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भारत में हर साल 11 फीसदी मौतों का कारण फेफड़े की बीमारियां

डॉ. बीपी सिंह

लखनऊ। भारत में होने वाली मौतों में 11 फीसदी मौतें रेस्पीरेटरी कारणों से होती हैं। फेफड़े से संबधित बीमारियों से दुनिया में होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा मौतें भारत में होती हैं। इस समस्या का कारण वातावरण में बढ़ता प्रदूषण है। प्रदूषण से सीओपीडी, लो रेस्पीरेटरी टाइप, कैंसर, लंग्स कैंसर आदि बीमारियां बढ़ रही हैं। इन बीमारियों के इलाज के साथ ही इनके दुष्प्रभाव से बचाव के लिए प्रदूषण नियंत्रण करने के उपायों को अपनाना जरूरी है।

लेप्रोस्कोपिक अल्ट्रासाउंड से गांठ व संक्रमण की जांच संभव

यह जानकारी रविवार को ताज होटल में मिडलैंड हेल्थकेयर व सूर्या चेस्ट फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 9वीं रेस्पीरेटरी, क्रिटिकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन अपडेट 2017 में डॉ.बीपी सिंह ने दी।  मिडलैंड हेल्थकेयर एंड रिसर्च सेंटर के डॉ.बीपी सिंह ने बताया कि रेस्पीरेटरी बीमारियों की पहचान के लिए लंग अल्ट्रासाउंउ व लेप्रोस्कोपिक अल्ट्रासाउण्ड तकनीक बेहतर है।  दूरबीन में अल्ट्रासाण्उड करने से लंग्स की गांठ व संक्रमण की जांच हो जाती है और इलाज आसान हो जाता है। उन्होंने बताया कि निमोनिया से मृत्यु  और अस्पताल में भर्ती न होना प्रमुख कारण है। करीब 60 हजार वयस्क लोगों की मौत हर साल निमोनिया से होती है।

सीयूआरबी-65 फॉर्मूला में तीन फैक्टर मिलें तो आईसीयू जरूरी

डॉ.बीपी सिंह ने बताया कि आईसीयू में मौतों का मुख्य कारण संक्रमण होता है। अस्पतालों के आईसीयू में अधिकांशतया सेप्सिस से भर्ती होते हैं, भर्ती होने वालों में 43-46 फीसदी लोग मर जाते हैं। उन्होंने निमोनिया के इलाज में उम्र व लक्षण का फॉर्मूला दिया, उन्होंने कहा कि निमोनिया पीडि़तों का इलाज, सीयूआबी-65 फॉर्मूला के अनुसार होता है। फॉर्मूला में उन्होंने बताया कि सी मतलब कन्फ्यूजन, बीमारी के लक्षण को लेकर मरीज कन्फ्यूज रहते हैं, उन्हें पता ही नहीं होता है कि बीमारी के लक्षण हैं नजरअंदाज करते हैं और बीमारी बढ़ा लेते हैं। शुरुआत में आ जायें तो कुछ दिन के इलाज से ठीक हो जायेंगे। यू का मतलब, पेशाब में यूरिया की मात्रा, अगर 40 यूनिट के ऊपर है तो तत्काल इलाज लें, आर यानि रेसपीरेटरी(श्वास) रेट प्रति मिनट 30 के ऊपर है तो खतरे की घंटी है, इसके अलावा बी से बीपी मापना, बीपी में ऊपर वाला लेवल 90 के नीचे आ जाये तो खतरा, और अंत में मरीज की उम्र 65 से अधिक है तो समस्या की गंभीरता और इलाज दोनों जटिल हो जाता है सावधानी पूर्वक इलाज करना चािहये। उन्होंने बताया कि सीयूआरबी-65 में फॉर्मूलें में इन पांचों में अगर एक फैक्टर है तो एक से दो फीसदी मौत का खतरा होता है हलांकि इन मरीजों का इलाज घर पर ही संभव है। अगर दो फैक्टर मिलते हैं तो मरीज को अस्पताल में भर्ती कर इलाज किया जाता है, इसके अलावा अगर तीन से पंाच फैक्टर मिलते हैं तो मरीज को आइसीयू में होना चाहिये। इसके अलावा 65 की उम्र के बाद मरीज में दिक्कतें स्वत: बढ़ जाती हैं।

गर्भावस्था में लेनी पड़ती है इनहेलर

मिडलैंड की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.सारिका अग्रवाल ने बताया कि गर्भावस्था के दौरान पेट में शिशु के विकास के साथ ही, पेट में जगह कम हो जाती है, लंग्स ऊपर खिसक जाता है। श्वास लेने में जटिलताएं आ जाती हैं, अगर महिला में अस्थमा या सीओपीडी आदि की पारिवारिक हिस्ट्री है तो बीमारी तेजी से ऊभरती है। उन्होंने बताया कि 10 से 12 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को प्रसव के एक या दो माह पूर्व इनहेलर देना पड़ता है। अगर शुरूआत से ब्रांको अस्थमा को कंट्रोल न किया गया तो प्रसव के दौरान प्रसूताओं को आईसीयू में जाना पड़ सकता है।
 
नींद की कमी से डायबिटिज व हृदय रोग की संभावना

आर्टमिस हास्पिटल गुडग़ांव के डॉ. हिमाशु गर्ग ने बताया कि अगर आप अनिद्रा की समस्या से पीडि़त है और सही इलाज नहीं ले रहे हैं तो आप को डायबिटिज व हृदय रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। उन्होंने बताया कि स्लीप एपनिया (खर्राटे)का दूसरा कारण होता है नींद के दौरान दिमाग में आक्सीजन की आपूर्ति बाधित होना। उन्होंने बताया कि खर्राटे के दौरान  कई बार श्वास, कुछ सेकेंड या मिनट के लिए रुक जाती है, बार-बार श्वास रुकने से दिमाग को निरंतर ऑक्सीजन की नही मिलती है और नींद बार-बार टूट जाती है। बार-बार नींद से उठ जाने की वजह से पाचनतंत्र बिगड़ जाता है और व्यक्ति में डायबिटिज व हार्ट प्रॉब्लम होने की संभावना बढ़ जाती है। वास्तव में मेटाबोलिक सिंड्रोम बढ़ जाता है। इसे भी डायबिटिज व हाइपरटेंशन जैसी बीमारी माना जाना चाहिये।

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