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वैचारिक मंथन का अमृत : मानसिक स्वास्थ्य के लिए पारम्‍परिक शिक्षा के साथ ही आध्‍यात्मिक शिक्षा भी जरूरी

-गोल्डन फ्यूचर धर्मार्थ संस्था के तत्‍वावधान में आयोजित हुआ मानसिक महोत्‍सव

-मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की थीम पर विभिन्‍न प्रतियोगिताएं, पैनल चर्चा, व्‍याख्‍यानों का आयोजन

-रक्‍तदान शिविर, खानपान, स्‍वास्‍थ्‍य सम्‍बन्‍धी लगे दर्जनों स्‍टॉल

सेहत टाइम्‍स  

लखनऊ। प्रत्‍येक व्‍यक्ति से जुड़े विषय मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर चर्चा करने के लिए शनिवार 1 अक्‍टूबर को सार्वजनिक धर्मार्थ ट्रस्ट गोल्डन फ्यूचर के तत्‍वावधान में अन्‍य संस्‍थाओं के सहयोग से आयोजित मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य उत्‍सव में धर्मगुरु, चिकित्‍सक, कलाकार, समाजसेवक, मनोचिकित्‍सक, मनोवैज्ञानिक, आध्‍यात्मिक गुरु, शिक्षाविद, इंजीनियर, प्रशासनिक सेवा के अधिकारी सहित समाज के विभिन्‍न क्षेत्रों के लोगों का यहां गोमती नगर स्थित आईएमआरटी कॉलेज में जमावड़ा लगा। दिन भर चले मंथन में जो सलाह रूपी अमृत निकला उसके अनुसार हमें अपने बच्‍चों को पारम्‍परिक शिक्षा के साथ ही आध्‍यात्मिक शिक्षा भी देनी होगी जिससे उनका आत्‍मबल, नैतिक बल भी मजबूत हो, इससे उन्‍हें जीवन को शानदार और प्रत्‍येक परिस्थिति का सामना मजबूती से करने की शक्ति प्राप्‍त होगी।

गोल्डन फ्यूचर के संस्थापक परामर्शदात शोभित नारायण ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य संबंधित तथ्यों पर चर्चा को हमारे समाज में लंबे समय से वर्जित माना जाता है। कई भ्रांतियों, रूढ़िवादी सोच, ज्ञान और जागरूकता की कमी के कारण मानसिक स्वास्थ्य संबंधित समस्याओं ने विकराल रूप ले लिया है। उन्‍होंने कहा कि विश्‍व मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य दिवस के अवसर पर इस उत्‍सव के माध्‍यम से  इस ताने-बाने को तोड़ने की लिए पहल की गयी है। इस विषय पर खुली चर्चा को स्वीकार करने और पोषित करने के लिए, एक अनुकूल वातावरण बनाने के लिए, गोल्डन फ्यूचर धर्मार्थ संस्था विश्व मानसिक स्वास्थ्य माह मनाया। इस जागरूकता अभियान के दौरान बड़ी संख्या में छात्र एवं युवा विभिन्न व्यक्तित्व विकास एवं सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लिया। इससे पूर्व इससे सम्‍बन्धित दो कार्यक्रम क्रमश: सेंट जोसफ स्‍कूल और रामकृष्‍ण मठ में आयोजित हुए थे। इन कार्यक्रमों का समापन शनिवार 1 अक्‍टूबर को गोमती नगर स्थित आईएमआरटी, बिजनेस कॉलेज में आयोजित ग्रैंड फिनाले में हुआ।

इस कार्यक्रम में विविध वार्ताएं, विभिन्न संस्थागत प्रमुखों द्वारा पैनल चर्चा, बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए सांस लेने की क्रिया और वेगस तंत्रिका सक्रियण पर एक कार्यशाला भी आयोजित हुई। समारोह में मानसिक स्वास्थ्य और कल्याणकारी सामुदायिक हितधारकों के 30 से अधिक स्टॉल लगाये गये।

