Wednesday , November 30 2022

ट्रांसजेंडर : लड़का या लड़की की सोच जब विपरीत सेक्‍स वाली हों तो क्‍या करें…

-डॉ अलीम सिद्दीकी और डॉ शाजिया सिद्दीकी ने दीं पैनल डिस्‍कशन में जानकारियां

सेहत टाइम्‍स ब्‍यूरो

लखनऊ। अगर बच्‍चा पैदा हुआ लड़का के रूप में बाद में सोच विकसित हुई लड़की के रूप में तो ऐसे में क्‍या करें, इस बारे में उत्‍तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के वरिष्‍ठ मनोचिकित्‍सक डॉ अलीम सिद्दीकी ने यहां ऑल इंडिया कॉग्रेस ऑफ ऑब्‍स्‍टेट्रिक्‍स एंड गाइनीकोलॉजी की 63वीं कॉन्‍फ्रेंस AICOG-2020 में ट्रांसजेन्‍डर पॉपुलेशन विषय पर आयोजित चर्चा में इस बारे में बात की। डॉ अलीम के साथ ही क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ शाजिया वकार सिद्दीकी भी इस चर्चा का हिस्‍सा रहीं।

डॉ अलीम बताते हैं कि कुछ बच्‍चों के साथ ऐसा होता है कि बच्‍चा पैदा हुआ एक सेक्‍स में लेकिन उसके मस्तिष्‍क का सॉफ्टवेयर बता रहा है कि मैं इस सेक्‍स का नहीं हूं, अपोसिट सेक्‍स का हूं, ऐसे में यह जो कन्‍फ्यूजन की स्थिति होती है उसे ही ट्रांसजेन्‍डर कहते हैं, अगर इसके कारण बहुत दिक्‍कत आ रही हो तो वह जेन्‍डर डिस्‍फोरिया कहलाती है। उन्‍होंने बताया कि अब ट्रांसजेंडर को बीमारी नहीं माना जाता है, सिर्फ पहचान लिया जाता है कि यह ट्रांसजेंडर है, इसके बाद हम लोग कई तरह के पैमाने पर परखने के बाद अगर साफतौर पर समझ में आता है कि यह ट्रांसजेंडर का केस है तो हम पहले कई चरणों में उस बच्‍चे और उसके परिजनों की काउंसलिंग करके इसे ठीक करने की कोशिश करते हैं, ता‍कि हम उसे उसके पैदाइशी सेक्‍स की तरफ ले जा सकें। फि‍र जरूरत पड़ने पर हार्मोन्‍स की दवायें दी जाती हैं और उसके ठीक करने की कोशिश की जाती है, और अगर इसके बाद भी ठीक नहीं होता है तो सर्जरी करके उसे उसके मस्तिष्‍क की सोच वाले सेक्‍स के अनुसार बना दिया जाता है। उन्‍होंने बताया कि यह एक लम्‍बी प्रक्रिया है और इसमें बहुत सी बातों का ध्‍यान रखना होता है। अगर सर्जरी की नौबत आती है तो कानूनी प्रक्रिया का पालन करने की जरूरत भी होती है।

देखें वीडियो-लड़का होने के बावजूद सोच लड़कियों वाली हो तो क्या करें

इस बारे में क्लीनिकल मनोवैज्ञानिक डॉ शाजिया वकार सिद्दीकी ने बताया कि इस तरह के ट्रांसजेंडर मरीजों को बहुत सी मानसिक दिक्‍कतों का सामना करना पड़ता है, उसे समाज से भी निकाल दिया जाता है, परिवार वाले भी उसकी यह स्थिति देखकर परेशान होते हैं। ऐसे समय में मनोवैज्ञानिक की भूमिका बहुत अहम हो जाती है, उसे मरीज के साथ ही उसके परिजनों को समझाना होता है, यही नहीं अगर सर्जरी की नौबत आती है तो मरीज कई बार कन्‍फ्यूजन की स्थिति में होता है कि मेरी शा‍रीरिक संरचना के विपरीत सेक्‍स की यह मन:स्थिति है भी कि नहीं कहीं मैं जल्‍दबाजी में सर्जरी करा लूं तो बाद में मेरी यह सोच न रहे तो क्‍या होगा…आदि आदि, डॉ शाजिया ने बताया कि ऐसी स्थिति में उसकी काउंसिलिंग करके उसे समझाना होता है, जब वह समझ जाता है तो उसे यह बताया जाता है कि सर्जरी के बाद उसे समाज का सामना कैसे करना है, कैसे उसे सशक्‍त बनना है।

इसके कारणों के बारे में पूछने पर डॉ अलीम ने बताया कि दरअसल बच्‍चा जब गर्भ में आता है तो पहले सेक्‍स बनता है फि‍र जेंडर का इम्‍प्रेशन आता है, ऐसे में जब कभी इनका आपस में मिसमैच होता है तो यह स्थिति बन जाती है।  डॉ अलीम और डॉ शाजिया ने कहा कि इस कॉन्फ्रेंस में आकर हमें बहुत अच्छाज लगा और हम आयोजकों के आभारी हैं कि देश-विदेश के विशेषज्ञों के समक्ष हमें अपनी बातों को रखने का मौका मिला।