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1990 के अयोध्या कांड से व्यथित होकर डॉ गिरीश गुप्ता ने 1991 में घर पर ही कर ली थी राम दरबार की स्थापना

-मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा से लेकर सीताजी के कन्यादान तक पूरे विधिविधान से एक सप्ताह चला था अनुष्ठान

-अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम को लेकर हर्षोल्लास से भरे डॉ गिरीश गुप्ता ने साझा कीं 33 वर्ष पुरानी यादें


सेहत टाइम्स
लखनऊ।
जैसे-जैसे अयोध्या में राम जन्म भूमि पर बने मंदिर में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा का महान दिन नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे भक्तों की प्रसन्नता भी बढ़ती जा रही है, वातावरण राममय हो चुका है। यूं तो अयोध्या में जन्म भूमि पर राम मंदिर का मसला सदियों पुराना है लेकिन पिछले लगभग साढ़े तीन दशकों से इसमें गर्मी आ गयी थी। राम मंदिर आंदोलन के दौरान 90 के दशक में जब अयोध्‍या में सरयू का जल रक्‍त से लाल हुआ, अयोध्‍या की गलियों में गोलियों की तड़तड़ाहट, लाठियां, सुरक्षा बलों की बूटों की आवाजें, राम का नाम लेने पर रोक, कुल मिलाकर राम भक्‍तों ने जिस पीड़ा का अनुभव किया था, राम भक्‍तों की श्रीराम जन्‍मभूमि पर मंदिर बनने की अभिलाषा जो तब पूरी नहीं हो सकी थी, अब साकार हो चुकी है। मौजूदा पीढ़ी के बहुत से ऐसे भक्त हैं जिन्होंने इन साढ़े तीन दशकों में राम मंदिर के संघर्ष की गाथा को देखा है।

ऐसे ही भक्तों में एक हैं वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के संस्‍थापक डॉ गिरीश गुप्ता। वे 1990 में राम भक्तों पर गोलियां चलने से लेकर दूसरे अत्याचारों के सारे प्रकरणों से अत्‍यंत व्‍यथित थे, और अयोध्‍या में श्रीराम के मंदिर बनने का विश्‍वास मन में लिए 1991 में अपने घर में ही पूरे विधिविधान के साथ मूर्तियों की प्राणप्रतिष्‍ठा करते हुए राम दरबार की स्‍थापना की थी।

डॉ गिरीश गुप्‍ता बताते हैं कि मुझे जो खुशी हो रही है, उसे व्‍यक्‍त करने के लिए मेरे पास शब्‍द नहीं हैं। उन्‍होंने बताया कि राम मंदिर आंदोलन के बाद से राम मंदिर को लेकर मन में बहुत बेचैनी थी, 15 अगस्‍त, 1991 को जानकीपुरम में मेरे घर का गृहप्रवेश हुआ, इसके बाद मेरे और मेरी पत्‍नी सीमा गुप्‍ता के मन में आया अयोध्‍या में मंदिर बनने में अभी अड़चनें हैं इसलिए क्‍यों न हम प्रतीकात्मक रूप से अभी मंदिर की स्‍थापना अपने घर पर ही कर लें। इसके बाद हम दोनों जयपुर पहुंचे वहां से अति सुंदर साढ़े तीन फीट की मूर्तियां लाये। इसके बाद घर पर अक्टूबर माह में एक सप्‍ताह का स्‍थापना कार्यक्रम चला, जिसमें पूरे विधिविधान से मूर्तियों की प्राण प्रतिष्‍ठा की गयी। इसके बाद भगवान राम की बारात निकली, हमारे रिश्‍तेदार आदि सभी आये, सीता जी का पैरपूजन हुआ उनका कन्‍यादान उसी तरह किया गया जैसे कि लड़की का कन्‍यादान किया जाता है।

डॉ गिरीश गुप्‍ता ने बताया कि इसके बाद तो स्‍थापित राम दरबार की पूजापाठ नियमित रूप से सुबह-शाम पूजा, आरती, भोग मैं और पत्‍नी मिलकर करते रहे। कुछ वर्षों बाद कुछ लोगों ने मुझे राय दी कि घर पर प्राण प्रतिष्‍ठा की हुई मूर्तियों की विधिवत पूजा हमेशा ही करनी होती है, तो आगे चलकर अगर बच्‍चे लोग इस सेवा को न निभा पाये तो यह ईश्वर का अपमान होगा, इसलिए बेहतर होगा कि इन्‍हें किसी मंदिर में स्थापित करा दें, जहां इनकी रोज पूजा होती रहे। उन्‍होंने बताया कि इसके बाद अलीगंज स्थित पुराने हनुमान मंदिर के पुजारी गोपाल दास जी से बात हुई तो पहले उन्‍होंने इसे अयोध्‍या में उनके द्वारा बनवाये जा रहे मंदिर में स्‍थापना की सलाह दी, लेकिन लगभग 22 साल से राम दरबार की सेवा करती आ रहीं पत्‍नी का मन विचलित होने लगा कि इतनी दूर हम लोग जल्‍दी-जल्‍दी कैसे पहुंच कर दर्शन कर पायेंगे।

डॉ गुप्‍ता ने बताया कि इसके बाद पुजारी जी ने यहीं चांदगंज गार्डन में बने प्राचीन हनुमान मंदिर में राम दरबार को स्‍थापित करने का सुझाव दिया। मई 2013 में गाजे-बाजे के साथ राम बारात निकली और इस मंदिर में रामदरबार की विधिविधान से स्‍थापना कर दी गयी। धूमधाम से आयोजित इस समारोह में वर्तमान के विधायक डॉ नीरज बोरा, तत्‍कालीन मुख्‍य सचिव, कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, अलीगंज थाने के सभी लोग कुल मिलाकर लगभग 500 भक्‍त सम्मिलित हुए थे, तब से अनवरत पूजा-अर्चना हो रही है, तथा प्रत्येक मंगलवार को यहां सुंदरकांड का पाठ होता है। प्रत्‍येक मंगलवार को पत्‍नी इस मंदिर में जाती हैं और सुंदर कांड पाठ में सम्मिलित होती हैं। इस मौके पर बड़ी संख्या में भक्त जुटते हैं।