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इंजीनियर की सरकारी नौकरी न कर सनातन के लिए समर्पित रहे अशोक सिंघल : स्वांत रंजन

-बच्चों को पर्यावरण और प्रकृति से जोड़ें : डॉ सूर्यकान्त 

-अशोक सिंघल के जन्म शताब्दी वर्ष के मौके पर संगोष्ठी आयोजित 

सेहत टाइम्स 

लखनऊ। अशोक सिंघल के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर रविवार, 27 सितंबर को एसकेडी अकादमी, वृंदावन कॉलोनी, लखनऊ में सांस्कृतिक गौरव संस्थान की ओर से संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वांत रंजन रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता सांस्कृतिक गौरव संस्थान अवध प्रांत के अध्यक्ष डॉ. सूर्यकान्त ने की। विशिष्ट अतिथि के रूप में खंड शिक्षा अधिकारी-3 परमेंद्र शुक्ला और संस्था के सचिव कृष्ण कुमार शुक्ला उपस्थित रहे‌‌।

स्वांत रंजन ने अशोक सिंघल के जीवन एवं कार्यों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि हिंदू समाज के जागरण और विभिन्न आंदोलनों में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने साधु-संतों को एकजुट करने तथा समाज को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन के लिए उनके प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकता। अशोक सिंहल एक इंजीनियर थे और सरकारी नौकरी न कर देश और सनातन के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया, बच्चों को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए।

अन्नप्राशन संस्कार सिर्फ एक धार्मिक परंपरा नहीं

डॉ. सूर्यकान्त ने सनातन संस्कारों में स्वास्थ्य और स्वच्छता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जन्म के लगभग छह माह बाद होने वाला अन्नप्राशन संस्कार केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि शिशु के जीवन में एक नई शुरुआत का संस्कार है।

उन्होंने कहा कि हमारी सनातन संस्कृति में स्वच्छता को सदैव विशेष महत्व दिया गया है। हाथों की स्वच्छता (Hand Hygiene) भी हमारी जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है, जो आज के समय में भी मानव स्वास्थ्य और संक्रमण से बचाव के लिए अत्यंत उपयोगी है। उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में संस्कार भी हैं और स्वास्थ्य का विज्ञान भी।

जन्मदिन को संस्कार, सेवा और पर्यावरण से जोड़ें

डॉ. सूर्यकान्त ने बच्चों के जन्मदिन को भी सनातन संस्कारों और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जन्मदिन की सुबह बच्चों के माथे पर तिलक अवश्य लगाना चाहिए, क्योंकि सनातन परंपरा में इसका विशेष महत्व है।

उन्होंने कहा कि जन्मदिन के अवसर पर गुड़ से बने गुलगुले और पूए बनाकर स्वयं भी खाएं और दूसरों को भी खिलाएं। बच्चों के जन्मदिन पर मोमबत्ती जलाकर बुझाने की परंपरा के स्थान पर भारतीय संस्कारों को अपनाने का आह्वान किया।

उन्होंने विशेष रूप से कहा कि 10 वर्ष तक के बच्चों के जन्मदिन पर उनके हाथों से कम से कम 10 पौधे अवश्य लगवाए जाएं, ताकि बचपन से ही उनमें प्रकृति और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी की भावना विकसित हो। साथ ही, जन्मदिन के शुभ अवसर पर जरूरतमंदों की सहायता और सेवा करने की परंपरा विकसित करने का भी संदेश दिया।

डॉ. सूर्यकान्त ने कहा कि जन्मदिन केवल उत्सव का अवसर न होकर ऐसा अवसर बने, जिसमें संस्कार हों, सेवा हो, पर्यावरण संरक्षण हो और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव हो।

कार्यक्रम में सरकारी स्कूल के बच्चों ने अशोक सिंहल के जीवन पर आधारित चित्र प्रदर्शनी लगाई। सभी अतिथियों ने इसे देख कर बच्चों की तारीफ़ की और पुरस्कार भी दिए। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने सनातन संस्कृति, संस्कार, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण एवं सेवा के इन संदेशों को समाज तक पहुंचाने का संकल्प लिया।