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क्‍या आप भी ज्‍यादा गर्दन झुकाकर पढ़ते या मोबाइल देखते हैं ?

-स्‍पॉन्डिलाइटिस : जीवन शैली सुधारकर करें ठीक, न हो तो होम्‍योपैथी में है सफल इलाज

डॉ गौरांग गुप्‍ता

सेहत टाइम्‍स

लखनऊ। हमारी बदलती जीवन शैली ने हमें जो बीमारियां दी हैं उनमें एक है स्‍पॉन्डिलाइटिस (गर्दन का दर्द)। जब दर्द की बात आती है तो तुरंत लोग दर्द की गोली खाकर पीड़ा से मुक्ति पाने की ओर चल देते हैं, लेकिन यह राहत तात्‍कालिक होती है, गोली का असर समाप्‍त होते ही दर्द पुन: सिर उठाकर खड़ा हो जाता है। यही नहीं दर्द की गोली के ज्‍यादा सेवन के अपने नुकसान हैं, जो कि किडनी के बड़े रोग के रूप में सामने आते हैं। ऐसे में इससे छुटकारा पाने का सबसे बढ़ि‍या तरीका है अपनी आदतों में सुधार लाना, इसके साथ ही सिर्फ सुधार लाने से मामला नहीं बन रहा है तो इसके लिए बिना किसी साइड इफेक्‍ट वाली बच्‍चों से लेकर बड़ों तक के खाने में आसान होम्‍योपैथिक गोलियों लेकर उपचार एक स्‍थायी तरीका है।

गर्दन दर्द की बेचैन करने की समस्‍या को लेकर ‘सेहत टाइम्‍स’ ने गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) के कंसल्‍टेंट डॉ गौरांग गुप्‍ता से बात की। डॉ गौरांग ने स्‍पॉन्डिलाइटिस से बचाव के साथ ही इसके लक्षणों से लेकर उपचार तक के बारे में विस्‍तार से बताया।

कारण

डॉ गौरांग ने बताया कि स्‍पॉन्डिलाइटिस के कारणों की अगर बात करें तो 90 प्रतिशत लोगों में गर्दन दर्द खराब जीवन शैली के कारण होता है, जबकि 10 फीसदी लोगों में यह दिक्‍कत किसी दुर्घटना में चोट लगने या बोन टीबी जैसी बीमारियों के कारण हो सकती है। खराब जीवन शैली में जो चीजें शामिल हैं उनमें लम्‍बे समय तक लगातार कुर्सी पर बैठकर कार्य करना, मोबाइल फोन का इस्‍तेमाल करते समय गर्दन बहुत ज्‍यादा झुकाना, गलत पोजीशन में लेटकर मोबाइल फोन का इस्‍तेमाल करना, कम्‍प्‍यूटर पर लगातार घंटों तक कार्य करने से अकड़न होने लगती है। डॉ गौरांग बताते हैं कि पुराने समय में यह दिक्‍कत करीब 50 वर्ष की आयु के बाद आती थी लेकिन अब जीवन शैली खासतौर से मोबाइल का अत्‍यधिक और गलत ढंग से प्रयोग करने से किशोरों में भी यह समस्‍या पायी जाने लगी है।

लक्षण

डॉ गौरांग ने कहा कि गर्दन में दर्द, अकड़न, चक्‍कर आना, बैठकर या लेटकर उठने में चक्‍कर आना, हाथों में झनझनहाट महसूस होना, चींटी के रेंगने जैसा महसूस होना जैसे लक्षण महसूस हों तो यह स्‍पॉन्डिलाइटिस हो सकती है।

जांच

डॉ गौरांग ने कहा कि ज्‍यादातर केसेज में जांच की आवश्‍यकता नहीं होती है क्‍योंकि देखा गया है कि लोग एक्‍सरे जांच कराते हैं जिसमें कुछ निकलता नहीं है, क्‍योंकि यह मांसपेशियों की अकड़न की दिक्‍कत होती है। यदि झनझनाहट या सुन्‍नपन होता है तो इसका अर्थ है कि ये लक्षण नस पर दबाव पड़ने के हैं, ऐसी स्थिति में ही इसमें एमआरआई जांच की जरूरत होती है।  

उपचार

उपचार को लेकर डॉ गौरांग ने बताया कि अनेक केस में सिर्फ जीवनशैली में सुधार ले आयें तो दवा लेने की जरूरत नहीं पड़ती है। जीवनशैली में सुधार के बारे में बताते हुए उन्‍होंने कहा कि नियमित 10-15 मिनट व्‍यायाम करें, इसमें गर्दन का व्‍यायाम भी शामिल हो। लम्‍बे समय तक बैठकर करने वाले कार्यों के दौरान ऐसे बैठें जिससे रीढ़ की हड्डी सीधी रहे। आधा-एक घंटे बाद कुर्सी से उठकर थोड़ा टहल लें। बहुत ज्‍यादा गर्दन झुकाकर मोबाइल फोन का इस्‍तेमाल न करें। डॉ गौरांग ने बताया कि हाल ही में उनकी क्‍लीनिक में एक 16 वर्षीय किशोरी गर्दन में दर्द की शिकायत लेकर आयी, इस मरीज की गर्दन के दर्द का कारणों के पीछे सिर झुकाकर, लेटकर मोबाइल फोन का प्रयोग, ज्‍यादा सिर झुकाकर पढ़ाई जैसी आदतें सामने आयीं। डॉ गौरांग ने कहा कि ऐसे केस में हम लोगों ने मरीज को दवा न देकर फीस वापस करते हुए कहा कि पहले वह सिर्फ आदतों में बदलाव लाकर देख लें, दिक्‍कत दूर हो जायेगी, यदि ठीक न हो तो आयें तब दवा देना उचित रहेगा।  

डॉ गौरांग ने बताया कि इस तरह जीवन शैली में सुधार लाने के बाद यदि समस्‍या से छुटकारा मिल जाये तो किसी दवा की आवश्‍यकता नहीं है लेकिन जीवनशैली में सुधार लाने के बाद भी अगर राहत नहीं मिल रही है तो इसका होम्‍योपैथी में बहुत सफल इलाज है, क्‍योंकि होम्‍योपैथी में दर्द को दबाने की कोई दवा नहीं होती है इसलिए यह पूरी तरह से सुरक्षित है और इसका पेट, लिवर, किडनी पर कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ता है। 

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