अब नहीं तो आखिर कब…क्‍योंकि जान है हमारी, ये नहीं है सरकारी…

-कोरोना को लेकर तेजी से खराब हो रहे मौजूदा हालातों पर सेहत टाइम्‍स का दृष्टिकोण

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धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

बीते दो दिनों से लखनऊ ने एक ऐसी दर्दनाक तस्‍वीर देखी है जिसे देखने वाले तो अंदर ही अंदर हिल गये, साथ ही जिसने सुना और उन तस्‍वीरों को देखा वे भी विचलित हो गये।

दर्द और चिंता भरा दृश्‍य एक- दरअसल गोमती नदी के किनारे बने श्‍मशान घाट बैकुंठ धाम पर कोरोना से हुई मौत के बाद शव के अंतिम संस्‍कार के लिए आयी गाडि़यों की कतारें, उसके अंदर रखे शवों को लेकर आये लोग टोकन लेकर प्रतीक्षा कर रहे थे कि उनके शव के अंतिम संस्‍कार का नम्‍बर कब आयेगा। 

दर्द और चिंता भरा दृश्‍य दो – एक बड़े अस्‍पताल के सर्जन के पिता को कोरोना होने के बाद शहर के किसी अस्‍पताल में समय पर इलाज नहीं मिल सका, और वे परलोक सिधार गये…

दर्द और चिंता भरा दृश्‍य तीन- केजीएमयू जैसे विश्‍वस्‍तरीय शिक्षण व चिकित्‍सा संस्‍थान जहां मरीज ठीक होने की आस लेकर आता है, उस मरीज की चिकित्‍सा करने वाले चिकित्‍सक स्‍वयं बड़ी संख्‍या में कोरोना की गिरफ्त में आ गये हैं, यानी 15 दिन के लिए उनकी सेवायें मरीजों के लिए बंद, न सिर्फ केजीएमयू दूसरे संस्‍थानों में भी कमोवेश ऐसी ही स्थिति है। कुछ नहीं है तो कोरोना के चलते सुरक्षा के तहत ओपीडी के सख्‍त नियम बना दिये गये हैं, जिस कारण डॉक्‍टर तक पहुंचना एक बड़ी बाधा हो गया है।

यहां ये तीन उदाहरण देकर कोरोना की बढ़ती भयावहता को दिखाने की कोशिश की गयी है। कोरोना की दूसरी लहर ने अपने पिछले सारे रिकॉर्ड को ध्‍वस्‍त करते हुए तेजी से पांव पसारने शुरू कर दिये हैं। इसके चलते मृत्‍यु का आंकड़ा भी बढ़ा है, चूंकि कोविड से हुई मौत के बाद शव के विद्युत शवदाह गृह में ही अंतिम संस्‍कार का प्रोटोकॉल है, इसलिए जब मौतें बढ़ीं तो यहां पहुंचने वाले शवों की संख्‍या भी बढ़ गयी। कल्‍पना मात्र से हृदय द्रवित हो उठता है कि पहले तो प्रियजन का यूं अचानक चले जाना ही घरवालों को काफी तकलीफ देता है, उसके उपरांत इस तरह की स्थिति और भी रुलाती है, इस दुख को जो सहता है, वही समझता है।

अभी हाल की ही तो बात है जब नये निकलने वाले मरीजों के आंकड़े 50 से कम आ गये थे, लग रहा था कि धीरे-धीरे सब कुछ सामान्‍य हो जायेगा, लेकिन चूंकि कोरोना समाप्‍त नहीं हुआ था इसलिए जैसे ही लोग सावधानी बरतने को लेकर ढीले पड़े, बस वायरस को मौका मिल गया। मैं ज्‍यादा टेक्निकलिटी में नहीं जाना चाहता हूं कि इस कोरोना का वेरियेंट पहले वाले से अलग है, यह तेजी से फैलता है, वगैरह-वगैरह… वेरियंट कोई भी हो, कोरोना वह भी था, कोरोना यह भी है। वो भी खतरनाक था, ये भी खतरनाक है, वो भी जानलेवा था, यह भी जानलेवा है। लेकिन हमें क्‍या हो गया, हम क्‍यों लापरवाह बन गये, क्‍यों नहीं हमने लॉकडाउन के वे दिन याद नहीं रखे जब घर में काम करने मेड तक नहीं आ पाती थी। हम फ्री होकर बाहर निकलने को तरस रहे थे…