शोभित नारायण ने बताया कि गोल्डन फ्यूचर द्वारा आयोजित इस विश्व मानसिक स्वास्थ्य माह उत्सव के समापन समारोह को प्रतिष्ठित व्यक्तियों और लखनऊ के निवासियों के सहयोग से आयोजित किया गया। इनमें इंडियन एकेडमी ऑफ न्यूरोसाइंसेज, आईएमआरटी बिजनेस कॉलेज, सेंट जोसेफ कॉलेज, गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च, राम कृष्ण मठ, ब्रह्मकुमारी, फेदर्स (सेंटर फॉर मेंटल हेल्‍थ), लखनऊ मैनेजमेंट एसोसिएशन और कई अन्य पेशेवर, प्रशासनिक, सामाजिक और शैक्षिक संगठन जैसे निकाय शामिल रहे।

शिक्षा व्‍यवस्‍था में मन की शिक्षा भी जरूरी : स्‍वामी मुक्तिनाथानंद

प्रथम सत्र में आयोजित सर्व धर्म सम्‍मेलन में राम कृष्‍ण मठ, विवेकानंद पॉलीक्‍लीनिक के सचिव स्वामी मुक्तिनाथानंद ने कहा कि आज की शिक्षा व्यवस्था में मन की शिक्षा नहीं दी  जाती। जिसे परा विद्या कहते हैं जिसका वर्तमान शिक्षा में अभाव है। मुझे हर्ष हो रहा है कि‍ गोल्डेन फ्यूचर इस और समाज का ध्यान आकर्षित कर रहा है। 

आध्‍यात्मिक स्‍वास्‍थ्‍य भी होना चाहिये ठीक : ब्रह्मकुमारी राधा

ब्रह्मकुमारी राधा ने कहा कि हमारा प्रिय मित्र हमारा मन होता है, मानसिक, शारीरिक, स्वास्थ्य के साथ-साथ हमारा आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी स्वस्थ होना चाहिये। जो कि हमारे मन को उर्जा प्रदान करता है और मन हमारे शरीर को सकारात्मक कार्यों के लिए उर्जा प्रदान करता है। 

अहम् भाव के कारण मानसिक अस्‍वस्‍थता : डॉ ऐबल

फादर डॉ. ऐबल ने कहा कि आज मानसिक स्वास्थ्य के अस्वस्थ होने का सबसे बड़ा कारण अहं भाव है (I’M) यदि हम I के स्थान पर शून्य (0- son of god) समझ लें तो मन को कोई भी रोग ग्रसित नहीं कर सकता और हम मानसिक रूप से स्वस्थ होंगे। इसके लिये हमें स्वयं को जानना होगा अगर हम स्वयं को नहीं जानेंगे तो परमेश्वर भी हमें नहीं जानता। 

मन की मजबूती के बिना एक कदम भी चलना असंभव : स्‍वामी चैतन्‍य

स्वामी कौशिक चैतन्य ने आध्यात्मिकता का मानसिक स्वास्थ्य पर महत्व बताते हुए कहा कि प्रत्येक इंद्रियों, विचारों, भावनाओं, क्रियाकलाप के अंदर जो सामर्थ्य होता है, वही मन है। उन्होंने कहा कि अगर मन मजबूत नहीं है तो हम चाहे कितने भी बलशाली क्यों न हो एक कदम आगे नहीं बढ़ा सकते हैं। उन्होंने कहा विश्व में सबसे पहले मन से हारने वाले व्यक्ति अर्जुन थे। उन्होंने कहा कि जब महाभारत का युद्ध चल रहा था उस समय अर्जुन रथ के पिछले हिस्से में बैठ जाते हैं और कहते हैं कि मुझ से युद्ध नहीं होगा, भगवान कृष्ण उन्हें समझाते हैं इसके बाद ही अर्जुन युद्ध के लिए खड़े होते हैं। स्वामीजी ने कहा कि जब मन व्यथित हो और किसी निर्णय को लेने में सक्षम न हो तो किसी काबिल व्यक्ति के समक्ष अपने मन को सरेंडर कर देना चाहिए और फिर उस व्यक्ति की दिखायी राह पर चलना चाहिए।

