केजीएमयू पहुंचकर डॉक्‍टरों को भी जीने की कला सिखायी स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद ने

बताये टिप्‍स कहा कि ऐसा करेंगे तो निश्चित ही आमूलचूल परिवर्तन आयेगा जीवन में

लखनऊ। बड़े-बड़े रोगों को ठीक करने वाले चिकित्‍सकों को तैयार करने वाले किंग जॉर्ज चिकित्‍सा विश्‍व विद्यालय के शिक्षकों-चिकित्‍सकों को बुधवार को खुशहाल जीवन जीने का फंडा समझाया सीवानंद आश्रम, ऋषिकेश व अहमदाबाद के स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद महाराज ने। उन्‍होंने कहा कि मनुष्‍य को अपने अंदर से अहम को बिल्‍कुल खत्‍म कर देना चाहिये क्‍योंकि अहम मनुष्‍य का सबसे बड़ा दुश्‍मन है। अहम नहीं रहेगा तो न तो आपको गुस्‍सा आयेगा, न किसी से आपका किसी से झगड़ा होगा न ही आपको किसी पद की, न पद्म पुरस्‍कार की लालसा रहेगी। आप अपनी आत्‍मा को पहचानिये, आप यहां क्यों आये हैं, दुनिया से कोई कुछ अपने साथ लेकर नहीं गया है, आप सोचिये कि आपका जन्‍म क्‍यों हुआ है, इस चीज को पहचानिये।

 

स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद ने यहां केजीएमयू के ब्राउन हॉल में ‘यू आर सॉल्‍यूशन टू योर प्रॉब्‍लम’ “YOU ARE SOLUTION TO YOUR PROBLEM”  विषय पर व्‍याख्‍यान में ये बातें कहीं। उन्‍होंने कहा कि मनुष्य की समस्या का समाधान उसके ही भीतर स्वयं निहित है और उसे अपनी इन समस्याओं के समाधान के लिए किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता नहीं है।

अपनी पहचान भारतीयता की रखिये

उन्‍होंने कहा कि आप किसी भी धर्म के हों, किसी भी ईश्‍वर को मानते हों, ईश्‍वर को मानते हों, अल्‍लाह को मानते हों, आप किसी भी जाति, धर्म से हों यानी अगर आप कहते हैं कि आप फलां धर्म के हैं, फलां जाति के हैं और फलां राज्‍य के निवासी हैं तो आप गलत करते हैं आप अपने आपको सिर्फ भारतीय मानिये, अपनी राष्‍ट्रीयता को पहचानिये, अपनी भारतीयता को पहचानिये, अपनी संस्‍कृति को पहचानिये। स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद महाराज ने स्‍वयं बताया कि मैं नमाज भी पढ़ता हूं और रोजा भी रखता हूं।

बच्‍चों से बात मातृभाषा में ही करें

स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद ने एक और खास बात यह कही कि आप कितनी भी भाषा जानते हों, किसी भी भाषा में बोलते हों, लेकिन अपनी मातृभाषा को कभी न छोड़ें, बच्‍चों से अपनी मातृभाषा में ही बात कीजिये जिससे उनके अंदर संस्‍कार पैदा हों। आपको बता दें कि आजकल बहुत से लोग घर में भी अपने बच्‍चों से अंग्रेजी में बात करते हैं जैसे नो बेटा, डोन्‍ट डू दिस, कम हियर, ऐसा न करें इससे बच्‍चों के साथ दूरी बढ़ती है।

परिवार के लोग एक बार जरूर साथ बैठें

उन्‍होंने कहा कि जिस प्रकार कम्‍पनियों में कर्मचारियों के साथ मीटिंग एक निश्चित समय पर होती रहती हैं, उसी प्रकार से घर में भी परिवार का हर सदस्‍य 24 घंटे में एक बार चाहें नाश्‍ते पर, भोजन के समय या फि‍र ऐसे ही साथ जरूर गुजारें और एक-दूसरे से बात अवश्‍य करें, इससे कोई समस्‍या जन्‍म नहीं ले पाती है, और यदि होती है तो उसका समाधान हो जाता है, क्‍योंकि संवादहीनता से ही दूरियां बढ़ती हैं।

एक और खास बात उन्‍होंने कही कि 24 घंटे में अपने लिये थोड़ा-थोड़ा समय जरूर निकालिये, चाहें 10-5 मिनट का ही निकाले, मतलब 10 मिनट सुबह, 10 मिनट दोपहर, 10 मिनट शाम को। इस समय में ध्‍यान करें या कुछ नहीं है तो सिर्फ और सिर्फ ओमकार उच्‍चारण करें, यह करके देखिये आपको जीवन में आमूलचूल परिवर्तन आयेगा।

 

शाकाहार मनुष्‍य का प्राकृतिक भोजन    

इसके साथ ही उन्होंने सभागार में उपस्थित सभी लोगों से शाकाहार अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि यही मनुष्य का प्राकृतिक भोजन है। उन्होंने कहा कि जंक फूड एवं मांसाहार मनुष्य के स्वास्थ्य एवं उसके विचार को दूषित करता है अतः इसका त्याग ही उचित है।

100 से ज्‍यादा बार कर चुके हैं रक्‍तदान

आपको बता दें कि 21 भाषाओं के ज्ञाता स्‍वामी अध्‍यात्‍मानंद सौ से ज्‍यादा बार अपना रक्‍त दान कर चुके हैं, इस समय वह 74 वर्ष के हैं तो 70 साल के बाद से उनका रक्‍त लेने से डॉक्‍टर ने इनकार किया है। इसलिए अब वे रक्‍तदान शिविर आयोजित करते हैं। उन्‍होंने बताया कि अब तक 250 से ज्‍यादा रक्‍तदान शिविर का आयोजन उन्‍होंने किया है जिसमें 35000 से ज्‍यादा लोगों ने ब्‍लड दान किया गया है।

 

इस मौके पर चिकित्सा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो एमएलबी भट्ट, ट्रॉमा सर्जरी के विभागाध्यक्ष डॉ संदीप तिवारी, प्रो एके सक्सेना समेत अन्य संकाय सदस्य एवं चिकित्सक उपस्थित रहे।