबायोलॉजी विभाग ने वायरल कल्चर और मल्टीप्लेक्स रियल टाइम पीसीआर की जांच की और वायरल कंजंक्टिवाइटिस के सभी सामान्य कारणों को कवर करते हुए एडेनो वायरस, एंटरो वायरस, हर्पीज सिम्प्लेक्स, वैरीसेला ज़ोस्टर, ह्यूमन हर्पीस वायरस- 6 आदि 11 वायरस का परीक्षण किया। डॉ. गर्ग ने बताया कि ज्यादातर मामले एंटरो वायरस के थे, इसके बाद एडेनो वायरस और ह्यूमन हर्पीस वायरस के थे। उन्होंने आगे कहा कि एंटरो वायरस और एडेनो वायरस दुनिया भर में वायरल कंजंक्टिवाइटिस का सबसे आम कारण हैं। सभी पृथक वायरस उपभेदों को संरक्षित किया जाएगा और बाद में, यह पहचानने के लिए विश्लेषण किया जाएगा कि कौन सा सटीक कारक इस वर्ष महामारी का कारण बन रहा था। विभाग द्वारा अपनी जांच जारी रखी जा रही है और किसी भी नए बदलाव की सूचना बाद में दी जाएगी।

सामान्‍यत: दो हफ्ते में हो रहा ठीक

नेत्र विज्ञान विभाग के प्रमुख प्रोफेसर विकास कनौजिया ने बार-बार हाथ धोने की सलाह देते हुए अपने चेहरे और आंखों को छूने से परहेज करने की भी सलाह दी। उन्होंने आगे बताया कि आंखों का वायरल संक्रमण अपने आप सीमित हो जाता है और व्यक्ति एक से दो सप्ताह में ठीक हो सकता है। हालांकि, द्वितीयक जीवाणु संक्रमण के होने की संभावना बहुत कम है, जिससे ठीक होने में देरी होती है। उन्होंने कहा, ”ऐसे मामलों में, एंटीबायोटिक आई ड्रॉप्स के उपयोग की सलाह दी जाती है।” डॉ. रचना और डॉ. विकास दोनों ने अपने मन से लिये आई ड्रॉप्स के अंधाधुंध उपयोग के खिलाफ चेतावनी दी। उन्‍होंने बताया कि यदि लंबे समय तक आँखों में लाली रहती है, तो विशेषज्ञ को अवश्य दिखाये।

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