सहिष्‍णुता भरा व्‍यवहार जरूरी : डॉ नवीन


क्रिश्चियन कम्युनिटी के फादर डॉ नवीन सेमुअल ने कहा कि सभी मनुष्यों को एक दूसरे की पीड़ा को समझना चाहिए उन्होंने कहा कि चाहे माता-पिता हों अथवा अन्य कोई, सभी के साथ सहिष्णुता भरा व्यवहार करना चाहिए। ध्यान रहे आप जो देंगे वही वापस आपके पास आएगा।

सांसों की लय का मन से सीधा सम्‍बन्‍ध : समर्थ नारायण


आर्ट ऑफ लिविंग के समर्थ नारायण ने कहा कि आत्मीयता का भाव ही अध्यात्म है। उन्होंने कहा कि आपकी सांस किस लय में चल रही है यह आपके आपकी मन की स्थिति पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा, हर प्रकार के मन की अवस्था में सांसों की लय बदल जाती है। उन्होंने कहा कि सांसों की लय को बदलकर मन की अवस्था को भी बदला जा सकता है।

इच्‍छा कभी भरती नहीं : सुफि‍यान निजामी


मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली के प्रतिनिधि सुफियान निजामी ने कहा कि समाज में मोहब्बत का ढांचा टूट गया है इंसानों की मानसिक इच्छा ऐसी होती है कि अगर उन्हें एक सोने का जंगल मिल जाए तो उन्हें एक और जंगल की चाहत होगी उन्होंने कहा कि‍ मजहब के बिना सुकून नहीं मिलता है।

रथ शरीर, सारथी मन : डॉ कृष्‍ण दत्‍त


केजीएमयू में मनोवैज्ञानिक रह चुके डॉ कृष्ण दत्त ने रथ से उदाहरण देते हुए बताया कि रथ हमारा शरीर है, रथ में जुते हुए घोड़े हमारी इंद्रियां (आंख, नाक, कान, जीभ और त्‍वचा) हैं, रथ चलाने वाला सारथी मन है, मन के हाथ में गति नियंत्रक यानी चाबुक और लगाम होता है, यह चाबुक और लगाम हैं बुद्धि और विवेक, रथ में पीछे बैठा हुआ जो व्‍यक्ति है वह आप स्‍वयं हैं अगर मन मनमानी करने लगेगा तो इंद्रिया आपको कहीं भी जाकर भिड़ा देंगी लेकिन अंतर्मन की आत्‍मा की आवाज जो सुनेगा तो जैसे कि रथ चलाने वाला पीछे बैठे व्‍यक्ति से पूछता है कि मैं ठीक चल रहा हूं और फि‍र सही मार्ग पर चलता है और अगर वह सलाह नहीं लेगा तो उसके हाथ में जो गति नियंत्रक हैं वे उसके नौकर हो जाते हैं बुद्धि विवेक नहीं बनती है बल्कि वह उसकी असिस्‍टेंट हो जाती है। उन्‍होंने कहा कि स्वास्थ्य यानी स्‍व-स्थित में मानसिक स्वास्थ्य पहले और शारीरिक स्वास्थ्य बाद में है, इसमें दोनों स्‍वास्‍थ्‍य  शामिल है। उन्होंने कहा जीवन में रस का सृजन रखिये, जब लगे कि रस सूख रहा है तब बुजुर्गों से सलाह लीजिये। उन्‍होंने कहा कि आज तीन एम हमारी जरूरत बन गये हैं, पहला एम है मोबाइल, दूसरा एम है मनी तथा तीसरा एम है माइंड लेकिन इन्‍हें अपने ऊपर हावी न होने दें इन्‍हें मास्‍टर न बनने दें।

दवा और थैरेपी दोनों ही आवश्‍यक : डॉ शबरी दत्‍ता

नूर मंजिल साइकाइट्रिक सेंटर की मनोचिकित्सक डॉ शबरी दत्ता ने कहा के महिलाओं के लिए मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का बहुत महत्‍व हैं क्‍योंकि उन्‍हें कई प्रकार की मन:स्थितियों का सामना करना पड़ता है। डॉ शबरी ने बताया कि प्रसव के बाद महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य की समस्या होने की संभावना ज्यादा रहती है, विशेषकर अगर कोई समस्या पहले से ही हो तो। उन्होंने कहा मानसिक स्वास्थ्य को दुरुस्‍त करने के लिए दवा और थेरेपी दोनों की मदद लेनी चाहिए, थैरेपी दवा का काम आसान कर देती है।

