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BREAKING NEWS : एनआरएलसी में साबित व जर्नल में प्रकाशित हो चुका है ब्‍लैक फंगस का होम्‍योपैथिक दवाओं से इलाज

-26 वर्ष पूर्व डॉ गिरीश गुप्‍ता व डॉ केएल गर्ग ने की थी तीन तरह के फंगस पर लैब में एक्‍सपेरिमेंटल स्‍टडी

-कोविड महामारी के साथ ब्‍लैक फंगस के खौफ के बीच राहत देने वाली खबर

धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

लखनऊ। जिस ब्‍लैक फंगस ने आजकल सभी को तनाव में डाल रखा है, इस पर होम्‍योपैथिक दवाओं से काबू पाना संभव है। यह सिर्फ दावा नहीं बल्कि केंद्र सरकार की प्रतिष्ठित लैब में इसको 26 साल पूर्व ही साबित किया जा चुका है। इसकी एक्‍सपेरिमेंटल स्‍टडी एशियन होम्‍योपैथिक जर्नल में वॉल्‍यूम 5 संख्‍या 1, जनवरी-मार्च 1995 के अंक में प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें शीर्षक था Effects of Homoeopathic drugs against fungi isolated from human patients.

गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के चीफ कंसल्‍टेंट डॉ गिरीश गुप्‍ता ने 1995 में नेशनल रिसर्च लेबोरेटरी फॉर कन्‍जर्वेशन (एनआरएलसी) में वैज्ञानिक माइक्रोबायोलॉजिस्‍ट डॉ केएल गर्ग के साथ मिलकर लैब में साक्ष्‍य आधारित एक्‍सपेरिमेंटल स्‍टडी की थी, जिसमें यह साबित हुआ कि होम्‍योपैथिक दवायें तीन तरह की फंजाई कैनडिडा एलबिकैन्‍स, ट्राइकोफाइटॉन मेन्‍टोग्रोफाइट और एस्‍परजिलस नाइजर में असर करती हैं। आपको बता दें आजकल जिस ब्‍लैक फंगस (म्‍यूकरमाइकोसिस) की बात हो रही है इसका बॉटेनिकल नाम है एस्‍परजिलस नाइजर।

इन तीनों फंगस में एस्‍परजिलस नाइजर यानी ब्‍लैक फंगस पर  होम्‍योपैथी की दो दवाओं का अच्‍छा प्रभाव पाया गया। पेपर के अनुसार गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च में आने वाले मरीजों के कान, जुबान और त्‍वचा से फंगस का नमूना लिया गया और उसे लैब में कल्‍चर किया गया तथा होम्‍योपैथिक दवाओं से इस फंगस को नियंत्रित करने में सफलता पायी गयी।

बहुत रोचक है एनआरएलसी में स्‍टडी की कहानी

डॉ गिरीश गुप्‍ता बताते हैं कि नेशनल रिसर्च लेबोरेटरी फॉर कन्‍जर्वेशन के माइक्रोबायोलॉजिस्‍ट डॉ केएल गर्ग किसी मरीज को लेकर उनकी क्‍लीनिक आये थे। डॉ गर्ग का उनके क्‍लीनिक पर कई बार आना हुआ तो एक दिन बातों-बातों में डॉ गिरीश ने बताया कि दो तरह की फंगस पर वर्ष 1981 में उन्‍होंने नेशनल बॉटिनिकल रिसर्च इंस्‍टीट्यूट (एनबीआरआई) में वहां के डॉ बी सुन्‍दरा सिंह के साथ Effect of Homoepathic drugs on The growth of Alternaria Tenuis Auct., and Curvularia Lunata (Wakkar) Boedijn, the Common Leaf Spot Pathogens of Ornamental and Cultivated plants  विषय पर लैब में स्‍टडी की थी,जिसमें होम्‍योपैथिक दवाओं से सफल नियंत्रण देखा गया था। इस स्‍टडी का प्रकाशन The Hahnemannian Gleanings, Vol. XLVIII, No. 9, September 1981 में हो चुका है।

डॉ गुप्‍ता बताते हैं कि एनबीआरआई की स्‍टडी के पेपर दिखाते हुए उन्‍होंने डॉ गर्ग से कहा कि उनकी इच्‍छा है कि कुछ और तरह की फंजाई पर स्‍टडी की जाये कि उन फंगस पर होम्‍योपैथिक दवाओं का असर होता है कि नहीं। डॉ गुप्‍ता बताते हैं कि मैंने उन्‍हें रिसर्च पेपर दिखाये तो वह नेशनल रिसर्च लेबोरेटरी फॉर कन्‍जर्वेशन में इस पर लैब एक्‍सपेरिमेंट के लिए तैयार हो गये। इसके बाद तीन तरह की फंजाई कैनडिडा एलबिकैन्‍स, ट्राइकोफाइटॉन मेन्‍टोग्रोफाइट और एस्‍परजिलस नाइजर के नमूने मरीजों के कान, जुबान और त्‍वचा से लिये गये, और फि‍र उन पर होम्‍योपैथिक दवाओं का असर देखा गया तो परिणाम 100 प्रतिशत सफल आये। 

डॉ गुप्‍ता बताते हैं कि आजकल कोरोना के खौफ के बीच ब्‍लैक फंगस का खौफ शुरू हो गया है। उन्‍होंने बताया कि ब्‍लैक फंगस यानी म्‍यूकरमाइकोसिस एक ऐसा रोग है जो कम इम्‍युनिटी वाले एवं डाय‍बिटीज के रोगियों में होने की संभावना रहती है, इसके साथ ही अस्‍पताल में भर्ती होने वाले रोगी, जिन्‍हें स्‍टेरॉयड दी गयी हो को यह फंगस अधिक संक्रमित करता है। हालांकि जिस हिसाब से कोरोना के मरीज हैं उस अनुपात में बहुत कम मरीजों में ब्‍लैक फंगस का संक्रमण हो रहा है।

डॉ गुप्‍ता बताते हैं कि लोगों के बीच सबसे पहले खौफ को दूर करना जरूरी है, उन्‍हें यह समझाना आवश्‍यक है कि इस रोग से घबरायें नहीं बल्कि इलाज करें क्‍योंकि यह रोग नया नहीं है, और पर इस पर नियंत्रण बहुत पहले पाया जा चुका है।