✍🏻 साइक्लोमेड फिट इंडिया के संस्थापक डॉ अनिल नौसरन की कलम से

आज के तथाकथित समृद्ध समाज में एक चिंताजनक विरोधाभास उभर रहा है—जहाँ भौतिक सुविधाएँ बढ़ी हैं, वहीं हमारे बुज़ुर्गों का पोषण और भावनात्मक स्वास्थ्य चुपचाप गिरता जा रहा है। अनेक वृद्धजन पोषण की कमी से पीड़ित हैं, यह गरीबी के कारण नहीं बल्कि उपेक्षा, झिझक और भावनात्मक अकेलेपन के कारण है।
बुढ़ापा व्यवहार में परिवर्तन लेकर आता है। धीरे-धीरे बुज़ुर्गों की आवश्यकताएँ और भावनाएँ बच्चों जैसी हो जाती हैं। वे भोजन, देखभाल या चिकित्सा सहायता माँगने में संकोच करते हैं। युवा पीढ़ी से भिन्न, वे स्वयं को बोझ न समझा जाए—इस भावना से अपना कष्ट दबा लेते हैं। यही झिझक अनियमित भोजन, कुपोषण और बिगड़ते स्वास्थ्य का कारण बनती है।
लोकप्रिय धारणा के विपरीत, बुज़ुर्गों को सबसे अधिक धन की नहीं, बल्कि अपनापन, ध्यान और भावनात्मक सुरक्षा की आवश्यकता होती है। हर संतान अपने माता-पिता की पसंद-नापसंद जानती है, फिर भी माता-पिता के वृद्ध होने पर इन छोटी-छोटी बातों को भूल जाती है। बार-बार भोजन की पेशकश करना, दिन में कम से कम एक समय साथ बैठकर खाना और उनसे संवाद करना उनके शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार ला सकता है।
नियमित स्वास्थ्य निगरानी अत्यंत आवश्यक है। प्रत्येक तीन माह में रक्त जाँच, नियमित रूप से रक्तचाप और शुगर की जाँच तथा समय पर चिकित्सकीय परामर्श परिवार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए। बुज़ुर्गों को हमेशा ताज़ा बना भोजन, मौसमी फल-सब्जियाँ तथा पर्याप्त मात्रा में विटामिन और खनिज तत्व मिलने चाहिए, जो स्वस्थ वृद्धावस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
छोटे-छोटे प्रयास बड़ा अंतर ला सकते हैं—उनकी व्यक्तिगत अलमारी में पौष्टिक खाद्य सामग्री रखना, उन्हें कुछ व्यक्तिगत खर्च के लिए पैसे देना और यह न पूछना कि उन्होंने कहाँ खर्च किए, तथा उनके सुझावों को सम्मानपूर्वक सुनना। ये उपाय उनकी गरिमा और आत्मविश्वास को बनाए रखते हैं, जो दवाओं जितने ही महत्वपूर्ण हैं।
दीर्घायु का अर्थ केवल जीवन के वर्षों को बढ़ाना नहीं, बल्कि वर्षों में जीवन जोड़ना है। परिवारों को अपने माता-पिता और बुज़ुर्गों के स्वस्थ जीवनकाल को बढ़ाने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करना चाहिए। एक बार वे चले गए, तो फिर कभी वापस नहीं आते। पछतावा कभी ज़िम्मेदारी का विकल्प नहीं हो सकता।
माता-पिता का सम्मान और बुज़ुर्गों की सेवा केवल सांस्कृतिक परंपरा नहीं, बल्कि नैतिक कर्तव्य और सामाजिक निवेश है। आज हम अपने बुज़ुर्गों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, वही आने वाले समय के समाज की दिशा तय करता है।
(लेखक प्रो अनिल नौसरन पैथोलॉजी से एमडी हैं, साइक्लोमेड फिट इंडिया के संस्थापक हैं, साइकिलिंग इनके रग-रग में बसी हुई है)

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