पैनल चर्चा में रखे गये महत्‍वपूर्ण विचार

दूसरे सत्र में पैनल चर्चा का आयो‍जन किया गया जिसमें गौरांग क्‍लीनिक एंड रिसर्च फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के चीफ कन्‍सल्‍टेंट डॉ गिरीश गुप्‍ता ने कहा है कि जैसा कि मैं पहले भी कह चुका हूं कि मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की भूमिका व्‍यक्ति के स्‍वास्‍थ्‍य में अहम है, इसे विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन ने भी माना है, इसीलिए उसने स्‍वास्‍थ्‍य की परिभाषा में बाद में मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को शामिल किया था।

उन्‍होंने कहा कि आज गैर संचारी रोग बहुत बढ़ गये हैं, इनमें अनेक रोगों का कारण मानसिक सोच है, स्त्रियों को होने वाले शारीरिक रोग, त्‍वचा के रोगों के मरीजों पर की गयी रिसर्च बताती हैं कि इसका कारण मानसिक सोच पाया गया है।  उन्‍होंने कहा कि जहां तक मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य का आर्थिक स्थिति से विशेष सम्‍बन्‍ध की बात है तो मैं समझता हूं कि ऐसा नहीं है। उन्‍होंने कहा कि बल्कि देखा जाये तो मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य की समस्‍या आर्थिक रूप से विपन्‍न व्‍यक्तियों से ज्‍यादा आर्थिक रूप से सम्‍पन्‍न व्‍यक्तियों में ज्‍यादा पायी जा रही हैं। उन्‍होंने कहा कि इसकी एक बड़ी वजह ईर्ष्‍या है। उन्‍होंने कहा कि आज व्‍यक्ति दूसरों को आगे बढ़ता हुआ नहीं देखना चाहता है।

डॉ गुप्‍ता ने इसके लिए एक कहानी से उदाहरण देते हुए कहा कि एक व्‍यक्ति ने भगवान से अपने लिए घर होने का वरदान मांगा, जिसे भगवान ने पूरा कर दिया। फि‍र उसकी इच्‍छा और बढ़ी तो उसने भगवान से गाड़ी की मांग की तो भगवान ने कहा कि तुम्‍हें गाड़ी या जो भी सामान मांगोंगे मैं दे दूंगा लेकिन मेरी एक शर्त है कि जो तुम मांगोगे, वह तुमने दोगुना तुम्‍हारे पड़ोसी को दूंगा। व्‍यक्ति तैयार हो गया, लेकिन जब उसने चीजों को अपने से दोगुनी संख्‍या में पड़ोसी के पास देखा तो उसे ईर्ष्‍या होने लगी। उसने भगवान से वरदान मांगते हुए कहा कि मेरी एक आंख फोड़ दीजिये, और जब उसने पड़ोसी को देखा तो उसकी दोनों आंखें जा चुकी थीं और वह लाठी लेकर चल रहा था। अब व्‍यक्ति यही अपने मन में सोच कर खुश था कि कोई बात नहीं मेरी तो एक आंख की रोशनी गयी है, लेकिन कम से कम पड़ोसी की तो दोनों आंखें खराब हुई हैं। यानी अपनी ईर्ष्‍या में उसने अपनी भी एक आंख गंवा दीं।

श्रमिक वर्ग को बतायें उसके और परिवार के अधिकार

लेबर विभाग के डॉ महेश कुमार पाण्‍डेय ने लेबर क्‍लास की मन:स्थिति उनके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर की गयी चर्चा का जवाब देते हुए कहा कि आप लोग जब भी किसी लेबर को मायूस देखें तो उससे पूछें कि क्‍या आपने लेबर विभाग में अपना पंजीकरण कराया है तो उसका तुरंत उत्‍तर होगा कि इससे हमें क्‍या मिलेगा। डॉ महेश कुमार पाण्‍डेय ने कहा कि जिन श्रमिक का पंजीकरण होता है उनके परिवार का आयुष्‍मान कार्ड बन जाता है जिससे माध्‍यम से पांच लाख रुपये तक का इलाज नि:शुल्‍क कराने की सुविधा मिलती है। इसके अलावा श्रमिक परिवार के बच्‍चों के लिए अटल आवासीय विद्यालय शुरू होने जा रहे हैं।

मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर बात करिये, हिचकिचाइये नहीं : डॉ प्रांजल अग्रवाल

निर्वाण हॉस्पिटल के डाइरेक्‍टर डॉ प्रांजल अग्रवाल ने कहा कि‍ आज देश का युवा नशे में डूबता जा रहा है। युवा मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, लॉ कॉलेजों या किसी भी क्षेत्र में स्‍टडी कर रहे हों, वे नशे के शिकार हो रहे हैं। पिछले 1 साल से यह देखा गया है कि महिलाओं और लड़कियों में नशे के सेवन की प्रवृत्ति बढ़ गई है, उन्‍हें एडमिट करना पड़ रहा है। यह अत्‍यन्‍त चिंताजनक है।

डॉ प्रांजल अग्रवाल ने कहा कि‍ सोचकर देखिये कि आज से 20 साल बाद की स्थिति क्‍या होगी। उन्‍होंने कहा कि आज का युवा कल देश चलाने की तैयारी कर रहा है, और ऐसे में जब देश चलाने वाले इस तरह नशे के आदी होंगे तो देश कैसे आगे बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि चाहें किसी भी तरह से युवाओं को इस नशे की लत से विरत करने के लिए इस पर सरकार को भी कदम उठाने की आवश्यकता है।

डॉ प्रांजल अग्रवाल ने कहा कि‍ लोगों में यह स्टिग्मा है कि अगर वह अपनी मानसिक स्थिति के बारे में बताएंगे तो लोग उसे पागल न समझ लें। उन्होंने कहा कि आजकल परिवार के लोगों में आपस में भी संवाद का अभाव है। डाइनिंग टेबल पर चार लोग अगर बैठे हैं तो चारों अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त नजर आएंगे। उन्होंने सुझाव दिया कि‍ घर के सभी सदस्य कम से कम एक टाइम का भोजन एक साथ किया करें, और उस दौरान उनके मोबाइल अलग रख दिये जाएं। पैनल चर्चा में संस्‍कृति विभाग के अभय जैन, अन्‍तर्राष्‍ट्रीय बौद्ध शोध संस्‍थान के अध्‍यक्ष भदन्‍त शान्ति मित्र, आर्ट ऑफ लिविंग के तनुज ने भी अपने विचार रखे।

इस अवसर पर रक्‍तदान शिविर का भी आयोजन किया गया। उत्‍सव में इसके अतिरिक्‍त होम्‍योपैथी, मनोवैज्ञानिक, आयुर्वेदिक, आर्ट ऑफ लिविंग, सहित स्‍वास्‍थ्‍य, खाने-पीने की वस्‍तुओं से  सम्‍बन्‍घी कई स्‍टॉल लगाये गये। शोभित अग्रवाल ने महोत्‍सव की सफलता के लिए इस मिशन में लगी टीम के सभी सहयोगियों विशेषकर नूरमंजिल हॉस्पिटल की साइकोलॉजिस्‍ट डॉ अंजली गुप्‍ता, आईएमआरटी बिजनेस कॉलेज के निदेशक डॉ डीआर बंसल, गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च के चीफ कंसल्‍टेंट डॉ गिरीश गुप्‍ता, ‘फेदर्स’ (सेंटर फॉर मेंटल हेल्‍थ) की फाउंडर क्‍लीनिकल साइकोलॉजिस्‍ट सावनी गुप्‍ता, गोल्‍डन फ्यूचर पब्लिक चेरीटेबिल ट्रस्‍ट की फाउंडर ट्रस्‍टी कुमकुम अग्रवाल, पति परिवार कल्‍याण समिति के कपिल मोहन चौधरी, हस्‍त शिल्‍प कला केंद्र की पुनीता भटनागर, परवरिश निरालानगर की कुसुम सहित पूरी टीम का आभार व्‍यक्‍त किया।

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