-गुजरात के आनंद में राज्यपाल ने किया लॉन्च, मोटीवेटर्स में लखनऊ के डॉ गिरीश गुप्ता भी शामिल

सेहत टाइम्स
लखनऊ। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के लिए पूर्णतया सुरक्षित, प्रभावी और रोग को जड़ से समाप्त करने वाली होम्योपैथी को विज्ञान की मुख्य धारा में लाने के प्रयास जारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चुनौतियां दोहरी हैं, एक चुनौती तो यह कि लोगों को होम्योपैथी की उपयोगिता से परिचित कराते हुए उनके अंदर विश्वास भरना दूसरी चुनौती खुद वे होम्योपैथिक चिकित्सक हैं, जो किन्हीं कारणों से प्रैक्टिस नहीं करते है। इन्हीं सब बातों के मद्देनजर गुजरात के आनंद में सैमुअल हैनीमैन एकेडमी फॉर होम्योपैथी के फाउंडर व कार्यक्रम के आयोजक डॉ कृतिक शाह ने सैमुअल हैनीमैन एप्लाइड होम्योपैथी कार्यक्रम तैयार किया है, इस कार्यक्रम को बीते रविवार 11 जनवरी को राज्य के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने लॉन्च किया।
इस लॉन्चिंग के मौके पर देश भर से ऐसे स्पीकर्स को आमंत्रित किया गया था, जो होम्योपैथिक की उपयोगिता, उसकी सार्थकता पर साक्ष्यों के साथ कार्य कर होम्योपैथी को आगे बढ़ाने में लगे हैं, इन स्पीकर्स ने अलग-अलग विषयों पर अपने व्याख्यान प्रस्तुत किये। इस कार्यक्रम में जो स्पीकर्स शामिल रहे उनमें डॉ कृतिक शाह के अलावा लखनऊ से डॉ गिरीश गुप्ता, मुम्बई से डॉ संजय मोदी, डॉ परिनाज हुमरानावाला, डॉ जवाहर शाह व डॉ कमलेश मेहता, पुणे से डॉ अजित कुलकर्णी, त्रिवेन्द्रम से डॉ ज्योति कानन, अहमदाबाद से डॉ भास्कर भट्ट व डॉ केतन शाह, चेन्नई से डॉ जयेश संघवी, हैदराबाद से डॉ प्रवीन कुमार, कोलकाता से डॉ सुभास सिंह और लातूर से डॉ योगेश नित्रुदर शामिल थे।
इन्हीं स्पीकर्स में लखनऊ ही नहीं उत्तर प्रदेश से अकेले स्पीकर वरिष्ठ होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ गिरीश गुप्ता भी शामिल थे। ज्ञात हो लगभग 45 वर्षों पूर्व रिसर्च कार्य शुरू करने वाले डॉ गिरीश गुप्ता ने अब तक मुड़कर पीछे नहीं देखा है, वैज्ञानिक साक्ष्यों के साथ होम्योपैथिक के दम को साबित कर उन आलोचकों का भी मुंह बंद किया है जिन्होंने होम्योपैथिक दवाओं को प्लेसिबो बताकर न सिर्फ प्रश्नचिन्ह लगाया था, बल्कि एक प्रकार से खिल्ली उड़ायी थी, ऐसे आलोचकों को डॉ गिरीश ने अपने काम से जवाब दिया, और उन्हें यह मानने पर मजबूर किया कि वे गलत सोच रहे थे। लखनऊ में गौरांग क्लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्योपैथिक रिसर्च स्थापित कर विभिन्न प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए डॉ गुप्ता ने क्लीनिकल और एक्सपेरिमेंटल दोनों प्रकार के अनेक शोध किये हैं, जिनका प्रकाशन देश-विदेश के विभिन्न प्रतिष्ठित जर्नल्स में होता रहता है। आनंद में सम्पन्न इस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने महिलाओं में होने वाले गर्भाशय फाइब्रायड (गर्भाशय में गांठ) का होम्योपैथिक दवाओं से उपचार पर अपना शोध पत्र प्रस्तुत किया। इसके साथ ही डॉ गिरीश ने गर्भाशय फाइब्रायड से ग्रस्त दो मॉडल केसेज भी प्रस्तुत किये, जिनके बारे में विस्तार से जानकारी दी।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने इस मौके पर स्पीकर्स को सम्मानित भी किया। राज्यपाल ने अपने सम्बोधन में कहा कि मैं डॉक्टर नही हूं लेकिन होम्योपैथिक दवाओं के प्रभाव से अच्छी तरह वाकिफ हूं, गवर्नर हाउस में कई गायें पल हैं, उनकी विभिन्न प्रकार की समस्याओं के लिए डॉक्टरों से पूछकर होम्योपैथिक दवा दी जाती हैं, और प्रॉब्लम ठीक हो जाती है। उन्होंने कहा कि इसके साथ ही हमें रोगों से बचाव के लिए भी जागरूक रहने की जरूरत है।