यह सही है कि सरकार ने जब धीरे-धीरे सब कुछ अनलॉक किया तभी हम भी सामान्‍य जीवन की ओर बढ़े लेकिन सरकार ने अनलॉक ही तो किया था, यह तो न तो सरकार ने और न ही किसी डॉक्‍टर या अन्‍य विशेषज्ञ ने कभी नहीं कहा कि कोरोना से बचने के लिए बने नियमों का पालन करना छोड़ दें, यह तो पिछले सवा साल से सिखाया जा रहा है कि बाहर निकलें तो मास्‍क अवश्‍य लगायें, सोशल डिस्‍टेंसिंग का पालन करें, तो हमने इसक ध्‍यान क्‍यों नहीं रखा। क्‍यों कोरोना को पनपने का मौका दिया। और शर्मनाक तो यह है कि आज जब कोरोना की त्रासदी अपने सारे रिकॉर्ड तोड़ती हुई आगे बढ़ रही है, तब भी हम में से अनेक लोग अब भी गंभीर नहीं हैं, वे आज भी मास्‍क नहीं लगाते हैं, न ही सोशल डिस्‍टेंसिंग का पालन करते हैं। ऐसा नहीं है कि सभी लोग इन नियमों की अनदेखी करते हैं, ऐसे भी लोग हैं जो सुरक्षा के इन नियमों का पालन शुरू से लगातार कर रहे हैं।

दरअसल बात कड़वी है लेकिन सत्‍य है कि ज्‍यादातर लोगों की आदत यह बन चुकी है कि जब तक उनके साथ सख्‍ती न बरती जाये तब तक नहीं समझ में आता है। लेकिन यहां गौर करने की बात यह है कि इन सुरक्षा को अपनाने के लिए सख्‍ती करने के पीछे उद्देश्‍य है, हमारी, हमारे अपनों की जान बचाना। यहां मैं एक और उदाहरण देना चाहूंगा कि यह तो कोरोना संक्रमण का मामला है जिसमें एक व्‍यक्ति की लापरवाही दूसरे व्‍यक्ति के लिए भी घातक है, लेकिन हम तो हेलमेट लगाने, सीट बेल्‍ट बांधने में भी लापरवाही करते थे, जबकि उसमें दुर्घटना होने की स्थिति में नुकसान खुद का ही होना था। हम में से अनेक लोगों ने यह देखा होगा कि बहुत से लोग चौराहा आने से पहले हेलमेट लगा लेते हैं और चौराहा पार करने के बाद फि‍र से हेलमेट उतार देते हैं, ऐसा करके वे धोखा किसे देते हैं, सरकारी तंत्र को कि अपने आप को…कहने का अर्थ है कि हम अपनी जान बचाने के लिए भी अगर गंभीर नहीं हैं तो फि‍र क्‍या कहा जाये…

अक्‍सर लोगों की बातों से यह भाव निकलते हैं कि संक्रमण को रोकने की जिम्‍मेदारी सरकार की है, लेकिन ऐसे लोगों ने कभी सोचा है कि जीवन तो उनका है, सरकार का तो नहीं है, और अगर जीवन को कोई नुकसान पहुंचा तो सरकार के लिए तो नुकसान का सिर्फ एक आंकड़ा बढ़ जायेगा, लेकिन व्‍यक्ति के न रहने की पीड़ा तो उनके परिजन ही भुगतेंगे।

खैर जो हुआ सो हुआ, इस संक्रमण की चेन को तोड़ने के लिए जोर सभी को लगाना होगा, हम अगर अपनी, अपने परिजनों को ही बचाव के सभी साधन अपनाने का प्रण ले लेंगे तो संक्रमण की चेन टूट सकती है। इसके लिए सरकार की ओर से कदम उठाये जाने की प्रतीक्षा मत कीजिये। सरकार को कोई भी कदम उठाने के लिए अनेक दृष्टिकोण से सोचना पड़ता है, जबकि हमें सिर्फ हमारे दृष्टिकोण से सोचना है, इसलिए कोरोना को हराने के लिए सरकार और विशेषज्ञों द्वारा बताये गये नियमों का ईमानदारी से पालन सुनिश्चित कीजिये। हम अगर अब नहीं जागेंगे तो कब जागेंगे, श्‍मशान घाट पर दिख रहे ऐसे-ऐसे अप्रिय दृश्‍यों को देखते रहना किसी भी हालत में उचित नहीं कहा जा सकता…