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12 साल पुराना सोरियासिस छह माह के इलाज में हुआ पूरी तरह ठीक

पेट और पीठ भरी हुई थी सोरियासि‍स के घावों से

क्‍या आप जानते हैं कि शारीरिक लक्षणों के अलावा अलग-अलग प्रकार के सपने आना, विभिन्‍न प्रकार के डर लगना, दुखी रहना, मूड अच्‍छा न रहना जैसे कारण व्‍यक्ति को शरीर के कई ऐसे रोग दे देते हैं, जिनका कारण ज्ञात नहीं होता। दरअसल ऐसे रोग ऑटो इम्‍यून डिजीज की श्रेणी में आते हैं। उदाहरण के लिए महिलाओं के रोग, चर्म रोग सहित कई प्र‍कार के रोग। दरअसल ऑटो इम्‍यून शरीर की वह स्थिति होती है जिसमें इम्‍यून सिस्‍टम या शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता हमारे शरीर के विरुद्ध काम करना शुरू कर देता है, सीधी भाषा में कहें तो रक्षक ही भक्षक बनने लगता है। इम्‍यून सिस्‍टम जिसे रोग से शरीर को स्‍वस्‍थ रखने के लिए लड़ना होता है, वह रोग से लड़ने के बजाय शरीर से लड़ने लगता है।

डॉ गिरीश गुप्‍ता

सेहत टाइम्‍स’ ऐसी ही जटिल और असाध्‍य समझी जाने वाली बीमारियों के सफल और सबूत सहित‍ होम्‍योपैथिक इलाज के बारे में जानकारी देने के लिए सीरीज आरम्‍भ कर रहा है। इस सीरीज में उन्‍हीं बीमारियों के केस प्रस्‍तुत किये जायेंगे जिन पर लखनऊ स्थित गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) में वैज्ञानिक तरीके से शोध हुआ है और उसका प्रकाशन राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय जर्नल में हो चुका है। जीसीसीएचआर के संस्‍थापक होम्‍योपैथिक विशेषज्ञ डॉ गिरीश गुप्‍ता ने अपनी रिसर्च को लेकर अब तक स्‍त्री रोगों और त्‍वचा रोगों पर दो पुस्‍तकें Evidence-based Research of Homoeopathy in Gynaecology और Evidence-based Research of Homoeopathy in Dermatology भी लिखी हैं, इन पुस्‍तकों में उन स्‍त्री रोगों व त्‍वचा रोगों के सफल इलाज का विस्‍तार से सबूत सहित वर्णन किया गया है, जो अभी असाध्‍य माने जाते हैं या फि‍र उनका उपचार सिर्फ सर्जरी से ही संभव है। इस सम्‍बन्‍ध में यदि पाठकों के डॉ गिरीश गुप्‍ता से कोई सवाल हों तो वे सेहत टाइम्‍स को sehattimes@gmail.com पर मेल कर सकते हैं।धर्मेन्‍द्र सक्‍सेना

रोग का नाम-सोरियासिस   

26 वर्षीय युवक आरएस (शॉर्ट में नाम) गौरांग क्लीनिक पर 16 अगस्त 2016 को आया उसने बताया कि उसे 2004 से पूरे शरीर में सोरियासि‍स की शिकायत थी। उसकी पीठ, पेट सभी जगह सोरियासिस के चलते घाव हो गये थे। जब मरीज की हिस्‍ट्री ली गयी तो पता चला कि मध्यम वर्गीय परिवार का यह मरीज पढ़ाई में कमजोर था और आठवीं की परीक्षा में फेल हो चुका था। उसे गुस्सा आता था लेकिन वह उसे दबा देता था। जब उसे कोई उसकी बात को काट देता था तो वह गुस्सा हो जाता था। मरीज का अपने जीवन के प्रति दृष्टिकोण सकारात्‍मक था और वह अकेला रहना ज्यादा पसंद करता था। भीड़ में,  संकरी जगहों पर जाने पर तथा कोई भी काम शुरू करने से पहले उसे घबराहट होती थी।

उपचार शुरु करने से पूर्व पेट और पीठ
उपचार के दौरान पेट और पीठ
उपचार के बाद पेट और पीठ

इस मरीज के लिए 237 दवायें उपलब्‍ध थीं, फि‍र इन 237 दवाओं में से पहले 15 दवायें छांटी गयीं, इसके बाद मरीज में लक्षणों के आधार पर इन 15 दवाओं में से एक दवा लाइकोपोडियम का चुनाव करके उसी दिन यानी 16 अगस्त 2016 को दो हफ्ते की दवा दी गयी। इसके बाद 30 अगस्‍त, 15 सितंबर, 29 सितंबर, 16 अक्टूबर, 2 नवंबर, 15 नवंबर, 30 नवंबर, 15 दिसंबर, 16 जनवरी 2017 और 17 फरवरी 2017 को क्‍लीनिक आया। उसका सोरियासिस पूरी तरह से ठीक हो गया।

सोरियासिस पर शोध के परिणाम

गौरांग क्‍लीनिक एंड सेंटर फॉर होम्‍योपैथिक रिसर्च (जीसीसीएचआर) में सोरियासिस पर हुई रिसर्च के अनुसार वर्ष 1994 से वर्ष 2014 तक 162 डायग्‍नोस्‍ड सोरियासिस के केस का इलाज किया गया। इनमें 55 मरीजों यानी 33.95 फीसदी को स्‍पष्‍ट रूप से लाभ मिला जबकि 70 मरीजों यानी 43.21 फीसदी मरीजों को कुछ लाभ मिला, जबकि 37 मरीजों यानी 22.84 फीसदी मरीजों को लाभ नहीं हुआ।

सोरियासिस पर रिसर्च का प्रकाशन दि होम्‍योपैथिक हेरिटेज, वॉल्‍यूम 40, संख्‍या 11, फरवरी 2015 में हुआ है।