डॉ कृतिक शाह ने तैयार किये गये सैमुअल हैनीमैन एप्लाइड होम्योपैथी कार्यक्रम के उद्देश्यों के बारे में बताया कि
हमारे कार्यक्रम ऐसे होम्योपैथिक शिक्षाविदों और शिक्षकों के लिए एक सोच-समझकर तैयार किया गया नैदानिक पुनरावलोकन पाठ्यक्रम, जो अपने भीतर के चिकित्सक को फिर से खोजना चाहते हैं और अपने करियर के किसी भी चरण में अपना स्वतंत्र अभ्यास शुरू करना या पुनः शुरू करना चाहते हैं।
उन्होंने बताया कि इसके अतिरिक्त ऐसी महिला होम्योपैथिक चिकित्सकों को अपना होम्योपैथिक अभ्यास शुरू करने या फिर से शुरू करने के लिए सशक्त बनाना, और उन लोगों का समर्थन करना जिन्होंने विवाह और अन्य जीवन परिवर्तनों के कारण अपना शानदार होम्योपैथिक करियर खो दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा देखा गया है कि विवाह से पूर्व लड़कियों को घरवालों ने होम्योपैथिक चिकित्सक बनने के लिए शिक्षा तो दिलवा दी लेकिन इसके बाद वे क्लीनिक इसलिए नहीं खोल पाती कि घरवालों का उन्हें सपोर्ट नहीं मिलता और नौकरी उन्हेंं इसलिए नहीं मिल पाती क्योंकि इसके अवसर कम हैं।
उन्होंने बताया कि तैयार किये गये कार्यक्रम में बताया जायेगा कि विवाह से पहले होम्योपैथिक चिकित्सा की प्रैक्टिस शुरू करने और विवाह के बाद इसे सफलतापूर्वक जारी रखने के लिए एक महिला होम्योपैथिक छात्रा के लिए आवश्यक प्रारंभिक कदम, शादी से पहले और बाद में आत्मविश्वास और स्वतंत्रता के साथ पेशेवर निर्णय कैसे लें? शादी और मातृत्व के बाद होम्योपैथिक प्रैक्टिस शुरू करते समय आत्मविश्वास को कैसे पुनः प्राप्त किया जाए और नैदानिक दक्षता को कैसे मजबूत किया जाए? एक महिला होम्योपैथ को जीवन के हर चरण में सामाजिक हतोत्साहन और भावनात्मक चुनौतियों का सामना कैसे करना चाहिए? शादी के बाद घर से न्यूनतम निवेश और स्थायी लाभ के साथ होम्योपैथिक प्रैक्टिस शुरू करने या पुनः शुरू करने के लिए नैदानिक सुझाव।
डॉ शाह ने बताया कि इसके अतिरिक्त ऐसे चिकित्सक, जो होम्योपैथिक चिकित्सा के साथ ऐलोपैथिक चिकित्सा भी कर रहे हैं, वे एक तरह से यह मैसेज दे रहे हैं कि उस अमुक दिक्कत के लिए होम्योपैथिक में दवा नहीं है, ऐसे लोगों को मोटीवेट किया जायेगा कि ऐसा करके वे होम्योपैथी का नुकसान कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें चाहिये कि क्लासिकल होम्योपैथी जो सैमुअल हैनीमैन ने बतायी है, उसके अनुसार दवा का चुनाव किया जाना चाहिये। डॉ हैनीमैन के सिद्धांत के अनुसार होम्योपैथी में दवा के चुनाव का आधार रोग नहीें रोगी होता है, रोगी के शारीरिक और मानसिक लक्षणों, उसे होने वाली मन से जुड़ी परेशानियों, उसकी प्रकृति, व्यवहार, पसंद-नापसंद आदि को जानकर उस मरीज विशेष के लिए दवा का चुनाव किया जाता है, जिससे उसे लाभ होता है। चूंकि सभी मरीजों के ये लक्षण एक से नहीं होते हैं इसलिए सभी मरीजों को एक ही दवा फायदा भी नहीं करती है। एक ही प्रकार के रोग में अलग-अलग मरीजों को अलग-अलग दवाएं देने से ही लाभ होता है। उन्होेंने कहा कि इसका नतीजा यह है कि जो दवा दी जाती है तो कुछ मरीजों को तो फायदा करती है लेकिन प्रत्येक मरीज को फायदा नहीं करती है, जिससे सीधे तौर पर समझ लिया जाता है कि डॉक्टर गलत दावा करते हैं, होम्योपैथिक दवाओं से फायदा नहीं होता है। उन्होंने कहा कि क्लासिकल पद्धति से दवा का चुनाव करने के बाद भी अगर लाभ नहीं मिलता है तो उसे दूसरी विधा के चिकित्सक के पास रेफर करना चाहिये। डॉ शाह ने बताया कि अपने इस कार्यक्रम में हम देश के नामी-गिरामी चिकित्सकों को शामिल करके उनसे माध्यम से कोर्स करने वाले चिकित्सकों को ट्रेनिंग देंगे।

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