सप्ताह में तीन दिन चलने वाली पेन क्लीनिक में आ रहे सैकड़ों मरीज
लखनऊ। दर्द का नाम सुनते ही दर्द का अहसास होने लगता है, क्योंकि किसी न किसी प्रकार का दर्द हर किसी को कभी न कभी जरूर हुआ होता है। हम यहां बात कर रहे हैं शारीरिक दर्द की। सवाल यह है कि छोटा-मोटा दर्द जो हुआ और खत्म हो गया, उसकी बात जानें दें लेकिन अगर कोई दर्द लम्बे समय तक आपको परेशान कर रहा है तो उसका इलाज तो होना चाहिये। दर्द की गोली खाकर दर्द को दूर किया जाये भी तो कब तक क्योंकि दर्द की दवाओं के लम्बे समय तक सेवन के अलग नुकसान हैं। इन सभी परेशानियों का हल निकालते हुए इसे इस दर्द को दूर करने में किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्व विद्यालय (केजीएमयू) का एनेस्थीसिया विभाग लगा हुआ है। विभाग की डॉ सरिता सिंह मरीजों को इस दर्द का अहसास न होने देने के लिए पेन क्लीनिक चला रही हैं।
इस बारे में डॉ सरिता सिंह से ‘सेहत टाइम्स’ ने विशेष बात की। उन्होंने बताया कि विभागाध्यक्ष डॉ अनिता मलिक के सहयोग से केजीएमयू के एनेस्थीसिया विभाग में यह क्लीनिक सप्ताह में तीन दिन सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को चलती है, तथा इसकी लोकप्रियता दिन पर दिन बढ़ रही है। इस क्लीनिक में कैंसर के दर्द वाले मरीज ज्यादा आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यूं तो शरीर का हर दर्द बहुत परेशान करता है लेकिन कैंसर का दर्द इसके मरीज के साथ ही उसके तीमारदार को भी बहुत विचलित करता है उसकी वजह यह है कि इस बीमारी का नाम सुनते ही व्यक्ति के अंदर एक दर्द, चिंता, परेशानी का अहसास होता है, जो कि शारीरिक दर्द के साथ जुड़ जाता है।
डॉ अजय चौधरी के साथ मिलकर क्लीनिक चला रहीं डॉ सरिता सिंह ने बताया कि इस पेन क्लीनिक में मरीज के शरीर में होने वाले दर्द को दिमाग को अहसास कराने वाली नस के जरिये उपचार विशेष तकनीकियों द्वारा ऑपरेशन थियेटर में किया जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि मान लीजिये किसी को पेट का कैंसर है तो हम लोग उस ग्रंथि को ही सुन्न कर देते हैं जो मस्तिष्क को दर्द का अहसास कराती है। इसी तरह ऑर्थराइटिस का दर्द, कमर का दर्द जो लम्बे समय से चल रहा है, उनको भी विशेष तकनीकियों द्वारा दूर किया जा रहा है, ऐसे मरीजों में शरीर के अंदर ही इंटरवेंशन करके उन्हें दर्द से निजात दिलायी जाती है, उन्होंने बताया कि यदि दर्द की पुनरावृत्ति होती है तो यह प्रक्रिया दोबारा दी जाती है।


डॉ सरिता ने बताया कि इसी प्रकार एक बीमारी होती है ट्राईजेमिनल न्यूरलजिया। यह नसों की बीमारी है। यह बीमारी तंत्रिका विकार के कारण उत्पन्न होती है। ट्राईजेमिनल न्यूरलजिया नर्व डिसआर्डर से संबंधित रोग है। ट्राईजेमिनल न्यूरलजिया का सबसे ज्यादा प्रभाव सिर, जबड़ों और गालों पर होता है। उन्होंने बताया कि यह बीमारी कम आयु वालों की अपेक्षा उम्रदराज लोगों को ज्यादा होती है। उन्होंने बताया कि दर्द का यह आलम होता है हवा का तेज झोंका, अचानक किसी के छू जाने भर से चेहरे के उस हिस्से में जबरदस्त दर्द होने लगता है। डॉ सरिता बताती है कि आधुनिक तकनीक से इस बीमारी ट्राईजेमिनल न्यूरलजिया का इलाज भी उनके द्वारा किया जा रहा है।
