-वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो एके त्रिपाठी के साथ ‘सेहत टाइम्स’ की विशेष शृंखला
-रक्त और उसके अवयव भाग – 7

सेहत टाइम्स
लखनऊ। रक्त (blood), अस्थि मज्जा (bone marrow), और लसीका प्रणाली (lymphatic system) से संबंधित बीमारियों के उपचार की विशिष्टता रखने वाले किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू), डॉ राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान (आरएमएलआई) और संजय गांधी स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान संस्थान (एसजीपीजीआई) में महत्वपूर्ण पदों पर सेवारत रह चुके राजधानी लखनऊ के वरिष्ठ हेमेटोलॉजिस्ट प्रो ए.के.त्रिपाठी द्वारा स्वस्थ बने रहने के लिए ध्यान रखने योग्य बातों की जानकारी कारण सहित आसान शब्दों में देने के लिए ‘सेहत टाइम्स’ द्वारा शृंखला चलायी जा रही है। ये जानकारियां जहां किसी भी व्यक्ति को स्वस्थ रहने के गुणों को बारीकी से समझाने में सहायक है, वहीं स्नातक स्तर की पढ़ाई करने वाले मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है, चूंकि प्रो त्रिपाठी चिकित्सा के आचार्य यानी प्रोफेसर भी हैं, ऐसे में मेडिकल स्टूडेंट्स के लिए उपयोगी जानकारियों के बारे में उन्हें लम्बा अनुभव है। उनके पढ़ाये हुए जॉर्जियंस आज देश-विदेश के अपना नाम कमा रहे हैं।
अब तक आपने पढ़ा…
भाग 1 में …‘हृदय और गुर्दा रोगियों के लिए खतरनाक हो सकता है एनीमिया’,….क्लिक करें
भाग 2 में …‘झुंझलाहट, गुस्सा, बेचैनी की वजह हो सकती है खून में आयरन की कमी’,…..क्लिक करें
भाग 3 में ‘सही तरीके’ और ‘सही समय’ से लेने पर ही लाभ देती हैं आयरन की गोलियां …..क्लिक करें
भाग 4 में…‘अगर आप दूध, दही अथवा मांस, मछली, अण्डा नहीं ले रहे हैं, तो गलत कर रहे हैं…क्लिक करें
भाग 5 में …ब्लड यूरिया का बढ़ा हुआ स्तर बन सकता है एनीमिया का कारण भी…क्लिक करें
भाग 6 में सावधान, ऐसा न हो कि दवा ‘दर्द’ बन जाये
अब प्रस्तुत है भाग 7, इस एपीसोड में एप्लास्टिक एनीमिया रोग के बारे में विस्तार से जानकारी दी गयी है।
बोनमैरो को रासायनिक और विषैले पदार्थों से बचाना जरूरी
प्रो एके त्रिपाठी ने कहा कि एप्लास्टिक एनीमिया एक खतरनाक रोग है क्योंकि जहां एप्लास्टिक एनीमिया का इलाज काफी महंगा है वहीं शत-प्रतिशत मरीज ठीक भी नहीं होते। इसके अतिरिक्त कोई एक और निश्चित कारण न होने से एप्लास्टिक एनीमिया रोग से बचने के लिए एक निर्धारित मानदंड भी स्थापित नहीं हो सका है। इस बारे में विस्तार से बताते हुए प्रो त्रिपाठी ने बताया कि अस्थिमज्जा (Bone Marrow) जहाँ पर रक्त कोशिकाओं की उत्पत्ति होती है, एक बहुत संवेदनशील अंग है। इसलिए इस पर तरह-तरह के रासायनिक और विषैले पदार्थों का प्रभाव जल्दी पड़ सकता है। अस्थिमज्जा कभी-कभी वायरल बुखार या इन्फेक्शन के बाद भी प्रभावित हो जाता है।
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उन्होंने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया रोग एनीमिया होने का महत्वपूर्ण कारक है। एप्लास्टिक एनीमिया में अस्थिमज्जा के अन्दर रक्त कणिकाओं को उत्पन्न करने वाली कोशिकाओं (स्टेमसेल) में कमी हो जाती है। ऐसे मरीजों में एनीमिया (हीमोग्लोबिन की कमी) होने के साथ-साथ श्वेत रक्त कोशिकाओं और प्लेटलेट्स की संख्या में भी कमी हो जाती है। श्वेत रक्त कोशिकाओं की कमी होने से मरीज को विभिन्न प्रकार के संक्रमण (इन्फेक्शन) हो सकते हैं और लम्बे समय तक बुखार रह सकता है। साथ ही प्लेटलेट्स की संख्या में अत्यधिक कमी होने से त्वचा पर खून के धब्बे या नाक से रक्तस्राव हो सकता है।
प्रो त्रिपाठी बताते हैं कि यदि किसी व्यक्ति में लम्बे समय से संक्रमण, बुखार, प्लेटलेट्स की कमी, त्वचा पर खून के धब्बे या नाक से रक्तस्राव के लक्षण हों तो रक्त और अस्थिमज्जा की जाँच अवश्य करानी चाहिए जिससे एप्लास्टिक एनीमिया की डाइग्नोसिस हो सके।
प्रो त्रिपाठी ने बताया कि एप्लास्टिक एनीमिया से बचाव भी पूरी तरह सम्भव नहीं है, क्योंकि इसका कोई निश्चित और एक कारण नहीं है। अधिकांश मरीज़ों में कारण का पता भी नहीं चल पाता है। इस पर काबू पाने के तरीके के बारे में प्रो त्रिपाठी कहते हैं कि पेड़-पौधों पर और खेतों में, भोज्य पदार्थों में, अनाजों, फलों में रासायनिक और विषैले पदार्थों के प्रयोग के बढ़ते प्रचलन पर यदि रोक लग सके और जैव रसायन के प्रयोग को बढ़ावा मिले तो सम्भवतः एप्लास्टिक एनीमिया की समस्या पर काबू पाया जा सकता है। इसके साथ ही हमें बिना डॉक्टर की सलाह के या अनावश्यक रूप से दवाओं के सेवन से बचना चाहिए, क्योंकि कुछ दर्द निवारक गोलियां, एन्टीबायोटिक तथा दवाओं के रूप में प्रयोग की जाने वाली भस्मों से भी एप्लास्टिक एनीमिया हो सकता है।
प्रो त्रिपाठी ने बताया कि सही जानकारी और गणना न होने के कारण यह बताना मुश्किल है कि हमारे देश में प्रतिवर्ष कितने रोगी एप्लास्टिक एनीमिया से ग्रसित होते हैं। उन्होंने बताया कि लेकिन देखा जा रहा है कि ऐसे मरीजों की संख्या निश्चित तौर पर बढ़ रही है हालांकि इसका कारण स्पष्ट नहीं है। सम्भवतः वातावरण एवं भोज्य पदार्थों में बढ़ रहे रासायनिक प्रदूषण से या दवाओं के कुप्रभाव से ऐसा हो रहा है।

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