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जिम जाने से पहले डॉक्‍टर की सलाह अवश्‍य लें अस्‍थमा के रोगी : डॉ सूर्यकान्‍त

-विश्‍व अस्‍थमा दिवस पर केजीएमयू में आयोजित हुआ जागरूकता कार्यक्रम

सेहत टाइम्‍स

लखनऊ। आजकल बड़ी संख्‍या में लोग जिम ज्‍वॉइन करते हैं, चूंकि अस्‍थमा का रोग दो तिहाई लोगों को बचपन से ही शुरू हो जाता है जबकि बाकी को युवावस्‍था में इसका अहसास होता है। ऐसे में अस्‍थमा के रोगी अगर जिम ज्‍वॉइन करने की सोच रहे हैं तो उन्‍हें इससे पहले अपने चिकित्‍सक की सलाह अवश्‍य लेनी चाहिये।

यह सलाह ‘विश्व अस्थमा दिवस’  के मौके पर के.जी.एम.यू. के रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग एवं यूपी चेप्टर इण्डियन चेस्ट सोसाइटी व आईएमए-आईएमएस के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘अस्थमा जागरूकता कार्यक्रम’ में रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के विभागाध्‍यक्ष व इण्डियन कॉलेज ऑफ एलर्जी, अस्थमा एवं एप्लाइड इम्युनोलॉजी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष डा0 सूर्यकान्त ने उपस्थित मरीजों व तीमारदारों को देते हुए कहा कि अस्‍थमा रोगियों को जिम जाने से बचना चाहिये यदि जाना ही है तो चिकित्‍सक की सलाह से ही जायें क्‍योंकि जिम में व्‍यायाम से पूर्व इन्‍हेलर लेना आदि क्‍या-क्‍या सावधानियां बरतनी है, यह मरीज के रोग की गम्‍भीरता पर निर्भर करता है, और इस बारे में सही सलाह मरीज का इलाज कर रहा चिकित्‍सक ही बेहतर दे सकता है।

डॉ सूर्यकांत बताते हैं कि दो तिहाई से अधिक लोगों में दमा बचपन से ही प्रारम्भ हो जाता है। इसमें बच्चों को खांसी होना, सांस फूलना, सीने में भारीपन, छींक आना व नाक बहना तथा बच्चे का सही विकास न हो पाना जैसे लक्षण होते हैं।

शेष एक तिहाई लोगों में दमा के लक्षण युवा अवस्था में प्रारम्भ हाते हैं। इस तरह दमा बच्चों या युवावस्था में ही प्रारम्भ होने वाला रोग हैं। दमा के इलाज में इन्हेलर चिकित्सा सर्वश्रेष्ठ है क्योकि इसमें दवा की मात्रा का कम इस्तेमाल होता है, असर सीधा एवं शीध्र होता है एवं दवा के कुप्रभाव बहुत ही कम होते है। 

प्रो सूर्यकांत ने विश्‍व अस्‍थमा दिवस के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह प्रति वर्ष मई माह के पहले मंगलवार को मनाया जाता है। इस वर्ष, विश्व अस्थमा दिवस 3 मई  को मनाया गया। इसका उद्देश्य दुनिया भर में अस्थमा की बीमारी और देखभाल के बारे में जागरूकता फैलाना है। इस वर्ष विश्व अस्थमा दिवस की थीम ‘क्लोजिंग गैप्स इन अस्थमा केयर’ अर्थात अस्थमा के इलाज में आ रही कमियों को दूर करना है। आज भी अस्थमा के इलाज में कई कमियां हैं, जिनमें सुधार की आवश्यकता है जिससे इसके मरीजों की उचित देखभाल की जा सके और इलाज में होने वाले खर्च को कम किया जा सके। विश्व अस्थमा दिवस का आयोजन ग्लोबल इनिशिएटिव फॉर अस्थमा द्वारा प्रतिवर्ष किया जाता है। सन् 1998 में, बार्सिलोना, स्पेन में पहली विश्व अस्थमा बैठक में 35 से अधिक देशों में पहला विश्व अस्थमा दिवस मनाया गया था।

डॉ सूर्यकान्त ने रोगियों व तीमारदारों को अस्थमा के बारे में विस्तार पूर्वक बताते हुए कहा कि अस्थमा या दमा एक आनुवांशिक रोग है जिसमें रोगी की सांस की नलियां अतिसंवेदनशील हो जाती हैं एवं कुछ कारकों के प्रभाव से उनमें सूजन आ जाती है जिससे रोगी को सांस लेने में कठिनाई होती है। ऐसे कारको में धूल (घर या बाहर की) या पेपर की डस्ट, रसोई का धुआं, नमी, सीलन, मौसम परिवर्तन, सर्दी-जुकाम, धूम्रपान, फास्टफूड, मानसिक चिंता, व्यायाम, पालतू जानवर एवं पेड़ पौधों एवं फूलों के परागकण तथा वायरस एवं बैक्टीरिया के संक्रमण आदि प्रमुख होते हैं। ग्लोबल बर्डन ऑफ अस्थमा रिपोर्ट के अनुसार विश्व में लगभग 30 करोड़ लोग दमा से पीड़ित हैं। भारत में यह संख्या 3 करोड़ से अधिक है।

डॉ सूर्यकान्त ने लोगों को बताया कि रेस्परेटरी मेडिसिन विभाग के ’’धूम्रपान निषेध क्लिीनिक’’ की मदद लेकर आपको धूम्रपान छोड़ने में मदद मिल सकती है, और विभाग के मधूसूधन ज्ञान वाटिका में लगे बीमारियों से जुड़े लेखों को पढ़ने व उन पर आत्मसात करने के लिए कहा। रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ आर. ए. एस कुशवाहा, प्रोफेसर ने लोगों को चिकित्सक की सलाह के अनुसार हमेशा अस्थमा के लिए दवाओं एवं इन्हेलर लेने के लिए आग्रह किया। इस अवसर पर विभाग के चिकित्सकगण डा0 संतोष कुमार, डा0 अजय कुमार वर्मा, डा0 दर्शन कुमार बजाज, डा0 ज्योति बाजपेई, डा0 अंकित कुमार, रेजिडेन्ट डाक्टर्स एवं विभाग के सभी सदस्यगण मौजूद रहे।

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